Politics: सिंधु जल संधि स्थायी रूप से निलंबित, पाकिस्तान को नहीं मिलेगा पानी, अमित शाह ने ऐतिहासिक फैसले को दोहराया।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में एक साक्षात्कार में भारत सरकार के उस ऐतिहासिक फैसले को दोहराया, जिसने भारत और पाकिस्तान के ....

Jun 22, 2025 - 10:57
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Politics: सिंधु जल संधि स्थायी रूप से निलंबित, पाकिस्तान को नहीं मिलेगा पानी, अमित शाह ने ऐतिहासिक फैसले को दोहराया।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में एक साक्षात्कार में भारत सरकार के उस ऐतिहासिक फैसले को दोहराया, जिसने भारत और पाकिस्तान के बीच 65 साल पुरानी सिंधु जल संधि को स्थायी रूप से निलंबित कर दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह संधि अब कभी बहाल नहीं होगी और पाकिस्तान को वह पानी नहीं मिलेगा, जो उसे अब तक इस समझौते के तहत मिलता रहा था। शाह ने पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि उसने इस संधि की शर्तों का बार-बार उल्लंघन किया और आतंकवाद को बढ़ावा देकर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला। इस फैसले का आधार अप्रैल में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ आतंकी हमला बताया गया, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। इस निलंबन के बाद भारत ने सिंधु नदी की जल धारा को राजस्थान की ओर मोड़ने और बिजली परियोजनाओं को तेज करने की योजना बनाई है। यह कदम भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर सकता है, क्योंकि पाकिस्तान ने इसे युद्ध की कार्रवाई मानने की चेतावनी दी है।

  • सिंधु जल संधि का इतिहास

सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हस्ताक्षरित एक ऐतिहासिक समझौता था। इस संधि ने सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के पानी के बंटवारे का ढांचा तैयार किया। इसके तहत छह नदियों को दो समूहों में बांटा गया: पूर्वी नदियां (रावी, ब्यास और सतलुज) भारत को दी गईं, जबकि पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम और चिनाब) पाकिस्तान को आवंटित की गईं। भारत को कुल जल का 30 प्रतिशत हिस्सा मिला, जबकि पाकिस्तान को 70 प्रतिशत। यह संधि दोनों देशों के बीच तीन युद्धों और कई तनावपूर्ण दौर के बावजूद बरकरार रही, जिसे विश्व में जल-साझेदारी का एक अनोखा उदाहरण माना जाता था। इस संधि में स्थायी सिंधु आयोग (पीआईसी) की स्थापना और विवाद निपटारे के लिए त्रिस्तरीय प्रक्रिया (आयोग, तटस्थ विशेषज्ञ, और मध्यस्थता न्यायालय) का प्रावधान था। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इस संधि की शर्तों पर पुनर्विचार की मांग की थी, खासकर तब जब पाकिस्तान ने भारत की किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं पर आपत्ति जताई थी। भारत का कहना था कि ये परियोजनाएं संधि के नियमों के अनुरूप हैं, लेकिन पाकिस्तान ने इन्हें जल प्रवाह को नियंत्रित करने की साजिश बताया।

  • निलंबन का कारण

इस संधि को निलंबित करने का तात्कालिक कारण अप्रैल में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ आतंकी हमला था, जिसमें 26 लोग, ज्यादातर पर्यटक, मारे गए थे। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को जिम्मेदार ठहराया। हमले के एक दिन बाद, गुरुवार को, भारत ने पाकिस्तान को औपचारिक पत्र लिखकर संधि को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने की सूचना दी। पत्र में जल शक्ति मंत्रालय की सचिव देबाश्री मुखर्जी ने कहा कि संधि का सम्मान करने की जिम्मेदारी दोनों पक्षों की है, लेकिन पाकिस्तान ने आतंकवाद को बढ़ावा देकर इसका उल्लंघन किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा, "खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।" उन्होंने आतंकवाद और बातचीत को एक साथ चलने से इनकार किया। इस निलंबन के साथ ही भारत ने कई अन्य कदम उठाए, जैसे अटारी-वाघा सीमा को बंद करना, पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द करना, और पाकिस्तानी दूतावास के सैन्य अधिकारियों को निष्कासित करना। इन कदमों से भारत ने साफ कर दिया कि वह पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाएगा।

