हर्ष फायरिंग में मौत मामला: BJP विधायक राजू सिंह को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा झटका, दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाने से इनकार
दिल्ली हाईकोर्ट ने फार्महाउस हर्ष फायरिंग में महिला की मौत के मामले में बिहार के साहिबगंज से भाजपा विधायक राजू सिंह की सजा पर रोक लगाने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी है।

- Muzaffarpur News: साहिबगंज विधायक राजू सिंह की याचिका खारिज, दिल्ली हाईकोर्ट ने सजा पर रोक लगाने की अर्जी की नामंजूर
- दिल्ली हाईकोर्ट का सख्त फैसला: फार्महाउस हर्ष फायरिंग केस में भाजपा विधायक राजू सिंह को राहत नहीं, सजा बरकरार
- Raju Singh Case: नए साल के जश्न में महिला की मौत के मामले में भाजपा विधायक को झटका, विधायकी पर मंडराया कानूनी संकट
नई दिल्ली: बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की साहिबगंज विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विधायक राजू कुमार सिंह उर्फ राजू सिंह को दिल्ली उच्च न्यायालय से बड़ा कानूनी झटका लगा है। राजधानी दिल्ली के एक फार्महाउस में नए साल के जश्न के दौरान हुई हर्ष फायरिंग में एक महिला की मौत से जुड़े मामले में उच्च न्यायालय ने विधायक की दोषसिद्धि और सजा पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है।
अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा के खिलाफ दाखिल की गई राहत याचिका पर विचार करते हुए पाया कि मामले की गंभीरता और लापरवाही से चली गोली के कारण गई एक निर्दोष जान को देखते हुए इस चरण पर सजा पर रोक लगाने का कोई ठोस आधार नहीं बनता। उच्च न्यायालय के इस कड़े रुख के बाद भाजपा विधायक की कानूनी मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं और उनकी विधायकी की सदस्यता पर भी नियमों के तहत तलवार लटक गई है।
- क्या था पूरा मामला?
यह सनसनीखेज मामला 31 दिसंबर 2018 की दरमियानी रात का है, जब दक्षिण दिल्ली के वसंत कुंज स्थित एक निजी फार्महाउस में नए साल के आगमन का जश्न मनाया जा रहा था। इस पार्टी में कई गणमान्य लोग और परिवार शामिल थे। आरोप के अनुसार, जश्न के दौरान शराब के नशे और उत्साह में अवैध रूप से हथियारों का प्रदर्शन करते हुए अंधाधुंध हर्ष फायरिंग (हवाई फायरिंग) की गई।
इसी फायरिंग के दौरान चली एक गोली वहां मौजूद अर्चना पांडे नामक महिला के सिर में जा लगी। गोली लगते ही उत्सव स्थल पर अफरा-तफरी मच गई और गंभीर रूप से घायल महिला को तुरंत नजदीकी निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। घटना के बाद आरोपी विधायक मौके से फरार हो गए थे, जिन्हें बाद में पुलिस ने लंबी मशक्कत के बाद उत्तर प्रदेश के कुशीनगर से गिरफ्तार किया था।
- निचली अदालत ने ठहराया था दोषी
दिल्ली पुलिस ने इस मामले में सघन जांच करते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या) अथवा 304A (लापरवाही से मौत) और शस्त्र अधिनियम की विभिन्न गैर-जमानती धाराओं के तहत आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया था। पुलिस ने घटनास्थल से खाली कारतूस और आग्नेयास्त्र भी जब्त किए थे।
दिल्ली की सक्षम निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने सभी गवाहों, फॉरेंसिक साक्ष्यों और बैलिस्टिक रिपोर्ट के आधार पर राजू सिंह को दोषी ठहराते हुए कारावास की सजा सुनाई थी। निचली अदालत के इसी आदेश के खिलाफ विधायक ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील दाखिल कर अपनी सजा पर रोक लगाने (Stay on Conviction) की गुहार लगाई थी, ताकि उनकी विधानसभा सदस्यता प्रभावित न हो।
- दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: लापरवाही से ली गई जान पर नरमी नहीं
दिल्ली उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि घटना पूरी तरह दुर्घटनावश हुई थी और याचिकाकर्ता का किसी की जान लेने का कोई आपराधिक इरादा नहीं था। यह भी दलील दी गई कि सजा पर रोक न लगने से जनप्रतिनिधि के रूप में उनके क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व बाधित होगा।
हालांकि, उच्च न्यायालय की पीठ ने इन तर्कों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि सार्वजनिक या निजी आयोजनों में हथियारों का बेलगाम प्रदर्शन और हर्ष फायरिंग समाज के लिए एक घातक प्रवृत्ति बन चुकी है। लाइसेंसी या गैर-लाइसेंसी हथियारों से हवा में गोलियां दागना एक घोर गैर-जिम्मेदाराना कृत्य है, जिससे आम नागरिकों के जीवन को सीधा खतरा पैदा होता है। जब किसी कृत्य के कारण एक व्यक्ति की जान चली जाती है, तो अदालतें ऐसे मामलों में हल्के में राहत नहीं दे सकतीं। अदालत ने उनकी सजा पर रोक की मांग को खारिज कर दिया।
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत सदस्यता पर खतरा
उच्च न्यायालय द्वारा सजा पर रोक लगाने से इनकार करने के बाद अब साहिबगंज विधायक की राजनीतिक राह बेहद कठिन हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) की धारा 8(3) के अनुसार, यदि किसी मौजूदा सांसद या विधायक को किसी आपराधिक मामले में दो वर्ष या उससे अधिक के कारावास की सजा सुनाई जाती है, तो उसकी सदन की सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द हो जाती है और वह सजा पूरी होने के बाद छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाता है।
यदि ऊपरी अदालत से दोषसिद्धि (कनविक्शन) पर स्थगन नहीं मिलता है, तो विधानसभा सचिवालय द्वारा सदस्यता निरस्त करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। इस फैसले के बाद मुजफ्फरपुर और बिहार के सियासी गलियारों में भारी चर्चा छिड़ गई है। विपक्षी दलों ने फैसले का स्वागत करते हुए कानून के राज की जीत बताया है, जबकि विधायक के कानूनी सलाहकार अब इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने की तैयारी कर रहे हैं।
What's Your Reaction?

