थायराइड और एंग्जायटी के परस्पर संबंधों को नजरअंदाज करना सेहत के लिए बेहद खतरनाक, हो सकता है यह गंभीर ट्यूमर का शुरुआती संकेत।
गले के निचले हिस्से में मौजूद तितली के आकार की थायराइड ग्रंथि मानव शरीर की सबसे महत्वपूर्ण अंतःस्रावी ग्रंथियों में से एक है।
- गले की तितली आकार की ग्रंथि में होने वाली असामान्य हलचल और मानसिक तनाव का सीधा जुड़ाव शरीर में पनप रही जानलेवा कोशिकाओं का अलार्म हो सकता है।
- शारीरिक और मानसिक लक्षणों की अनदेखी करने से गले की गंभीर बीमारियों का समय पर पता लगाना मुश्किल हो जाता है जिससे आगे चलकर उपचार की जटिलताएं अत्यधिक बढ़ जाती हैं।
गले के निचले हिस्से में मौजूद तितली के आकार की थायराइड ग्रंथि मानव शरीर की सबसे महत्वपूर्ण अंतःस्रावी ग्रंथियों में से एक है। यह ग्रंथि मुख्य रूप से दो प्रमुख हार्मोनों, थायरोक्सिन और ट्राई-आयोडोथायरोनिन का उत्पादन करती है, जो सीधे तौर पर शरीर के मेटाबॉलिज्म, हृदय गति, ऊर्जा के स्तर और मानसिक स्थिति को नियंत्रित करते हैं। जब इस ग्रंथि की कार्यप्रणाली में किसी भी प्रकार का असंतुलन आता है, तो व्यक्ति को अत्यधिक बेचैनी, घबराहट और एंग्जायटी का सामना करना पड़ता है। अक्सर लोग इन मानसिक बदलावों को केवल दैनिक तनाव या सामान्य अवसाद मानकर छोड़ देते हैं। चिकित्सा जगत के नवीनतम वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, लंबे समय तक बनी रहने वाली एंग्जायटी और थायराइड के अनियंत्रित लक्षण वास्तव में गले के भीतर पनप रहे घातक ट्यूमर या कैंसर की शुरुआती चेतावनी हो सकते हैं। इसलिए, इन दोनों समस्याओं के संयोजन को कभी भी सामान्य समझकर टालना नहीं चाहिए।
थायराइड ग्रंथि के भीतर जब कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से विभाजित होने लगती हैं, तो वे एक गांठ या नोड्यूल का रूप ले लेती हैं। इन नोड्यूल्स के कारण ग्रंथि से हार्मोनों का स्राव अचानक बहुत अधिक बढ़ जाता है, जिसे हाइपरथायरायडिज्म कहा जाता है। शरीर में थायराइड हार्मोन की यह अत्यधिक मात्रा तंत्रिका तंत्र को अत्यधिक सक्रिय कर देती है। इसके परिणामस्वरूप हृदय की धड़कनें तेज होना, हाथों में कंपन, अत्यधिक पसीना आना और नींद न आने जैसी गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं, जो पूरी तरह से पैनिक अटैक या गंभीर एंग्जायटी डिसऑर्डर जैसी दिखाई देती हैं। जब तक गले की अंदरूनी जांच नहीं की जाती, तब तक यह अंतर कर पाना असंभव होता है कि यह केवल एक मानसिक समस्या है या फिर ग्रंथि के भीतर कोई जानलेवा ट्यूमर बढ़ रहा है जो पूरे शरीर के सिस्टम को अनियंत्रित कर रहा है।
चिकित्सीय इतिहास और हालिया अध्ययनों के आंकड़ों का गहराई से अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि महिलाओं में पुरुषों की तुलना में थायराइड से जुड़ी समस्याएं और कैंसर होने की संभावना कई गुना अधिक होती है। एस्ट्रोजन और अन्य हार्मोनों के उतार-चढ़ाव के कारण महिलाओं का अंतःस्रावी तंत्र अधिक संवेदनशील होता है। शुरुआती चरणों में, थायराइड की गांठें इतनी छोटी होती हैं कि वे बाहर से दिखाई नहीं देतीं, लेकिन वे शरीर के भीतर हार्मोनल असंतुलन पैदा करके मानसिक स्वास्थ्य को पूरी तरह बिगाड़ देती हैं। जब इस तरह के मानसिक तनाव के साथ-साथ गले में भारीपन, आवाज का बैठना या कुछ भी निगलने में कठिनाई महसूस होने लगे, तो स्थिति बेहद चिंताजनक हो जाती है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत होता है कि ग्रंथि के भीतर मौजूद गांठ अब आसपास की नसों और आहार नली पर दबाव बना रही है।
