मिडल ईस्ट संकट पर असदुद्दीन ओवैसी का बड़ा बयान: गाजा की तरह ईरान को बर्बाद करने की हो रही साजिश
तुर्की का नाम लेते हुए ओवैसी ने एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक बिंदु की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि तुर्की आज मुस्लिम जगत में एक स्वतंत्र और मुखर आवाज बनकर उभरा है, जो पश्चिमी शक्तियों के सामने झुकने को तैया
ओवैसी की अंतरराष्ट्रीय चेतावनी: ईरान के बाद अब तुर्की की बारी, ट्रंप और नेतन्याहू पर साधा निशाना
हैदराबाद सांसद का केंद्र सरकार पर प्रहार: ईरान-इजरायल युद्ध से भारत की ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों पर मंडराया खतरा
हैदराबाद में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने पश्चिम एशिया की वर्तमान स्थिति को वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा करार दिया। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया देख रही है कि किस तरह अमेरिका और इजरायल (जायोनिस्ट ताकतें) मिलकर एक संप्रभु राष्ट्र की पहचान मिटाने पर तुले हुए हैं। ओवैसी के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की जोड़ी का लक्ष्य केवल ईरान को सैन्य रूप से कमजोर करना नहीं है, बल्कि उसे गाजा की तरह मलबे के ढेर में तब्दील करना है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अब भी हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह आग ईरान की सीमाओं को पार कर तुर्की और अन्य खाड़ी देशों तक फैल जाएगी। ओवैसी ने इसे एक सोची-समझी रणनीतिक योजना बताया जिसके तहत मुस्लिम जगत के शक्तिशाली देशों को एक-एक करके अस्थिर करने का प्रयास किया जा रहा है।
ओवैसी ने अपने भाषण में गाजा में हुए मानवीय संकट का विस्तार से उल्लेख किया और उसे ईरान की वर्तमान स्थिति से जोड़ा। उन्होंने कहा कि जिस तरह गाजा में निर्दोष बच्चों, महिलाओं और अस्पतालों को निशाना बनाया गया, ठीक वैसी ही तस्वीर अब ईरान के विभिन्न शहरों से सामने आ रही है। हालिया हमलों में स्कूलों और नागरिक ठिकानों के क्षतिग्रस्त होने की खबरों पर दुख व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि 'लोकतंत्र और मानवाधिकार' की बात करने वाले देश आज चुपचाप इस नरसंहार को देख रहे हैं। ओवैसी ने सवाल उठाया कि क्या अंतरराष्ट्रीय कानून केवल कमजोर देशों के लिए हैं? उन्होंने चेतावनी दी कि ईरान की बर्बादी का मतलब केवल एक सत्ता का परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि यह पूरे क्षेत्र में दशकों तक चलने वाली अस्थिरता का सूत्रपात होगा, जिसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ेगा।
सांसद ओवैसी ने भारत की विदेश नीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रुख पर भी तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं, लेकिन वर्तमान सरकार इस संकट के समय में स्पष्ट स्टैंड लेने से कतरा रही है। ओवैसी ने याद दिलाया कि भारत के लगभग एक करोड़ नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा और आजीविका सीधे तौर पर इस युद्ध से प्रभावित हो रही है। उन्होंने केंद्र सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि जब तक भारत में रसोई गैस (LPG) और ईंधन की कीमतें नहीं बढ़ी थीं, तब तक सरकार खामोश थी, लेकिन अब जब आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, तो शांति की बातें की जा रही हैं। उन्होंने मांग की कि भारत को इस 'अन्यायपूर्ण युद्ध' की स्पष्ट निंदा करनी चाहिए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए। मार्च 2026 में ईरान और इजरायल के बीच तनाव अपने चरम पर है। अमेरिकी और इजरायली सेना ने 'ऑपरेशन रोरिंग लायन' के तहत ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों पर हमले किए हैं। इस सैन्य कार्रवाई के जवाब में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद करने की चेतावनी दी है, जिससे वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने का खतरा पैदा हो गया है और भारत सहित कई एशियाई देशों में ईंधन की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं।
तुर्की का नाम लेते हुए ओवैसी ने एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक बिंदु की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि तुर्की आज मुस्लिम जगत में एक स्वतंत्र और मुखर आवाज बनकर उभरा है, जो पश्चिमी शक्तियों के सामने झुकने को तैयार नहीं है। यही कारण है कि ईरान के बाद तुर्की को निशाना बनाने की पटकथा तैयार की जा रही है। ओवैसी का मानना है कि ट्रंप प्रशासन की नीतियां 'इजरायल प्रथम' के सिद्धांत पर आधारित हैं, जो क्षेत्र के किसी भी अन्य देश को मजबूत होते नहीं देखना चाहतीं। उन्होंने आशंका जताई कि यदि ईरान की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जाती है, तो तुर्की की संप्रभुता को चुनौती देना और भी आसान हो जाएगा। उन्होंने दुनिया भर के देशों से अपील की कि वे इस विस्तारवादी सोच के खिलाफ एकजुट हों, अन्यथा इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।
ईरान के सर्वोच्च नेता के खिलाफ की गई कार्रवाई और देश के भीतर हुई बमबारी को ओवैसी ने 'अनैतिक और गैर-कानूनी' करार दिया। उन्होंने कहा कि जब जिनेवा में शांति वार्ता की संभावनाओं पर चर्चा हो रही थी, ठीक उसी समय हमले करना यह दर्शाता है कि हमलावर शक्तियां कूटनीति में विश्वास नहीं रखतीं। ओवैसी ने कहा कि ईरान पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानून (यूएन चार्टर) के अनुच्छेद 51 का खुला उल्लंघन है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस की विचारधारा पर भी प्रहार करते हुए कहा कि जो लोग देश के भीतर नफरत की राजनीति करते हैं, वे ही बाहर भी दमनकारी शक्तियों का समर्थन कर रहे हैं। उनके अनुसार, जायोनी विचारधारा और नफरत की राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो न्याय के बजाय वर्चस्व को प्राथमिकता देते हैं।
युद्ध के आर्थिक परिणामों पर चर्चा करते हुए ओवैसी ने भारतीय मध्यम वर्ग को आगाह किया। उन्होंने कहा कि युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जा रहा, बल्कि इसकी मार हर हिंदुस्तानी की रसोई तक पहुंच रही है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और आपूर्ति श्रृंखला टूटने से भारत में महंगाई का नया दौर शुरू हो चुका है। ओवैसी ने सवाल किया कि क्या सरकार ने उन करोड़ों भारतीयों की वापसी की कोई योजना बनाई है जो युद्धग्रस्त क्षेत्रों में फंसे हो सकते हैं? उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने अपनी तटस्थता के नाम पर उन देशों के साथ हाथ मिला लिया है जो मानवता के दुश्मन बने हुए हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को अपनी 80 साल पुरानी संतुलित विदेश नीति पर वापस लौटना चाहिए जो हमेशा मजलूमों और फलस्तीनी हितों के साथ खड़ी रही है।
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