खनऊ रेलवे स्टेशन का रहस्यमयी 'भेड़िया लड़का': 1954 में 9 साल के रामू की खोज, भेड़िए जैसी बनावट और हजारों लोगों का आकर्षण।
1954 की एक सर्द सुबह लखनऊ रेलवे स्टेशन पर एक 9 साल के लड़के की मौजूदगी ने पूरे शहर को हिला दिया। लड़का भूख से बेहाल था, शरीर कांप रहा था और
- 1954 का वो बच्चा जो भेड़िए की तरह चलता-बोलता था: लखनऊ स्टेशन पर मिला था रामू, दुनिया को किया था हैरान
- रामू: भूखा-कांपता बच्चा या जंगल का रहस्य: लखनऊ में मिले 9 साल के लड़के ने दुनिया को हैरान किया, नाम रामू रखा गया
1954 की एक सर्द सुबह लखनऊ रेलवे स्टेशन पर एक 9 साल के लड़के की मौजूदगी ने पूरे शहर को हिला दिया। लड़का भूख से बेहाल था, शरीर कांप रहा था और उसकी शारीरिक बनावट बेहद असामान्य थी। उसकी आंखें भेड़िए जैसी चमकती थीं, दांत नुकीले थे, हाथ-पैर असामान्य रूप से मजबूत लगते थे और वह चारों हाथ-पैरों के बल चलता था। शुरुआत में कुछ लोगों ने उसे वेटिंग रूम में देखा तो कुछ ने कहा कि वह एक खाली डिब्बे में पड़ा मिला था। उसकी त्वचा पर बालों की तरह घना रोम था और वह बहुत तेजी से भागता था। स्थानीय पुलिस ने उसे उठाकर बलरामपुर अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उसकी जांच शुरू की।
अस्पताल पहुंचते ही लड़के के बारे में खबर फैल गई। हजारों लोग उसे देखने आने लगे। पत्रकार, कैमरामैन, राजनेता, डॉक्टर, विद्वान और आम नागरिक रोजाना अस्पताल पहुंचते। लड़के को एक अलग कमरे में रखा गया था। वहां उसकी हरकतें देखकर लोग हैरान रह जाते थे। वह भोजन को हाथों से नहीं बल्कि मुंह से खाता था, जमीन पर लेटकर सोता था और कभी-कभी भेड़िए की तरह गुर्राता था। डॉक्टरों ने उसका नाम रामू रखा। रामू का शरीर सामान्य बच्चों से अलग था। उसकी हड्डियां मजबूत थीं, नाखून लंबे और तेज थे और वह बहुत तेजी से दौड़ता था।
रामू की खोज के बाद उसकी कहानी पूरे देश में फैल गई। दुनिया की प्रमुख पत्रिकाओं ने भी उस पर विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की। कई विदेशी पत्रकार भारत आए और अस्पताल पहुंचकर रामू को देखा। उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी रामू के स्वास्थ्य, सुरक्षा और देखभाल को लेकर सवाल उठाए गए। विधायकों ने पूछा कि इस बच्चे का क्या होगा, उसकी जांच कैसे हो रही है और क्या वह सामान्य जीवन जी पाएगा। अस्पताल में उसकी देखभाल के लिए विशेष व्यवस्था की गई। डॉक्टरों ने उसे दूध, फल और अन्य भोजन देने की कोशिश की लेकिन रामू को केवल कच्चा मांस और कच्ची सब्जियां पसंद आती थीं।
समय के साथ रामू की हालत में कुछ सुधार हुआ। वह धीरे-धीरे दो पैरों पर चलना सीख गया। उसने कुछ शब्द बोलना शुरू किया। डॉक्टरों ने बताया कि उसकी शारीरिक बनावट जन्मजात थी और वह जंगल में पला-बढ़ा हो सकता है। कुछ लोगों ने दावा किया कि वह भेड़ियों के साथ रहता था इसलिए उसकी आदतें भेड़िए जैसी हैं। रामू की कहानी पर कई वर्षों तक नजर रखी गई। उसकी तस्वीरें और रिपोर्ट्स प्रकाशित होती रहीं। रामू को अस्पताल में ही रखा गया और उसकी देखभाल जारी रही।
रामू की खोज ने मानवशास्त्र, मनोविज्ञान और चिकित्सा क्षेत्र में चर्चा पैदा की। कई विशेषज्ञों ने उसकी जांच की। कुछ ने कहा कि वह फेरल चाइल्ड है यानी जंगल में पला-बढ़ा बच्चा। फेरल बच्चों की दुनिया में कई उदाहरण थे लेकिन रामू की कहानी भारत में बहुत चर्चित हुई। उसकी शारीरिक बनावट, व्यवहार और बोलचाल पर अध्ययन हुआ। डॉक्टरों ने पाया कि उसकी मांसपेशियां सामान्य बच्चों से ज्यादा मजबूत थीं और वह ठंड में भी बिना कपड़ों के आराम से रहता था।
रामू को सामान्य जीवन में लाने की कोशिशें की गईं। उसे कपड़े पहनाने, बर्तन से खाना खाने और बोलना सिखाने का प्रयास किया गया। धीरे-धीरे वह कुछ शब्द बोलने लगा। उसकी आंखों में भेड़िए जैसी चमक कम हुई लेकिन उसकी हरकतें अभी भी असामान्य थीं। रामू की कहानी 1954 से 1960 तक प्रमुखता से चर्चा में रही। बाद में उसकी स्थिति पर कम जानकारी उपलब्ध हुई। अस्पताल में उसकी देखभाल जारी रही और वह वहीं रहा।
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