ग्रामीण भारत में नकदी संकट की आहट, छोटे शहरों और कस्बों में बड़े पैमाने पर ATM बंद होने की आशंका

भारतीय बैंकिंग प्रणाली के तहत देश के दूर-दराज के क्षेत्रों और छोटे कस्बों में रहने वाले आम उपभोक्ताओं के लिए एक बेहद

Jun 8, 2026 - 12:38
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ग्रामीण भारत में नकदी संकट की आहट, छोटे शहरों और कस्बों में बड़े पैमाने पर ATM बंद होने की आशंका
ग्रामीण भारत में नकदी संकट की आहट, छोटे शहरों और कस्बों में बड़े पैमाने पर ATM बंद होने की आशंका
  • SBI द्वारा मेट्रो शहरों को प्राथमिकता देने से टियर-2 और टियर-3 क्षेत्रों में मशीनों का संचालन ठप, ऑपरेटरों को भारी घाटा
  • कन्फेडरेशन ऑफ ATM इंडस्ट्री ने रिजर्व बैंक के सामने उठाई मांग, संकट न सुलझने पर ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था चरमराने का खतरा

भारतीय बैंकिंग प्रणाली के तहत देश के दूर-दराज के क्षेत्रों और छोटे कस्बों में रहने वाले आम उपभोक्ताओं के लिए एक बेहद चिंताजनक स्थिति पैदा हो रही है। देश के ग्रामीण अंचलों और टियर-2 तथा टियर-3 शहरों में आने वाले दिनों में स्वचालित टेलर मशीन यानी ATM सेवाओं पर पूरी तरह ताला लग सकता है। इस संभावित संकट के कारण आम नागरिकों को अपनी ही जमा पूंजी को नकद रूप में प्राप्त करने के लिए भारी किल्लत और दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। ATM संचालन से जुड़े उद्योग जगत के शीर्ष संगठन कन्फेडरेशन ऑफ ATM इंडस्ट्री (कैटमी) ने इस गंभीर विषय को लेकर केंद्रीय बैंक यानी भारतीय रिजर्व बैंक के समक्ष अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। संगठन का कहना है कि यदि इस नकदी संकट का समय रहते उचित समाधान नहीं निकाला गया, तो ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था और बैंकिंग बुनियादी ढांचे को बहुत बड़ा झटका लग सकता है।

इस गहराते संकट के पीछे जो सबसे मुख्य और तकनीकी वजह सामने आ रही है, वह देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) द्वारा नकदी के वितरण में अपनाई जा रही नीति है। ATM ऑपरेटरों के संगठन ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया है कि SBI द्वारा देश के टियर-1 यानी बड़े मेट्रो शहरों के ATM नेटवर्क को नकदी की आपूर्ति में विशेष प्राथमिकता दी जा रही है। मेट्रो शहरों की मशीनों में आवश्यकता से अधिक नकदी भेजी जा रही है, जिसके चलते टियर-2 और टियर-3 श्रेणी में आने वाले छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों के ATM के लिए जरूरी नकदी का कोटा पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। पूरे देश के भीतर SBI के लगभग 65,000 ATM का एक विशाल नेटवर्क संचालित होता है, जो देश की एक बहुत बड़ी आबादी की नकदी आवश्यकताओं को पूरा करता है। बैंक अपने इस विशाल नेटवर्क के लगभग आधे हिस्से, जो मुख्य रूप से महानगरों में स्थित हैं, के लिए कैश की हैंडलिंग और रीप्लेनिशमेंट की प्रक्रिया खुद अपने स्तर पर संभालता है, जिससे सारा असंतुलन पैदा हो रहा है।

प्रशासनिक और व्यावहारिक स्तर पर देखा जाए तो छोटे शहरों और ग्रामीण अंचलों में ATM को नकदी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी जिन निजी ऑपरेटरों या कंपनियों के पास है, उन्हें बैंक की शाखाओं और करेंसी चेस्ट से पर्याप्त मात्रा में कैश नहीं मिल पा रहा है। नकदी की भारी कमी होने के कारण छोटे कस्बों की मशीनें लगातार कई दिनों तक ऑफलाइन यानी बंद रहने को मजबूर हैं। जब ATM मशीनें कैश न होने के कारण काम नहीं करती हैं, तो ऑपरेटर्स को हर दिन होने वाले वित्तीय लेनदेन पर मिलने वाली ट्रांजैक्शन फीस और इंटरचेंज फीस का भारी नुकसान उठाना पड़ता है। किसी भी ATM को चालू रखने के लिए बिजली का बिल, दुकान का किराया, सुरक्षा गार्ड का वेतन और मशीन के रखरखाव का मासिक खर्च लगातार जारी रहता है, लेकिन आमदनी शून्य होने के कारण ये मशीनें अब वित्तीय रूप से पूरी तरह से अव्यवहारिक होती जा रही हैं।

