सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 साल पहले जब मो. गजनवी ने किया था आक्रमण और 50,000 रक्षकों ने दे दिया था बलिदान....
सोमनाथ मंदिर के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जनवरी 1026 में महमूद गजनवी द्वारा किए गए पहले प्रमुख आक्रमण के ठीक 1000 वर्ष
साल 2026 सोमनाथ मंदिर के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जनवरी 1026 में महमूद गजनवी द्वारा किए गए पहले प्रमुख आक्रमण के ठीक 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। गुजरात के पश्चिमी तट पर प्रभास पाटन में स्थित यह मंदिर भारत की सभ्यता, आस्था और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक है। यह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान रखता है और सदियों से बार-बार नष्ट होने के बाद भी पुनर्निर्मित होकर खड़ा रहा है।
महमूद गजनवी ने 18 अक्टूबर 1025 को अपनी सेना के साथ मार्च शुरू किया और लगभग 80 दिनों बाद 6 जनवरी 1026 को किले वाले मंदिर नगर पर आक्रमण किया। इस हमले में मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया और शहर के लोगों तथा रक्षकों पर क्रूरता की गई। समकालीन इतिहासकारों के अनुसार लगभग 50,000 रक्षकों ने मंदिर की सुरक्षा में अपना जीवन बलिदान दिया। यह आक्रमण भारत की सभ्यता और आस्था के प्रतीक को नष्ट करने का प्रयास था, लेकिन यह प्रयास असफल रहा। इसके बाद भी मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए, जिनमें विभिन्न आक्रांता शामिल थे, लेकिन हर बार इसे पुनर्निर्मित किया गया। मध्यकालीन क्रूरता की शुरुआत 1026 से मानी जाती है, जो आगे चलकर अन्यों को प्रेरित करती रही। फिर भी मंदिर की पुनर्स्थापना की कहानी अटूट साहस और विश्वास की है।
भारत की स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने मंदिर के पुनर्निर्माण का निर्णय लिया। 1947 में दिवाली के समय उनकी यात्रा के दौरान उन्होंने मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा की। सरदार पटेल के प्रयासों से सोमनाथ ट्रस्ट की स्थापना हुई और पुनर्निर्माण कार्य शुरू हुआ। 11 मई 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में आधुनिक मंदिर का उद्घाटन हुआ, जो चालुक्य शैली में निर्मित है। यह पुनर्निर्माण भारत की एकता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बना। 2026 में इस उद्घाटन के 75 वर्ष भी पूरे हो रहे हैं।
सोमनाथ मंदिर का धार्मिक महत्व अत्यधिक है। यह प्रथम ज्योतिर्लिंग है, जिसका निर्माण चंद्रदेव द्वारा माना जाता है और बाद में भगवान कृष्ण तथा अन्यों द्वारा पुनर्निर्मित किया गया। यहां प्रतिदिन गंगाजल से महादेव का अभिषेक होता है, जो दूर-दूर से लाया जाता है। चंद्र ग्रहण के समय विशेष पूजा-अर्चना होती है और लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर त्रिवेणी संगम के निकट है, जहां कपिला, हिरण और सरस्वती नदियां मिलती हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर 8 जनवरी से 11 जनवरी 2026 तक ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ आयोजित किया जा रहा है। यह पर्व वर्ष भर चलने वाली आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों की शुरुआत है। कार्यक्रम में धार्मिक अनुष्ठान, प्रवचन, सांस्कृतिक प्रदर्शन और सामाजिक जागरूकता के आयोजन शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को इस पर्व में शामिल होंगे। यह उत्सव 1026 के आक्रमण के 1000 वर्ष और 1951 के पुनः प्रतिष्ठा के 75 वर्ष को एक साथ चिह्नित करता है।
पर्व का मुख्य विषय ‘अटूट आस्था’ है, जो भारत की सभ्यता की स्थायित्व और पुनरुत्थान की भावना को दर्शाता है। सोमनाथ मंदिर न केवल पत्थरों का ढांचा है, बल्कि अटूट विश्वास और सांस्कृतिक शक्ति का प्रतीक है। प्रधानमंत्री ने अपने लेख में कहा कि 1026 का आक्रमण क्रूर और बर्बर था, लेकिन मंदिर की कहानी विनाश की नहीं, बल्कि साहस और पुनर्निर्माण की है। सोमनाथ तक पहुंचना सुगम है। सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन वेरावल है, जो मंदिर से लगभग 5-7 किलोमीटर दूर है। वेरावल देश के प्रमुख शहरों जैसे अहमदाबाद, राजकोट, पोरबंदर और अन्य से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। सोमनाथ का अपना रेलवे स्टेशन भी है, जो निकट है।
हवाई मार्ग से आने वालों के लिए दीव एयरपोर्ट निकटतम है, जो लगभग 60-85 किलोमीटर दूर है। यहां से टैक्सी और बसें उपलब्ध हैं। अन्य विकल्पों में राजकोट एयरपोर्ट और अहमदाबाद का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा शामिल हैं, जहां से सड़क मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है। सड़क मार्ग से राजकोट, पोरबंदर, अहमदाबाद और अन्य शहरों से नियमित बस सेवाएं चलती हैं। गुजरात राज्य सड़क परिवहन निगम और निजी बसें उपलब्ध हैं। मंदिर क्षेत्र में स्थानीय परिवहन जैसे टैक्सी, ऑटो-रिक्शा और बसें आसानी से मिल जाती हैं। यह पर्व भारत की गौरवशाली सभ्यता, अडिग स्वाभिमान और पुनरुत्थान की भावना को याद करने का अवसर है। सोमनाथ की कहानी विनाश से अधिक निर्माण और विश्वास की है, जो सदियों से जारी है।
What's Your Reaction?







