कागजी और निष्क्रिय स्कूलों के खिलाफ यूपी बोर्ड का अब तक का सबसे बड़ा हंटर, प्रदेश भर के 465 इंटर कॉलेजों की मान्यता एक झटके में रद्द

जांच में यह बात भी पूरी तरह साफ हुई है कि इनमें से कई स्कूल ऐसे थे जो सिर्फ दाखिले के समय सक्रिय होने का नाटक करते थे या फिर अन्य राज्यों के छात्रों को अवैध तरीके से सीधे परीक्षा में बैठाने के धंधे में संलिप्त थे। दो वर्षों तक जब बोर्ड ने ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन और आधार लिंकिं

Jun 18, 2026 - 22:57
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कागजी और निष्क्रिय स्कूलों के खिलाफ यूपी बोर्ड का अब तक का सबसे बड़ा हंटर, प्रदेश भर के 465 इंटर कॉलेजों की मान्यता एक झटके में रद्द
कागजी और निष्क्रिय स्कूलों के खिलाफ यूपी बोर्ड का अब तक का सबसे बड़ा हंटर, प्रदेश भर के 465 इंटर कॉलेजों की मान्यता एक झटके में रद्द

  • पिछले दो वर्षों से बोर्ड परीक्षा में एक भी छात्र न भेजने वाले फर्जी और अपंजीकृत शिक्षण संस्थानों पर माध्यमिक शिक्षा परिषद का कड़ा प्रहार
  • प्रयागराज के 25 विद्यालयों सहित उत्तर प्रदेश के कई जिलों में मची खलबली, इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम-1921 के तहत सचिव ने जारी किया सख्त आदेश

उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने और पारदर्शिता लाने की दिशा में एक बेहद कड़ा और अभूतपूर्व कदम उठाया है। बोर्ड ने प्रदेश भर में केवल कागजों पर संचालित हो रहे और पूरी तरह से निष्क्रिय पड़ चुके 465 इंटर कॉलेजों के खिलाफ बड़े स्तर पर दंडात्मक कार्रवाई करते हुए उनकी मान्यता को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया है। इस बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई के बाद पूरे राज्य के शिक्षा जगत और स्कूल प्रबंधनों में हड़कंप मच गया है। लंबे समय से यह शिकायतें मिल रही थीं कि सूबे के कई जिलों में ऐसे विद्यालय धड़ल्ले से चल रहे हैं जो भौतिक रूप से अस्तित्व में नहीं हैं या वहां किसी भी प्रकार की शैक्षणिक गतिविधियां संचालित नहीं की जा रही हैं। बोर्ड प्रशासन ने इन सभी शिकायतों और आंतरिक जांच रिपोर्टों का गहराई से अध्ययन करने के बाद इस बड़े फैसले को अमलीजामा पहनाया है ताकि शिक्षा के गिरते स्तर और फर्जीवाड़े पर पूरी तरह से लगाम लगाई जा सके।

माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा की गई इस ऐतिहासिक कार्रवाई का मुख्य आधार विद्यालयों की लगातार बनी रहने वाली निष्क्रियता और बोर्ड परीक्षाओं में उनकी शून्य भागीदारी को बनाया गया है। जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि प्रदेश के ये 465 मान्यता प्राप्त विद्यालय पिछले लगातार दो शैक्षणिक सत्रों की बोर्ड परीक्षाओं में एक भी छात्र को शामिल कराने में पूरी तरह से विफल रहे थे। जब कोई विद्यालय लगातार दो वर्षों तक हाईस्कूल या इंटरमीडिएट की परीक्षा में अपना एक भी नियमित या व्यक्तिगत परीक्षार्थी पंजीकृत नहीं कराता है, तो उसकी प्रासंगिकता और संचालन पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो जाते हैं। बोर्ड ने इसे नियमों का खुला उल्लंघन और शिक्षा के नाम पर की जा रही धोखाधड़ी माना है, जिसके बाद इन सभी दागी संस्थानों की सूची तैयार की गई और उनकी मान्यता को हमेशा के लिए निरस्त करने का अंतिम आदेश जारी कर दिया गया।

इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम का सख्त पहरा

यह पूरी दंडात्मक कार्रवाई माध्यमिक शिक्षा परिषद के नियमों और वैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत की गई है। बोर्ड के सचिव भगवती सिंह ने इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम-1921 की सुसंगत धाराओं के तहत प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इन निष्क्रिय और कागजी स्कूलों पर यह प्रहार किया है। इस कानून के तहत बोर्ड को यह पूरा अधिकार है कि वह मानकों को पूरा न करने वाले या लंबे समय तक निष्क्रिय रहने वाले किसी भी स्कूल की मान्यता को वापस ले सकता है।

