अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस से निष्कासन के बाद विधायक ऋतव्रत बनर्जी का आया सबसे बड़ा और चौंकाने वाला बयान, सियासी गलियारों में मची भारी हलचल

पश्चिम बंगाल की अत्यंत गर्म और अप्रत्याशित राजनीति के भीतर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) द्वारा अपने दो विधायकों को

Jun 3, 2026 - 12:45
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अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस से निष्कासन के बाद विधायक ऋतव्रत बनर्जी का आया सबसे बड़ा और चौंकाने वाला बयान, सियासी गलियारों में मची भारी हलचल
अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस से निष्कासन के बाद विधायक ऋतव्रत बनर्जी का आया सबसे बड़ा और चौंकाने वाला बयान, सियासी गलियारों में मची भारी हलचल
  • 'ममता बनर्जी की मूल तृणमूल कांग्रेस पूरी तरह हाईजैक हो चुकी है', वैचारिक मतभेदों के बावजूद पार्टी की मूल विचारधारा के साथ खड़े रहने का बड़ा दावा
  • हस्ताक्षर जालसाजी विवाद और विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष शिकायत के बाद शुरू हुआ पश्चिम बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा अंदरूनी घमासान

पश्चिम बंगाल की अत्यंत गर्म और अप्रत्याशित राजनीति के भीतर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) द्वारा अपने दो विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किए जाने के बाद से एक बहुत बड़ा भूचाल आ गया है। इस पूरे प्रशासनिक और अनुशासनात्मक संकट के बीच पार्टी से बाहर निकाले गए उलूबेरिया पूर्व विधानसभा सीट के नवनिर्वाचित विधायक ऋतव्रत बनर्जी का एक बेहद महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला बयान सामने आया है, जिसने समूचे राजनीतिक परिदृश्य को एक नई बहस में धकेल दिया है। अपनी प्राथमिक सदस्यता से हटाए जाने के ठीक बाद उन्होंने एक अत्यंत आक्रामक और कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि वे आज भी और भविष्य में भी स्वयं को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की मूल विचारधारा और उसकी सर्वोच्च नेता ममता बनर्जी की बुनियादी नीतियों के साथ मजबूती से खड़ा पाते हैं। उनके इस विरोधाभासी और कड़े बयान ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि निष्कासन के इस दौर में इस तरह की प्रतिबद्धता दिखाने के पीछे की असली आंतरिक रणनीति और वैचारिक समीकरण क्या हो सकते हैं।

इस पूरे बड़े और हाई-प्रोफाइल विवाद की जड़ें उस समय से जुड़ी हुई हैं जब राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता के चयन को लेकर पार्टी के भीतर एक बहुत बड़ा और गंभीर गतिरोध उभर कर सामने आया था। ऋतव्रत बनर्जी और उनके साथी विधायक संदीपन साहा ने बेहद सनसनीखेज आरोप लगाते हुए दावा किया था कि पार्टी नेतृत्व द्वारा विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए एक महत्वपूर्ण आधिकारिक पत्र में उनके जाली और फर्जी हस्ताक्षरों का उपयोग किया गया है। इस पत्र में शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता मनोनीत करने के लिए पार्टी के विधायकों की सहमति दिखाई गई थी, जिस पर दोनों विधायकों ने अपनी लिखित आपत्ति दर्ज कराते हुए सीधे तौर पर इसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का खुला हनन करार दिया। इस गंभीर और वैधानिक शिकायत के सार्वजनिक होते ही पार्टी आलाकमान ने तुरंत एक आपातकालीन समीक्षा बैठक बुलाई और बिना किसी प्रकार का कारण बताओ नोटिस जारी किए या आंतरिक जांच किए, दोनों विधायकों को तत्काल प्रभाव से संगठन से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

