Special: अर्जुन मुंडा, रघुवर दास और चम्पाई सोरेन के नामों पर तैरती अटकलें, दिल्ली दरबार की अंतिम मुहर पर टिकी सबकी निगाहें।
झारखंड के राजनैतिक गलियारों में इन दिनों आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां अपने चरम पर पहुंच चुकी हैं। भारत
By Vijay Laxmi Singh (Editor- In- Chief)
- झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए सियासी रण तैयार, भाजपा उम्मीदवारों के चयन को लेकर बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी
- पार्टी के भीतर किसी भी प्रकार की गुटबाजी या अंतर्कलह से बाबूलाल मरांडी का साफ इंकार, अंतरात्मा की आवाज पर जीत का बड़ा दावा
झारखंड के राजनैतिक गलियारों में इन दिनों आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां अपने चरम पर पहुंच चुकी हैं। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जून 2026 में होने वाले इस उच्च सदन के चुनाव की आधिकारिक अधिसूचना जारी किए जाने के बाद से ही सूबे के तमाम प्रमुख राजनैतिक दल अपनी-अपनी बिसात बिछाने में जुट गए हैं। झारखंड में कुल दो राज्यसभा सीटों के लिए मतदान होना निर्धारित हुआ है, जिनमें से एक सीट झामुमो के कद्दावर नेता शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली हुई है, जबकि दूसरी सीट निवर्तमान सांसद दीपक प्रकाश का कार्यकाल पूरा होने के कारण रिक्त हो रही है। इस चुनावी घोषणा के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी के भीतर उच्च सदन की मानद टिकट हासिल करने की होड़ काफी तेज हो गई है, जिससे राज्य इकाई से लेकर केंद्रीय कमान तक बैठकों का दौर लगातार जारी है।
इस बार भाजपा की तरफ से उच्च सदन की इस सीट के लिए जिन नामों की चर्चाएं सबसे तेजी से तैर रही हैं, उनमें राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के नाम शामिल हैं, जिससे पूरी चयन प्रक्रिया बेहद दिलचस्प और हाई-प्रोफाइल हो चुकी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कद्दावर आदिवासी चेहरा अर्जुन मुंडा, ओडिशा के वर्तमान राज्यपाल रघुवर दास और हाल ही में झारखंड मुक्ति मोर्चा को अलविदा कहकर भाजपा का दामन थामने वाले दिग्गज नेता चम्पाई सोरेन के नामों को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। इन तीनों ही नेताओं का राज्य की राजनीति में अपना एक बहुत बड़ा कद और जनाधार है। पिछले विधानसभा चुनाव के समीकरणों और सांगठनिक फेरबदल के बाद इन तीनों ही दिग्गजों को मुख्यधारा की सक्रिय संसदीय राजनीति में स्थापित करने के लिए यह चुनाव एक बेहद मुफीद और बड़ा जरिया माना जा रहा है।
इस पूरे राजनैतिक परिदृश्य और टिकट वितरण को लेकर चल रही भारी खींचतान के बीच झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और सूबे के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी का एक बहुत बड़ा और निर्णायक बयान सामने आया है। रांची में आयोजित एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान उन्होंने इन सभी अटकलों और तीन नामों की होड़ पर खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय जनता पार्टी एक पूर्णतः अनुशासित और लोकतांत्रिक पार्टी है, जहां उम्मीदवारों का चयन किसी व्यक्ति विशेष की इच्छा पर नहीं बल्कि संसदीय बोर्ड की सर्वसम्मति से होता है। उन्होंने पार्टी के भीतर इन तीनों बड़े नामों को लेकर किसी भी प्रकार के मतभेद या अंदरूनी गुटबाजी की खबरों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सभी नेता एकजुट हैं और केंद्रीय नेतृत्व का हर निर्णय सर्वमान्य होगा। झारखंड विधानसभा की वर्तमान दलीय स्थिति के अनुसार, सत्ताधारी गठबंधन के पास पर्याप्त संख्या बल मौजूद है, जिससे एक सीट पर उनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है। वहीं, दूसरी सीट के लिए संख्या बल का गणित काफी पेचीदा है, लेकिन बाबूलाल मरांडी ने विधायकों की 'अंतरात्मा की आवाज' का हवाला देते हुए दावा किया है कि भाजपा का उम्मीदवार हर हाल में विजयी होगा।
टिकट की रेस में शामिल चेहरों की राजनैतिक प्रासंगिकता की बात करें तो अर्जुन मुंडा को जहां दिल्ली की राजनीति का लंबा अनुभव है और वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में जनजातीय मामलों के विभाग को संभाल चुके हैं, वहीं उनकी साख संगठन के भीतर बेहद मजबूत मानी जाती है। दूसरी तरफ, रघुवर दास जो इस समय संवैधानिक पद पर रहते हुए ओडिशा के राज्यपाल की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, उनके बारे में माना जा रहा है कि वे दोबारा सक्रिय राष्ट्रीय राजनीति में लौटने के इच्छुक हैं ताकि उनके पांच साल के गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री के प्रशासनिक अनुभव का लाभ पार्टी को मिल सके। इन दोनों के बीच चम्पाई सोरेन का दावा भी बेहद पुख्ता है, जिन्होंने झामुमो से बगावत कर कोल्हान क्षेत्र में भाजपा को एक नई ऊर्जा देने का काम किया था और उन्हें उच्च सदन में भेजकर पार्टी आदिवासी समाज में एक बड़ा संदेश देने की रणनीति बना सकती है।
सांगठनिक स्तर पर इस चुनाव के ठीक पहले झारखंड भाजपा की आंतरिक संरचना में भी एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव देखने को मिला है, जिसने पार्टी की भविष्य की चुनावी तैयारियों को स्पष्ट किया है। राज्यसभा सदस्य आदित्य साहू को बाबूलाल मरांडी के स्थान पर आधिकारिक रूप से झारखंड भारतीय जनता पार्टी का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, क्योंकि मरांडी वर्तमान में विधानसभा के भीतर नेता प्रतिपक्ष की बेहद महत्वपूर्ण और समय मांगने वाली जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। इस बदलाव के बाद नए प्रदेश अध्यक्ष और पूरी कोर कमेटी के सामने सबसे पहली और बड़ी चुनौती राज्यसभा के इस बेहद कड़े मुकाबले में अपने उम्मीदवार की सुरक्षित जीत सुनिश्चित करना और वोट बैंक के बिखरने की किसी भी संभावना को पूरी तरह से समाप्त करना है।
What's Your Reaction?







