कहानी: कर्म- वत्सला के भीतर कई दिनों से लगातार उथल पुथल मची हुई थी....
दुनियां की नजरों में एक सशक्त महिला होते हुए भी अपने भीतर के अंतर्द्वंद से बाहर ही नहीं आ पा रही थी। वजह ढूंढती तो उसे अभिनव की बातें सही...
कहानी- "कर्म"
(अमिता मिश्रा "मीतू ")
वत्सला के भीतर कई दिनों से लगातार उथल पुथल मची हुई थी।समझ कर भी नासमझ बन बैठी, खुद ही खुद से लड़ रही थी अंदर ही अंदर।
दुनियां की नजरों में एक सशक्त महिला होते हुए भी अपने भीतर के अंतर्द्वंद से बाहर ही नहीं आ पा रही थी।
वजह ढूंढती तो उसे अभिनव की बातें सही लगती ।वह अक्सर उसे समझाता था कि " वत्सला !तुम्हारा अपने परिवार के प्रति अति स्नेह ही तुम्हारे तनाव का कारण है और सब आगे बढ़ गए हैं जीवन में ,लेकिन तुम ये जो अभी भी सबको बच्चा मानकर उनके इर्द गिर्द घूमती रहती हो न इसीलिए तुम्हारी भावनाओं को कोई समझना नही चाहता!"
"तुम हमेशा आशंकाओं से घिरी रहती हो ,सबके आगे पीछे प्यार का कटोरा लिए घूमती रहती हो शायद इसीलिए तुम्हारे निश्छल प्रेम का कोई महत्त्व नही रह गया है किसी की नजर में।" वत्सला सब बातें याद करते करते सिर पकड़ कर बैठ गई।
उसे महसूस हुआ उसके सब अपने उससे छूट रहे हों और वो रोक नही पा रही ।दर्द से उसकी आंखें छलछला आईं।
पिछले कुछ समय से उसे परिवार के अंदर बदलाव महसूस हो रहे थे।उसकी बातों को अब उतनी तवज्जो नहीं मिलती, न ही उसकी किसी बात को आगाह करने पर कोई ध्यान देता।सब अपनी मर्जी के अनुसार ही चल रहे हैं।
कहां गलती हो रही?शादी के बाद भी वो हमेशा अपने दोनो परिवारों के प्रति जिम्मेदार रही ।उसने अपनी मां और बहन के प्रति भी दायित्व निभाए।
किसी को कमतर नहीं महसूस होने दिया पर उसी परिवार में उसे अलग सा महसूस हो रहा है क्यों...बहुत सारे सवाल थे पर उत्तर .. जान कर भी मानना नही चाहती थी शायद।
"ये लो तुम्हारे लिए!"अभिनव ने एक पेंटिंग देते हुए कहा।
नजर उठाकर देखा तो सुंदर काले रंग से कृष्ण का मनमोहक रेखाचित्र बना हुआ था।
मुरली बजाते कृष्ण के अधरों की मुस्कान मानों बोल उठी।
"क्यों परेशान हो सखी!मुझे भी तो अपने सारे प्रिय छोड़ने ही पड़े न। पहले यशोदा मईया,ग्वाल बाल ,फिर अपना प्रेम राधा और आखिर में द्वारका भी ।मैं तो फिर भी कर्म करता रहा और मुस्कुराता रहा तो तुम भी तो मेरी सखी हो ,बचपन से मेरा नाम जपती रही और कुछ सीख नही पाई!"
वत्सला की मानों राह मिल गई ,उसकी उलझन कुछ काम हुई ।
सामने की सारी धुंध छंट कर सूर्य की किरणें पुनः मन आकाश उजला करने लगीं।
उसे अभिनव की बात सही लगी और उसने निश्चय किया कि अब वो थोड़ा दूरी बना कर रखेगी रिश्तों में साथ ही सुनिश्चित करेगी कि यदि किसी को उसकी आवश्यकता है तो वह उसे आवाज दे और अपने आत्मसम्मान के साथ वह उसकी मदद कर सके।
अपने भीतर के नेह सागर को थोड़ा काबू करना ही होगा,यही जीवन है ।कर्म की राह पर आगे बढ़ने के लिए वत्सला तैयार होने लगी मन से।
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