वित्तीय नुकसान का बढ़ता आंकड़ा

ATM उद्योग से जुड़े संगठन ने केंद्रीय बैंक को दी गई अपनी लिखित शिकायत में यह साफ किया है कि नकदी की इस भारी किल्लत और मशीनें ऑफलाइन रहने के कारण ऑपरेटरों को अब तक 100 करोड़ रुपये से अधिक का प्रत्यक्ष नुकसान हो चुका है। इस भारी घाटे की भरपाई के लिए उद्योग संगठन ने बैंकिंग बिरादरी से मुआवजे की मांग की है और चेतावनी दी है कि यदि हालात में सुधार नहीं हुआ, तो कंपनियां इन क्षेत्रों से अपनी सेवाएं वापस ले लेंगी।

इस पूरे मामले को लेकर रिजर्व बैंक और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के शीर्ष अधिकारियों के बीच हाल ही में एक महत्वपूर्ण बैठक भी आयोजित की गई थी, जिसमें ATM उद्योग के प्रतिनिधियों ने अपनी समस्याओं को विस्तार से सामने रखा। उद्योग संगठन ने SBI को इस गंभीर समस्या के पूर्ण समाधान के लिए एक निश्चित समय सीमा दी है, जिसके तहत स्थिति को सामान्य करने का आग्रह किया गया है। यदि इस निर्धारित अवधि के भीतर छोटे शहरों के करेंसी चेस्ट में नकदी की आपूर्ति को सुचारू नहीं किया गया, तो देश के गैर-शहरी क्षेत्रों में ATM के बंद होने की गति बहुत तेज हो जाएगी। पहले से ही भारत में ATM की कुल संख्या में गिरावट दर्ज की जा रही है, जो पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले कम हुई है, और यह कमी विशेष रूप से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्थित ऑफ-साइट ATM में देखी गई है।

ATM ऑपरेटरों के लिए यह संकट केवल नकदी की कमी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि परिचालन लागत में हुई अप्रत्याशित बढ़ोतरी ने उनकी कमर तोड़ दी है। विभिन्न राज्यों में न्यूनतम मजदूरी दरों में की गई भारी वृद्धि और ईंधन की आसमान छूती कीमतों के कारण कैश वैन के संचालन का खर्च बहुत ज्यादा बढ़ गया है। दूसरी तरफ, देश के भीतर डिजिटल भुगतानों के बढ़ते चलन के कारण ATM से होने वाली मासिक नकद निकासी की संख्या में भी पिछले कुछ वर्षों के दौरान लगातार गिरावट देखने को मिली है। एक तरफ जहां आमदनी के स्रोत लगातार सिकुड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा मानकों को पूरा करने और सॉफ्टवेयर को अपग्रेड करने के लिए कंपनियों पर अतिरिक्त निवेश करने का भारी दबाव है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में ATM चलाना घाटे का सौदा बन चुका है।

इस संकट का सबसे बुरा सामाजिक और आर्थिक असर देश के उन करोड़ों गरीब परिवारों पर पड़ने की आशंका है, जो सरकारी कल्याणकारी योजनाओं और वित्तीय समावेशन के कार्यक्रमों से जुड़े हुए हैं। प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत मिलने वाली सरकारी सब्सिडी, वृद्धावस्था पेंशन और अन्य वित्तीय लाभों को नकद रूप में निकालने के लिए ग्रामीण आबादी पूरी तरह से अपने नजदीकी ATM पर निर्भर रहती है। यदि ये मशीनें बंद हो जाती हैं, तो लोगों को अपने ही पैसे निकालने के लिए कई किलोमीटर दूर जिला मुख्यालयों या बड़े शहरों की दौड़ लगानी पड़ेगी, जिससे उनके समय और पैसे दोनों की बर्बादी होगी। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों के स्थानीय बाजारों में अभी भी व्यापार का एक बहुत बड़ा हिस्सा नकद लेनदेन पर ही आधारित है, जो ATM बंद होने से बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।

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