कैंसर की इस सूक्ष्म शुरुआत को समझने के लिए इसके विभिन्न प्रकारों और उनके व्यवहार को जानना अत्यंत आवश्यक है। थायराइड के ट्यूमर मुख्य रूप से पैपिलरी, फॉलिकुलर, मेडुलरी और एनाप्लास्टिक श्रेणियों में विभाजित होते हैं। इनमें से कुछ ट्यूमर बहुत धीमी गति से बढ़ते हैं, जिसके कारण उनके लक्षण सालों तक केवल एंग्जायटी, वजन के अचानक घटने या बढ़ने और थकान के रूप में ही सामने आते हैं। चूंकि ये लक्षण रोजमर्रा की भागदौड़ और मानसिक तनाव से मेल खाते हैं, इसलिए अधिकांश लोग सही समय पर एंडोक्रिनोलॉजिस्ट या ऑन्कोलॉजिस्ट के पास नहीं पहुंच पाते। जब तक रोग का निदान होता है, तब तक कोशिकाएं गर्दन के लिम्फ नोड्स तक फैल चुकी होती हैं, जिससे उपचार की प्रक्रिया अधिक जटिल और लंबी हो जाती है।
निदान की आधुनिक तकनीकों ने अब इस बात को पूरी तरह प्रमाणित कर दिया है कि रक्त जांच में केवल टीएसएच, फ्री टी-3 और फ्री टी-4 के स्तर को देखना ही पर्याप्त नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को लगातार एंग्जायटी की शिकायत है और थायराइड की दवाएं लेने के बाद भी मानसिक स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है, तो तुरंत गर्दन का हाई-Resolution अल्ट्रासाउंड कराया जाना चाहिए। अल्ट्रासाउंड के माध्यम से ग्रंथि के भीतर छिपे हुए सूक्ष्म नोड्यूल्स की संरचना, उनके आकार और उनके भीतर रक्त के प्रवाह की सटीक स्थिति का पता चलता है। यदि अल्ट्रासाउंड में कोई संदिग्ध गांठ पाई जाती है, तो सुई की मदद से की जाने वाली बायोप्सी, जिसे फाइन-नीडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी कहा जाता है, के जरिए कैंसर की उपस्थिति की अंतिम पुष्टि की जाती है।
उपचार के दृष्टिकोण से, यदि समय रहते इस बीमारी को पकड़ लिया जाए, तो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसके पूरी तरह ठीक होने की दर ९८ प्रतिशत से भी अधिक है। इसके प्राथमिक उपचार में सर्जरी के माध्यम से थायराइड ग्रंथि के प्रभावित हिस्से या पूरी ग्रंथि को निकाल दिया जाता है, जिसे थायराइडक्टॉमी कहा जाता है। इसके बाद, बची हुई कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी का उपयोग किया जाता है। ग्रंथि हट जाने के बाद मरीज को जीवनभर हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी के रूप में दवाएं लेनी पड़ती हैं, जिससे शरीर का मेटाबॉलिज्म और मानसिक संतुलन पूरी तरह सामान्य बना रहता है। सही समय पर सर्जरी होने से न केवल कैंसर से मुक्ति मिलती है, बल्कि सालों से परेशान कर रही एंग्जायटी और घबराहट की समस्या भी पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
What's Your Reaction?







