NALSAR विश्वविद्यालय विवाद में BCI को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, चीफ जस्टिस ने पूछा- दखल देने का अधिकार किसने दिया

सुप्रीम कोर्ट ने NALSAR लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों के खिलाफ BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के निर्देशों पर कड़ी नाराजगी जताई और विरोध के अधिकार को सही ठहराया।

Aug 15, 2026 - 16:23
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NALSAR विश्वविद्यालय विवाद में BCI को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, चीफ जस्टिस ने पूछा- दखल देने का अधिकार किसने दिया
  • SC on BCI NALSAR Row: NALSAR छात्रों पर BCI के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट नाराज, कहा- छात्रों को शांतिपूर्ण विरोध का हक
  • NALSAR छात्रों के समर्थन में आया सुप्रीम कोर्ट: BCI चेयरमैन के निर्देशों पर जताई कड़ी नाराजगी, शांतिपूर्ण विरोध को बताया अधिकार
  • Supreme Court on BCI: NALSAR छात्रों के खिलाफ BCI के आदेश पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, चीफ जस्टिस ने उठाए क्षेत्राधिकार पर सवाल

सर्वोच्च न्यायालय ने हैदराबाद स्थित प्रतिष्ठित नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों के खिलाफ बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा द्वारा जारी निर्देशों पर शुक्रवार को गहरी नाराजगी व्यक्त की है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विद्यार्थियों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रखने और असहमति दर्ज कराने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। शीर्ष अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए सवाल किया कि एक स्वायत्त विश्वविद्यालय और उसके अध्ययनरत छात्रों के आंतरिक संवाद के बीच कानूनी विनियामक संस्था बीसीआई को सीधा हस्तक्षेप करने का अधिकार किसने दिया। इस अदालती टिप्पणी के बाद अब विधि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और बार काउंसिल के विनियामक अधिकारों की सीमाओं पर कानूनी बहस तेज हो गई है।

हैदराबाद की प्रमुख राष्ट्रीय विधि यूनिवर्सिटी नालसार (NALSAR) में पिछले दिनों छात्रों द्वारा परिसर से जुड़े कुछ आंतरिक मुद्दों और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराया गया था। इस मामले का संज्ञान लेते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की ओर से छात्रों के आचरण पर सवाल उठाते हुए सख्त दिशा-निर्देश और अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी जारी की गई थी।

शुक्रवार को जब यह मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष सुनवाई के लिए आया, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बीसीआई के इस कदम पर सख्त ऐतराज जताया। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि शिक्षण संस्थानों के भीतर छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण असहमति का सम्मान किया जाना चाहिए। पीठ ने बीसीआई द्वारा सीधे छात्रों के मामलों में हस्तक्षेप करने और उन पर दंडात्मक रुख अपनाने के अधिकार क्षेत्र पर गंभीर सवाल खड़े किए।

नालसार विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों और प्रशासन के बीच विभिन्न शैक्षणिक नीतियों, परिसर की व्यवस्थाओं और संवादहीनता को लेकर असंतोष पनप रहा था। छात्रों ने अपनी मांगों को लेकर लोकतांत्रिक दायरे में रहते हुए शांतिपूर्ण सभाएं की थीं और अपनी आवाज उठाई थी। इस पर संज्ञान लेते हुए बीसीआई के शीर्ष नेतृत्व ने इसे अनुशासनहीनता के दायरे में माना और विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ-साथ छात्रों के लिए भी कड़े निर्देश जारी कर दिए थे, जिससे छात्रों के भविष्य पर असर पड़ने की आशंका बन गई थी।

जब इस मसले से संबंधित कानूनी बिंदु सुप्रीम कोर्ट की पीठ के सामने प्रस्तुत हुए, तो मुख्य न्यायाधीश ने बीसीआई के रुख पर सख्त लहजे में आपत्ति जताई। मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी यदि अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात नहीं रखेंगे तो वे भविष्य में न्याय प्रणाली की रक्षा कैसे करेंगे। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय का आंतरिक अनुशासन और छात्रों से संवाद पूरी तरह संस्थान के प्रबंधन का दायरा है, जिसमें बाहरी विनियामक संस्था को बिना वैधानिक आधार के हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

अदालत की इस कड़ी टिप्पणी पर कानूनी समुदाय और विधि विद्यार्थियों ने संतोष व्यक्त किया है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी देश भर के राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों के बुनियादी अधिकारों को मजबूती प्रदान करेगी। छात्रों के प्रतिनिधियों का कहना है कि वे केवल अपनी समस्याओं के समाधान के लिए संवाद की मांग कर रहे थे, जिसे अनुशासनहीनता का रूप देने की कोशिश की गई।

वहीं, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रतिनिधियों की ओर से यह दलील दी गई कि नियामक संस्था के रूप में उनका उद्देश्य देश में विधि शिक्षा और विधिक पेशे की गरिमा तथा अनुशासन को बनाए रखना है। हालांकि, अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद बीसीआई नेतृत्व अब अपने निर्देशों के कानूनी पहलुओं और क्षेत्राधिकार की समीक्षा करने की बात कह रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख का सीधा प्रभाव देश के तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों, विशेषकर नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) के प्रशासनिक ढांचे पर पड़ेगा। यह संदेश साफ हो गया है कि नियामक संस्थाएं अपनी शक्तियों का विस्तार विश्वविद्यालयों की दैनिक स्वायत्तता और छात्रों के संवैधानिक अधिकारों के हनन के लिए नहीं कर सकती हैं।

इसके अतिरिक्त, इस घटनाक्रम ने यह भी तय कर दिया है कि परिसर के भीतर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और विचारों की अभिव्यक्ति को सीधे तौर पर अनुशासनहीनता मानकर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। विधि महाविद्यालयों में अध्ययनरत छात्रों को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का कानूनी सुरक्षा कवच मिला है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए सवालों के बाद अब बार काउंसिल ऑफ इंडिया को इस मामले में अपना कानूनी पक्ष और अधिकार क्षेत्र का दायरा स्पष्ट करना होगा। विश्वविद्यालय प्रशासन भी अब छात्रों के साथ सीधे संवाद के जरिए लंबित मुद्दों को सुलझाने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या शीर्ष अदालत विधि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और बीसीआई के विनियामक अधिकारों के बीच स्पष्ट संतुलन बनाने के लिए कोई विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करती है। इस मामले की आगामी सुनवाई देश में कानूनी शिक्षा और छात्र अधिकारों के भविष्य के लिए बेहद निर्णायक साबित हो सकती है।

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