इस व्यापक कार्रवाई की आंच से उत्तर प्रदेश का शैक्षिक केंद्र माना जाने वाला प्रयागराज जिला भी अछूता नहीं रहा है। बोर्ड मुख्यालय वाले इस महत्वपूर्ण जिले के ही 25 नामचीन और बड़े विद्यालयों को इस कार्रवाई के दायरे में लाया गया है और उनकी मान्यता को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है। प्रयागराज के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल और बुंडेलखंड के भी दर्जनों जिलों के स्कूल इस कार्रवाई की चपेट में आए हैं, जहां लंबे समय से बिना छात्रों और बिना शिक्षकों के ही स्कूल मैनेजमेंट कमेटियां कागजी घोड़े दौड़ा रही थीं। इन स्कूलों ने न तो बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की कोशिश की और न ही छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में कोई रुचि दिखाई, जिसके कारण ये संस्थान केवल सरकारी दस्तावेजों में एक नंबर बनकर रह गए थे और जमीनी हकीकत में इनका कोई अस्तित्व शेष नहीं बचा था।

परिषद के सचिव भगवती सिंह के इस कड़े रुख और औचक आदेश ने राज्य भर के उन भू-माफियाओं और फर्जी स्कूल संचालकों की कमर तोड़कर रख दी है जो केवल मान्यता के प्रमाण पत्र के दम पर अवैध गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे थे। बोर्ड सचिव ने साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार, फर्जीवाड़े या लापरवाही को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आदेश में इस बात को बेहद कड़ाई से स्पष्ट किया गया है कि जो स्कूल केवल परीक्षा केंद्रों के प्रबंधन, नकल माफियाओं को बढ़ावा देने या भविष्य में किसी अनुचित लाभ के उद्देश्य से मान्यता की फाइलें दबाकर बैठे थे, उनका खेल अब पूरी तरह से खत्म हो चुका है। इस फैसले के बाद अन्य निजी और सहायता प्राप्त स्कूलों के प्रबंधकों को भी कड़ा संदेश गया है कि अगर वे नियमों के मुताबिक स्कूल नहीं चलाएंगे तो उनका भी यही हश्र होगा।

जांच में यह बात भी पूरी तरह साफ हुई है कि इनमें से कई स्कूल ऐसे थे जो सिर्फ दाखिले के समय सक्रिय होने का नाटक करते थे या फिर अन्य राज्यों के छात्रों को अवैध तरीके से सीधे परीक्षा में बैठाने के धंधे में संलिप्त थे। दो वर्षों तक जब बोर्ड ने ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन और आधार लिंकिंग जैसी पारदर्शी व्यवस्थाओं को अनिवार्य कर दिया, तो इन फर्जी स्कूलों को डमी छात्र या फर्जी परीक्षार्थी नहीं मिल सके, जिसके कारण परीक्षाओं में इनका छात्र पंजीकरण शून्य दर्ज किया गया। छात्रों की अनुपस्थिति ने ही इन स्कूलों की पोल खोलने का काम किया और यह साबित कर दिया कि इन परिसरों में न तो नियमित कक्षाएं चलती हैं और न ही कोई शैक्षणिक माहौल उपलब्ध है। बोर्ड ने इस बात को गंभीरता से लिया कि ऐसे निष्क्रिय संस्थान केवल सरकारी व्यवस्था पर बोझ और नियमों का मखौल उड़ाने का जरिया बने हुए थे।

इस अभूतपूर्व और बड़ी कार्रवाई के बाद अब माध्यमिक शिक्षा परिषद ने राज्य के सभी जिला विद्यालय निरीक्षकों (DIOS) को एक विस्तृत गाइडलाइन जारी कर दी है। इसके तहत सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में आने वाले इन 465 स्कूलों की भौतिक संपत्तियों, बोर्ड की वेबसाइट से उनके डेटा और भविष्य के किसी भी संभावित फर्जी पंजीकरण को तुरंत ब्लॉक करें। इसके साथ ही, यदि इन स्कूलों में कुछ मुट्ठी भर वैध छात्र अभी भी बचे हुए हैं, तो उनके भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें नजदीकी राजकीय या पूरी तरह से मान्यता प्राप्त वैध विद्यालयों में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया भी शुरू करने को कहा गया है। इस कदम से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि किसी भी निर्दोष छात्र का साल बर्बाद न हो और उसे सही संस्थान में शिक्षा मिल सके।

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