  • गृह मंत्री का बयान

शनिवार को एक साक्षात्कार में गृह मंत्री अमित शाह ने इस निलंबन को स्थायी बताया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अब तक जो पानी "अनुचित रूप से" मिल रहा था, उसे अब भारत अपने उपयोग के लिए मोड़ेगा। शाह ने घोषणा की कि राजस्थान में एक 113 किलोमीटर लंबी नहर बनाई जाएगी, जो सिंधु नदी की पश्चिमी नदियों के पानी को भारत के खेतों और घरों तक पहुंचाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान को पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि भारत अब अपनी पूरी हिस्सेदारी का उपयोग करेगा। शाह ने इस फैसले को राष्ट्रीय हित में बताया और कहा कि पाकिस्तान ने बार-बार आतंकवाद को बढ़ावा देकर भारत के साथ सहयोग की भावना को ठेस पहुंचाई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ तकनीकी कारणों से संधि को औपचारिक रूप से रद्द नहीं किया गया, लेकिन इसका निलंबन स्थायी है। इस बयान ने पाकिस्तान की उस उम्मीद को खत्म कर दिया, जिसमें वह संधि को बहाल करने के लिए भारत से बातचीत की कोशिश कर रहा था।

संधि के निलंबन के बाद भारत ने तीन स्तरों की रणनीति बनाई है: अल्पकालिक, मध्यमकालिक और दीर्घकालिक। अल्पकालिक रणनीति में नदियों की तलछट साफ करना और मौजूदा बांधों का उपयोग कर जल प्रवाह को नियंत्रित करना शामिल है। मध्यमकालिक योजना में जम्मू-कश्मीर में रुकी हुई जलविद्युत परियोजनाओं, जैसे पकल दुल, रतले, किरु और क्वार, को तेज करना है। दीर्घकालिक रणनीति में नहरों और जलाशयों का निर्माण शामिल है, ताकि भारत अपनी हिस्सेदारी का पूरा उपयोग कर सके। जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने कहा कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि सिंधु नदी का एक बूंद पानी भी पाकिस्तान न पहुंचे। उन्होंने बताया कि बगलिहार और सलाल बांधों में जलाशयों की क्षमता बढ़ाने के लिए तलछट निकाली जाएगी। इसके अलावा, भारत ने पाकिस्तान के साथ जल डेटा साझा करना भी बंद कर दिया है, जिससे पाकिस्तान को बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई योजना में दिक्कत हो सकती है।

  • पाकिस्तान की प्रतिक्रिया

पाकिस्तान ने इस निलंबन को "युद्ध की कार्रवाई" करार दिया है। उसका कहना है कि संधि में एकतरफा निलंबन का कोई प्रावधान नहीं है और भारत का यह कदम अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। पाकिस्तान के जल संसाधन सचिव सैयद अली मुर्तजा ने भारत को चार पत्र लिखकर संधि की बहाली की मांग की, लेकिन भारत ने कोई जवाब नहीं दिया। पाकिस्तान अब विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे को उठाने की योजना बना रहा है। पाकिस्तान की 80 प्रतिशत कृषि और एक तिहाई जलविद्युत उत्पादन सिंधु नदी पर निर्भर है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत जल प्रवाह को नियंत्रित करता है, तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, खासकर पंजाब और सिंध प्रांतों में, गंभीर संकट में पड़ सकती है। पाकिस्तान के किसानों ने इस निलंबन को अपनी आजीविका के लिए खतरा बताया और विरोध प्रदर्शन किए। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत का यह कदम क्षेत्रीय शांति और जल सुरक्षा के लिए खतरा है।

यह निलंबन भारत के लिए घरेलू स्तर पर लोकप्रिय हो सकता है, क्योंकि यह पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रुख को दर्शाता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे भारत-पाकिस्तान तनाव के एक हिस्से के रूप में देख रहा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास अभी इतना बुनियादी ढांचा नहीं है कि वह पश्चिमी नदियों के पानी को पूरी तरह रोक सके, लेकिन सूखे मौसम में जल प्रवाह को नियंत्रित कर वह पाकिस्तान को नुकसान पहुंचा सकता है। विश्व बैंक ने इस विवाद में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है, क्योंकि उसका कहना है कि उसकी भूमिका केवल मध्यस्थता तक सीमित थी। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा सकता है, खासकर तब जब दोनों देश परमाणु हथियारों से लैस हैं। सिंधु जल संधि का स्थायी निलंबन भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक नया अध्याय है। यह फैसला भारत की उस नीति को दर्शाता है, जिसमें वह आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और अपनी संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने पर जोर दे रहा है। हालांकि, यह कदम दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा सकता है।

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