अपनी बर्खास्तगी के तुरंत बाद दिए गए एक बेहद विस्तृत और भावनात्मक प्रेस वक्तव्य में विधायक ऋतव्रत बनर्जी ने पार्टी के वर्तमान आंतरिक सांगठनिक ढांचे पर बेहद तीखे और सीधे प्रहार किए हैं। उन्होंने पूरी गंभीरता के साथ यह बड़ा दावा किया कि ममता बनर्जी द्वारा दशकों के कड़े संघर्ष और जमीनी आंदोलनों के दम पर खड़ी की गई इस मूल पार्टी को अब कुछ विशेष स्वार्थी और गैर-राजनीतिक तत्वों द्वारा पूरी तरह से 'हाइजैक' यानी बंधक बना लिया गया है। उनके मुताबिक, वर्तमान समय में संगठन के भीतर किसी भी निर्वाचित जनप्रप्रतिनिधि या वरिष्ठ जमीनी नेता के पास अपनी स्वतंत्र बात रखने, लोकतांत्रिक असहमति जताने या सच बोलने की कोई न्यूनतम जगह या स्वतंत्रता शेष नहीं रह गई है। जो भी व्यक्ति पार्टी के भीतर चल रही किसी भी तरह की गलत प्रशासनिक प्रक्रिया या तानाशाही रवैये के खिलाफ अपनी आवाज उठाने की थोड़ी सी भी हिम्मत दिखाता है, उसे तुरंत साजिशों के तहत किनारे लगा दिया जाता है या पूरी तरह से निष्कासित कर दिया जाता है।

इस बड़े और बहुआयामी राजनीतिक नाटक में एक और सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब इस पूरे मामले की कड़ियों को राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी द्वारा आयोजित एक बेहद महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस के साथ जोड़कर देखा जाने लगा। मुख्यमंत्री ने राज्य सचिवालय 'नवान्न' में आयोजित अपनी वार्ता के दौरान इस बात की आधिकारिक घोषणा की थी कि तृणमूल कांग्रेस के दो सत्ताधारी विधायकों ने अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ जाली दस्तखत करने का एक बेहद गंभीर और कानूनी मामला विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष दर्ज कराया है। इस घोषणा के महज कुछ ही मिनटों के भीतर तृणमूल कांग्रेस की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य के हस्ताक्षरों से दोनों विधायकों की प्राथमिक सदस्यता को पूरी तरह से निरस्त करने का एक सख्त और दंडात्मक आदेश जारी कर दिया गया। इस त्वरित कार्रवाई ने इस बात को पूरी तरह साफ कर दिया कि पार्टी किसी भी कीमत पर आंतरिक असंतोष या अपने किसी नेता द्वारा विपक्षी खेमे के साथ किसी भी प्रकार के सीधे संवाद को बिल्कुल भी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

इस पूरी बड़ी और दंडात्मक कार्रवाई पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए तृणमूल कांग्रेस की सर्वोच्च नेता और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने भी अपनी गहरी नाराजगी और निराशा को खुलकर व्यक्त किया है। उन्होंने राज्य विधानसभा चुनावों के परिणामों और पार्टी के भीतर की मौजूदा परिस्थितियों का हवाला देते हुए कहा कि कुछ ऐसे नेता जिन्हें पूर्व में अन्य दलों से आने के बावजूद पार्टी ने अपने वफादार और पुराने कार्यकर्ताओं की प्राथमिकताओं को दरकिनार करके चुनावी टिकट दिया और सांसद व विधायक जैसे बड़े और गरिमापूर्ण पदों तक पहुंचाया, वे ही आज संकट के समय में पीठ दिखाकर जा रहे हैं। उनका मानना है कि जैसे ही चुनावी परिणामों में कुछ उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं, वैसे ही कुछ नेताओं का झुकाव और उनकी आंतरिक समझ विकसित रूप से दूसरे राजनीतिक दलों और विचारधाराओं की तरफ बढ़ने लगती है, जो पूरी तरह से अनैतिक और राजनीतिक अवसरवाद का सबसे निकृष्ट उदाहरण है।

कानूनी और संवैधानिक मोर्चे पर इस पूरे घटनाक्रम को देखा जाए तो दो विधायकों के अचानक निष्कासन के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर तृणमूल कांग्रेस के कुल विधायकों की संख्या अब घटकर केवल अठहत्तर रह गई है, जिससे सदन के भीतर की दलीय ताकत और समीकरणों में भी एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। इस बीच, हस्ताक्षरों की इस कथित जालसाजी और धोखाधड़ी के बेहद संवेदनशील मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य की शीर्ष जांच एजेंसी यानी 'क्राइम इंवेस्टिगेशन डिपार्टमेंट' (CID) ने भी अपनी एक स्वतंत्र और गहन जांच शुरू कर दी है। सीआईडी की एक विशेष टीम ने इस विवादित पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले कई अन्य विधायकों से भी पूछताछ की है ताकि यह साफ हो सके कि क्या वाकई में कुल चौदह विधायकों के हस्ताक्षरों के साथ किसी प्रकार की प्रशासनिक या तकनीकी छेड़छाड़ की गई थी, या यह पूरा मामला केवल एक सोची-समझी राजनीतिक बगावत का हिस्सा है।

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