बंगाल चुनाव 2026: दूसरे चरण के रण के लिए थमा प्रचार का शोर, उत्तर चौबीस परगना में दिखा सियासी शक्ति प्रदर्शन।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे और अंतिम चरण के लिए चुनावी शोर आज थमने जा रहा है। प्रचार के इस अंतिम
- सत्ता के संग्राम का आखिरी दांव: उत्तर चौबीस परगना के मतदाताओं के मन को टटोलने पहुंची ग्राउंड जीरो पर टीम
- अंतिम चरण की वोटिंग से पहले दिग्गजों ने झोंकी ताकत, उत्तर चौबीस परगना की सीटों पर टीएमसी और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे और अंतिम चरण के लिए चुनावी शोर आज थमने जा रहा है। प्रचार के इस अंतिम दिन राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, विशेष रूप से उत्तर चौबीस परगना जैसे महत्वपूर्ण जिलों में जहां सत्ता की चाबी छिपी मानी जाती है। राज्य की 294 सीटों के लिए हो रहे इस चुनाव में दूसरे चरण के तहत 142 सीटों पर मतदान होना है, जिसमें कोलकाता और उसके आसपास के शहरी और ग्रामीण बेल्ट शामिल हैं। आज शाम प्रचार खत्म होने के बाद बाहरी नेताओं को क्षेत्र छोड़ने के निर्देश दिए गए हैं और अब सबकी नजरें 29 अप्रैल को होने वाले मतदान पर टिकी हैं। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण के लिए चुनाव प्रचार का आज आखिरी दिन है। आज शाम 6 बजे के बाद लाउडस्पीकरों का शोर शांत हो जाएगा और प्रत्याशी केवल घर-घर जाकर जनसंपर्क कर सकेंगे। इस चरण में उत्तर चौबीस परगना जिला केंद्र बिंदु बना हुआ है, क्योंकि यहाँ की सीटों की संख्या और जनसांख्यिकीय विविधता हार-जीत के अंतर को तय करने में बड़ी भूमिका निभाती है। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में आज सुबह से ही विशाल रोड शो और रैलियों का आयोजन किया गया है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस अपनी लोककल्याणकारी योजनाओं के दम पर सत्ता बचाने की कोशिश कर रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी परिवर्तन के वादे के साथ मतदाताओं को रिझाने में जुटी है।
उत्तर चौबीस परगना जिले का मिजाज समझने के लिए जब धरातल पर पड़ताल की गई, तो वहां के मतदाताओं के मन में कई तरह के विरोधाभास और मुद्दे तैरते नजर आए। जिले के शहरी इलाकों जैसे बिधाननगर और राजारहाट में बुनियादी ढांचे, रोजगार और शहरी सुविधाओं को लेकर चर्चाएं गर्म हैं। वहीं दूसरी ओर, संदेशखली और बशीरहाट जैसे ग्रामीण अंचलों में महिलाओं की सुरक्षा, स्थानीय प्रशासन का व्यवहार और कृषि उत्पादों के दाम मुख्य चुनावी मुद्दे बने हुए हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस बार मतदान केवल पार्टी के नाम पर नहीं, बल्कि पिछले पांच वर्षों में हुए कार्यों के वास्तविक मूल्यांकन के आधार पर होगा।
उत्तर चौबीस परगना की एक बड़ी विशेषता यहाँ की मतुआ समुदाय की आबादी है। यह समुदाय पिछले कुछ चुनावों से बंगाल की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर यहाँ के लोगों के बीच स्पष्ट विभाजन और अलग-अलग राय देखने को मिली है। प्रचार के आखिरी दिन भाजपा ने मतुआ बहुल इलाकों में अपने स्टार प्रचारकों को उतारा है, जो नागरिकता के मुद्दे को भावनात्मक रूप से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं तृणमूल कांग्रेस इसे पहचान की राजनीति बताकर विकास और सुरक्षा के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। जिले की राजनीतिक गलियों में मतुआ वोटों का ध्रुवीकरण इस बार भी नतीजों को चौंकाने वाला बना सकता है। दूसरे चरण में कुल 142 सीटों पर मतदान होना है। इसमें कोलकाता, उत्तर चौबीस परगना, दक्षिण चौबीस परगना, हावड़ा और पूर्व व पश्चिम मेदिनीपुर जैसे जिले शामिल हैं। चुनाव आयोग ने इस चरण को सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना है और भारी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती की गई है।
क्षेत्र में कानून व्यवस्था की स्थिति भी मतदाताओं के फैसलों को प्रभावित कर रही है। पिछले कुछ महीनों में हुई छिटपुट हिंसा और राजनीतिक झड़पों के कारण आम जनता के बीच एक तरह का डर और सतर्कता दोनों ही देखी जा रही है। उत्तर चौबीस परगना के संवेदनशील बूथों पर कड़ी सुरक्षा के इंतजाम किए गए हैं ताकि लोग बिना किसी भय के वोट डाल सकें। प्रशासन ने सीमावर्ती इलाकों में गश्त बढ़ा दी है और नाकाबंदी कर दी गई है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे शांतिपूर्ण मतदान चाहते हैं और किसी भी प्रकार की अराजकता उनके चुनावी रुख को बदल सकती है। प्रचार के अंतिम घंटों में सभी दलों ने 'मिशन बंगाल' के तहत अपनी पूरी मशीनरी लगा दी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनीConstituency के साथ-साथ उत्तर चौबीस परगना के विभिन्न हिस्सों में रैलियां कर स्थानीय भावनाओं को सहलाने की कोशिश की है। दूसरी ओर, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने भी जिले में धुआंधार प्रचार कर टीएमसी के 'सिंडिकेट राज' और भ्रष्टाचार के आरोपों को फिर से हवा दी है। वामपंथी और कांग्रेस गठबंधन भी इस बार अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए छोटे-छोटे समूहों में सघन जनसंपर्क कर रहे हैं, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना भी बनी हुई है।
उत्तर चौबीस परगना का युवा मतदाता इस बार रोजगार और औद्योगिक विकास की मांग को लेकर मुखर है। शिक्षा और नौकरी के अवसरों की कमी युवाओं के बीच चर्चा का प्रमुख विषय है। कई इलाकों में युवा वर्ग का मानना है कि बंगाल को अब एक नई आर्थिक दिशा की जरूरत है। राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्रों में बड़े-बड़े वादे किए हैं, लेकिन जमीन पर उनकी विश्वसनीयता को लेकर मतदाता अभी भी कशमकश में हैं। यही वजह है कि प्रचार के आखिरी दिन भी कई इलाकों में सस्पेंस बना हुआ है कि ऊंट किस करवट बैठेगा। चुनाव प्रचार समाप्त होने के साथ ही अब गेंद मतदाताओं के पाले में है। उत्तर चौबीस परगना के निवासी 29 अप्रैल को अपने मताधिकार का प्रयोग कर राज्य के भविष्य का फैसला करेंगे। जिले की सड़कों पर आज जो चुनावी उत्साह दिखा, वह कल एक खामोश रणनीतिक तैयारी में बदल जाएगा। 4 मई को होने वाली मतगणना यह स्पष्ट कर देगी कि उत्तर चौबीस परगना की जनता ने विकास के दावों पर भरोसा जताया है या परिवर्तन की लहर के साथ जाना स्वीकार किया है। फिलहाल, बंगाल की राजनीति का पारा अपने उच्चतम स्तर पर है और हर किसी की निगाहें दूसरे चरण के इस महामुकाबले पर टिकी हैं।
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