Supreme Court Refuses PIL on Bihar Encounter: बिहार के भोजपुर एनकाउंटर की CBI जांच वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज, हाई कोर्ट जाने को कहा

Bihar Bhojpur Encounter: सुप्रीम कोर्ट ने भोजपुर में हुए भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर की सीबीआई जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है।

Jun 30, 2026 - 13:50
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Supreme Court Refuses PIL on Bihar Encounter: बिहार के भोजपुर एनकाउंटर की CBI जांच वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज, हाई कोर्ट जाने को कहा
Bharat Bhushan Tiwari encounter Case
  • Bharat Bhushan Tiwari Encounter Case: भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार, याचिकाकर्ता को दिया यह निर्देश
  • बिहार पुलिस एनकाउंटर मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट: सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका पर शीर्ष अदालत ने दिया बड़ा आदेश
  • Bhojpur Encounter Case: भरत भूषण तिवारी मुठभेड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत, PIL पर सुनवाई से किया मना

सर्वोच्च अदालत ने बिहार के भोजपुर जिले में पुलिस मुठभेड़ के दौरान मारे गए भरत भूषण तिवारी के मामले में दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। जून 2026 में हुई इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को झटका देते हुए कहा कि वे इस राहत के लिए संबंधित उच्च न्यायालय (पटना हाई कोर्ट) का दरवाजा खटखटा सकते हैं। इस याचिका में एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने और पूरे मामले की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई थी। शीर्ष अदालत के इस रुख के बाद अब इस मामले की कानूनी लड़ाई राज्य के उच्च न्यायालय में स्थानांतरित होती नजर आ रही है।

घटना क्या है

यह पूरा कानूनी मामला बिहार के भोजपुर जिले में घटित एक पुलिस एनकाउंटर से जुड़ा हुआ है, जिसमें भरत भूषण तिवारी नामक व्यक्ति पुलिस की गोली का शिकार हुआ था। इस मुठभेड़ को संदिग्ध और कथित तौर पर फर्जी बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता, जो पेशे से वकील हैं, उन्होंने इस घटना को 'एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग' यानी न्यायेतर हत्या का मामला बताते हुए शीर्ष अदालत से हस्तक्षेप की मांग की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की प्रकृति को देखते हुए इसे सीधे सुनने के बजाय उचित न्यायिक प्रक्रिया के तहत पहले हाई कोर्ट जाने की सलाह दी है।

पूरा घटनाक्रम

भोजपुर पुलिस और भरत भूषण तिवारी के बीच हुई इस मुठभेड़ के बाद से ही स्थानीय स्तर पर और कानूनी हलकों में सवाल उठने शुरू हो गए थे। पुलिस का दावा था कि यह कार्रवाई कानून-व्यवस्था बनाए रखने और आत्मरक्षा में की गई थी, जबकि पीड़ित पक्ष और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पुलिस की इस थ्योरी पर संदेह जताया था।

मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका में कई गंभीर मांगें उठाई गई थीं। याचिका में कहा गया था कि इस एनकाउंटर को अंजाम देने वाले सभी पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ तत्काल हत्या की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि देश में बढ़ते कथित फर्जी एनकाउंटरों और इस विशेष घटना की निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के ही किसी पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए, जो पूरे मामले की तह तक जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को सुनने के बाद स्पष्ट किया कि चूंकि यह मामला एक विशिष्ट राज्य और जिले से संबंधित है, इसलिए स्थानीय उच्च न्यायालय इसके तथ्यों का मूल्यांकन करने के लिए अधिक उपयुक्त मंच है।

संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया

अदालत के इस फैसले पर कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट अक्सर उन मामलों को सीधे सुनने से बचता है जहां वैकल्पिक न्यायिक मंच जैसे कि हाई कोर्ट उपलब्ध होते हैं। याचिकाकर्ता वकील ने कोर्ट के रुख पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "हम न्याय की गुहार लेकर शीर्ष अदालत आए थे। अदालत ने हमारी मांगों को खारिज नहीं किया है, बल्कि हमें सही मंच पर जाने को कहा है। हम जल्द ही सभी प्रासंगिक तथ्यों और सबूतों के साथ पटना हाई कोर्ट में याचिका दायर करेंगे।"

दूसरी तरफ, बिहार पुलिस और राज्य प्रशासन की ओर से इस मामले में लगातार यह रुख अपनाया गया है कि मुठभेड़ पूरी तरह वास्तविक थी और पुलिसकर्मियों ने कानून के दायरे में रहकर अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की थी।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सीधा असर इस मामले की जांच की गति पर पड़ेगा। चूंकि अब यह मामला पटना हाई कोर्ट जाएगा, इसलिए स्थानीय स्तर पर साक्ष्यों और पुलिस रिपोर्टों की नए सिरे से स्क्रूटनी होगी। इस आदेश से पुलिस महकमे को अस्थाई राहत जरूर मिली है, क्योंकि तत्काल प्रभाव से किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी की जांच के आदेश नहीं दिए गए हैं। हालांकि, मुठभेड़ों को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा साल 2014 में जारी की गई 'पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य' की गाइडलाइंस के तहत वैसे भी हर एनकाउंटर की मजिस्ट्रेट जांच या स्वतंत्र सीआईडी जांच अनिवार्य होती है, जिसका पालन राज्य सरकार को करना होगा।

अब इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पटना हाई कोर्ट में एक नई रिट याचिका या जनहित याचिका दायर की जाएगी। हाई कोर्ट इस बात की समीक्षा करेगा कि क्या स्थानीय पुलिस ने एनकाउंटर के बाद तय कानूनी प्रक्रियाओं और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के दिशा-निर्देशों का पालन किया है या नहीं। यदि उच्च न्यायालय को पुलिस की जांच रिपोर्ट में कोई विसंगति नजर आती है, तो वह मामले की जांच सीबीआई या किसी अन्य स्वतंत्र विंग को सौंपने का आदेश जारी कर सकता है। आने वाले दिनों में बिहार पुलिस द्वारा कोर्ट में पेश की जाने वाली केस डायरी और फोरेंसिक रिपोर्ट इस मामले की दिशा तय करने में सबसे महत्वपूर्ण साबित होगी।

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