गोलीबारी और बम धमाकों के साये में सुरक्षित कराई थी प्रसूताओं की डिलीवरी, सिनेमाई पर्दे पर जीवंत होगी वीरता की गाथा

भारतीय सिनेमा जगत की जानी-मानी अभिनेत्री और नवनिर्वाचित लोकसभा सांसद कंगना रनौत इन दिनों अपनी आगामी

Jun 8, 2026 - 12:19
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गोलीबारी और बम धमाकों के साये में सुरक्षित कराई थी प्रसूताओं की डिलीवरी, सिनेमाई पर्दे पर जीवंत होगी वीरता की गाथा
गोलीबारी और बम धमाकों के साये में सुरक्षित कराई थी प्रसूताओं की डिलीवरी, सिनेमाई पर्दे पर जीवंत होगी वीरता की गाथा
  • आतंकी हमलों की दहशत के बीच इंसानियत की मिसाल, कंगना रनौत ने बयां की मुंबई हमले के दौरान स्वास्थ्य कर्मियों की अनसुनी दास्तान
  • फिल्मी चकाचौंध से परे नर्सिंग प्रोफेशन को गरिमा दिलाने की अनोखी पहल, वास्तविक जीवन के रक्षकों को सम्मानित करने का प्रयास

भारतीय सिनेमा जगत की जानी-मानी अभिनेत्री और नवनिर्वाचित लोकसभा सांसद कंगना रनौत इन दिनों अपनी आगामी और बहुप्रतीक्षित देशभक्ति फिल्म के प्रचार-प्रसार में व्यस्त हैं। इस दौरान उन्होंने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में हुए भीषण आतंकी हमलों के एक ऐसे दर्दनाक और अनसुने पहलू को देश के सामने रखा है, जिसके बारे में आम जनता को बहुत कम जानकारी है। उन्होंने अपने सार्वजनिक संबोधनों में देश के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों, विशेष रूप से नर्सों और डॉक्टरों की निस्वार्थ सेवा भावना और अद्वितीय साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। अभिनेत्री ने यह साफ किया है कि समाज के विकास और संकट के समय में इन स्वास्थ्य रक्षकों का योगदान किसी भी मोर्चे पर तैनात सैनिकों से कम नहीं होता है, लेकिन इतिहास के पन्नों में अक्सर उनके इस मूक बलिदान को वह स्थान नहीं मिल पाता जिसके वे हकदार हैं।

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे भावुक और रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्चाई को साझा करते हुए कंगना रनौत ने देश को उस भयावह रात की याद दिलाई जब आतंकवादियों ने मुंबई के प्रसिद्ध कामा और अल्ब्लेस अस्पताल को अपना निशाना बनाया था। उस समय अस्पताल परिसर के बाहर लगातार स्वचालित हथियारों से अंधाधुंध गोलियां बरसाई जा रही थीं और ग्रेनेड धमाकों की गूंज से पूरी इमारत थर्रा रही थी। चारों तरफ छाई मौत की दहशत और अफरा-तफरी के बीच अस्पताल की जांबाज नर्सों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखा। इस खूनी मंजर और भीषण आतंक के साये में भी इन महिला स्वास्थ्य कर्मियों ने सूझबूझ का परिचय देते हुए अस्पताल में भर्ती प्रसूताओं की तीमारदारी की और बेहद विपरीत परिस्थितियों में बीस नवजात बच्चों की सुरक्षित डिलीवरी सुनिश्चित कराई। यह वाकया साबित करता है कि जब चारों तरफ विनाश का तांडव चल रहा था, तब ये महिलाएं नई जिंदगी को इस दुनिया में लाने के लिए संघर्ष कर रही थीं।

चिकित्सा जगत के इस अदम्य साहस को बयां करते हुए अभिनेत्री ने वैश्विक महामारी के दौर का भी विशेष रूप से उल्लेख किया, ताकि लोग स्वास्थ्य कर्मियों के निरंतर चलने वाले बलिदान की गहराई को समझ सकें। उन्होंने कहा कि सामान्य जीवन में जब कोई व्यक्ति किसी गंभीर या छुआछूत की बीमारी से ग्रसित हो जाता है, तो कई बार उसके अपने सगे-संबंधी और पारिवारिक लोग भी उससे दूरी बना लेते हैं या उसका साथ छोड़ देते हैं। इसके विपरीत, अस्पताल की सीमा में कदम रखते ही डॉक्टर, नर्स और वॉर्ड बॉय बिना किसी भेदभाव के पूरी आत्मीयता से मरीज की सेवा में जुट जाते हैं। चाहे कितनी भी संक्रामक बीमारी क्यों न हो, किसी भी अस्पताल या चिकित्सा कर्मी ने आज तक मरीजों का इलाज करने से मना नहीं किया है। महामारी के सबसे भयावह दिनों में भी इन लोगों ने सुरक्षात्मक सूट पहनकर दिन-रात काम किया और मानवता की रक्षा के लिए खुद को संकट में डाल दिया। यह आगामी सिनेमाई प्रस्तुति पूरी तरह से वास्तविक जीवन के घटनाक्रमों पर आधारित है, जिसमें दिखाया गया है कि कैसे एक सरकारी अस्पताल के भीतर तैनात मुट्ठी भर निहत्थे कर्मचारियों ने अपनी सूझबूझ के बल पर आतंकियों के चंगुल से लगभग चार सौ से अधिक लाचार मरीजों की जान बचाई थी। इस संकट के दौरान इन कर्मियों ने केवल अपनी ड्यूटी नहीं निभाई, बल्कि वे देश के सबसे क्रूर आतंकी हमले में आतंकवादियों के खिलाफ मुख्य गवाह के रूप में भी अदालत के सामने खड़े हुए।

अपनी इस नई भूमिका के माध्यम से कंगना रनौत ने मनोरंजन उद्योग में नर्सिंग पेशे को लेकर बनी रूढ़िवादी और अनुचित धारणाओं पर भी कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई कि भारतीय मनोरंजन जगत और आम विमर्श में नर्सिंग के इस पवित्र और सबसे कठिन प्रोफेशन को अक्सर बेहद गलत तरीके से पेश किया जाता है। उन्होंने साफ लहजे में कहा कि यह समाज की सबसे बड़ी विडंबना है कि जो महिलाएं अस्पताल के भीतर मरीजों की देखभाल से लेकर पूरे प्रशासनिक काम को पूरी जिम्मेदारी से संभालती हैं, उन्हें वह सामाजिक सम्मान और गरिमा नहीं मिल पाती जिसकी वे वास्तव में हकदार हैं। इस फिल्म के माध्यम से उनका मुख्य उद्देश्य समाज की इस संकुचित मानसिकता को बदलना और स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी महिलाओं के प्रति लोगों के मन में सम्मान का भाव पैदा करना है।

सांस्कृतिक मंचों पर बातचीत के दौरान अभिनेत्री ने भारतीय चिकित्सा क्षेत्र की पहचान और उनके पहनावे के ऐतिहासिक संदर्भों पर भी एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उनका मानना है कि वर्तमान समय में देश के अस्पतालों में नर्सों के लिए जो ड्रेस कोड या यूनिफॉर्म निर्धारित है, उस पर आज भी औपनिवेशिक काल और ब्रिटिश हुकूमत का गहरा प्रभाव साफ दिखाई देता है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पश्चिमी नौसेनाओं और अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली कैप, बेल्ट और पिन लगाने की परंपरा आज भी भारतीय परिवेश में वैसी ही चली आ रही है, जो देश के मौसम और संस्कृति के अनुकूल नहीं है। उन्होंने इस बात की आवश्यकता जताई कि भविष्य में इस यूनिफॉर्म को भारतीयता के रंग में ढालकर रीडिजाइन किया जाना चाहिए, ताकि यह हमारी अपनी सांस्कृतिक गरिमा और आधुनिक कामकाजी सहूलियत को बेहतर ढंग से प्रदर्शित कर सके।

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