El Nino Impact on Indian Monsoon 2026: पिछले 100 साल में तीसरा सबसे सूखा जून, एल-नीनो के कारण देश में 42% कम बरसे बदरा

El Nino Impact 2026: प्रशांत महासागर में सक्रिय एल-नीनो के चलते भारत में जून का महीना पिछले 100 वर्षों में तीसरा सबसे सूखा महीना दर्ज होने जा रहा है, जिसमें 42% बारिश की कमी रही।

Jun 30, 2026 - 13:55
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El Nino Impact on Indian Monsoon 2026: पिछले 100 साल में तीसरा सबसे सूखा जून, एल-नीनो के कारण देश में 42% कम बरसे बदरा
El Nino impact Indian monsoon
  • IMD Monsoon Rain Deficiency Report: एल-नीनो ने बिगाड़ा मानसून का खेल, 1927 के बाद इस साल जून में हुई रिकॉर्ड तोड़ कम बारिश
  • 100 साल में तीसरी बार सूखा रहा जून का महीना, मौसम विभाग ने बताया अब जुलाई में कब से रफ्तार पकड़ेगा मानसून
  • Monsoon Update 2026: एल-नीनो के असर से जून महीने में 42 प्रतिशत बारिश की भारी कमी, आईएमडी ने जारी किया जुलाई का पूर्वानुमान

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और वैश्विक जलवायु डेटा के विश्लेषण के अनुसार, प्रशांत महासागर में सक्रिय एल-नीनो (El Nino) का प्रतिकूल प्रभाव इस साल भारतीय मानसून पर साफ दिखाई दे रहा है। वर्ष 1927 से 2026 तक के पिछले 100 वर्षों के मौसम इतिहास में यह तीसरा ऐसा मौका है, जब जून का महीना देश के लिए सबसे सूखा साबित होने जा रहा है। जून के आखिरी दिन यानी मंगलवार तक दर्ज आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में सामान्य के मुकाबले 42% कम वर्षा हुई है। इस लेटलतीफी और सूखे ने कृषि क्षेत्र की चिंताएं बढ़ा दी हैं। हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जुलाई के पहले सप्ताह से मानसून दोबारा रफ्तार पकड़ेगा और देश के कई हिस्सों में झमाझम बारिश का दौर शुरू होगा।

प्रशांत महासागर की सतह के गर्म होने की घटना, जिसे वैज्ञानिक भाषा में एल-नीनो कहा जाता है, इस समय भारतीय उपमहाद्वीप के मानसून को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। आम तौर पर 1 जून से शुरू होने वाले मानसूनी सीजन में जून के महीने को देश भर में खेती-किसानी और जलाशयों को भरने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन इस साल एल-नीनो की मध्यम तीव्रता के कारण हवाओं का रुख बदल गया है, जिससे मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ गई हैं। इसके परिणामस्वरूप, देश के चारों हिस्सों (उत्तर, दक्षिण, पूर्व और मध्य भारत) में औसत से काफी कम बारिश दर्ज की गई है, जो पिछले एक दशक के सबसे कमजोर मानसूनी शुरुआती आंकड़ों में से एक है।

बारिश के आंकड़े

आंकड़ों की नजर से देखें तो जून के महीने में अब तक पूरे देश में औसतन केवल 92.2 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई है। जबकि ऐतिहासिक और सामान्य तौर पर यह आंकड़ा 157.7 मिलीमीटर होना चाहिए था। यदि जून के अंतिम दिन यानी मंगलवार को कुछ राज्यों में बेहतर बारिश होती भी है, तो भी यह कुल मिलाकर 100 मिलीमीटर के आसपास ही सिमट कर रह जाएगी।

मौसम इतिहास के पिछले 100 वर्षों के रिकॉर्ड को खंगालें तो इससे पहले केवल दो बार ही जून का महीना इससे अधिक सूखा रहा है। साल 2009 में जून के दौरान महज 87.5 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जबकि साल 2014 में यह आंकड़ा 92.1 मिलीमीटर था। चिंता की बात यह है कि ये तीनों सबसे सूखे साल पिछले 20 वर्षों के भीतर ही दर्ज किए गए हैं, जो वैश्विक जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरों की ओर इशारा करते हैं। 4 जून को केरल के तट पर दस्तक देने के बाद से ही मानसून की चाल बेहद सुस्त बनी हुई है।

अंतरराष्ट्रीय चिंता

अमेरिकी मौसम एजेंसी 'इंटरनेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी' (IRI) की होरिजन रिपोर्ट के अनुसार, प्रशांत महासागर के क्षेत्र में तापमान लगातार बढ़ रहा है। एजेंसी का कहना है कि एल-नीनो इस समय मध्यम तीव्रता के करीब पहुंच चुका है और आने वाले महीनों में इसके और अधिक मजबूत होने की पूरी आशंका है। यदि ऐसा होता है, तो आगामी हफ्तों में भी मानसूनी चक्र प्रभावित हो सकता है।

वहीं, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के वैज्ञानिकों का कहना है कि शुरुआती सुस्ती के बावजूद घबराने की जरूरत नहीं है। स्थानीय मौसमी प्रणालियों और हिंद महासागर के बदलते पैटर्न के कारण जुलाई में स्थिति सुधरेगी। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि वे सिंचाई के वैकल्पिक साधनों को तैयार रखें और धान की रोपाई के समय मौसम के लाइव अपडेट्स पर ध्यान दें।

जून में हुई इस रिकॉर्ड तोड़ कम बारिश का सबसे बुरा असर मध्य भारत पर पड़ा है, जो देश का प्रमुख कृषि बेल्ट माना जाता है। क्षेत्रवार आंकड़ों का विश्लेषण इस प्रकार है:

  • मध्य भारत: यहां सामान्य से सबसे अधिक यानी 54% तक बारिश की कमी देखी गई है, जिससे बुवाई के काम में देरी हो रही है।

  • पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत: इस हिस्से में भी मानसूनी सीजन की शुरुआत बेहद कमजोर रही और यहाँ 41% की कमी दर्ज की गई।

  • उत्तर-पश्चिमी भारत: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी समेत इस क्षेत्र में बारिश का आंकड़ा सामान्य से 30% कम रहा।

  • दक्षिण भारत: केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु समेत दक्षिणी प्रायद्वीप में भी 28% कम वर्षा हुई है।

इस भारी कमी के कारण देश के कई बड़े बांधों और जलाशयों में पानी का स्तर गिर गया है, जिससे आने वाले समय में पेयजल और सिंचाई दोनों के लिए संकट खड़ा हो सकता है।

राहत की बात यह है कि जून की इस गंभीर कमी के बाद जुलाई का महीना अच्छी उम्मीदें लेकर आ रहा है। आईएमडी (IMD) के ताजा पूर्वानुमान के अनुसार, जुलाई के पहले सप्ताह से ही मध्य भारत सहित देश के अधिकांश हिस्सों में मानसूनी हवाएं एक बार फिर सक्रिय होने जा रही हैं। बंगाल की खाड़ी में बनने वाले संभावित कम दबाव के क्षेत्र के कारण मानसून अपनी गति पकड़ेगा, जिससे सूखे पड़े खेतों को बड़ी राहत मिलेगी। मौसम विभाग का अनुमान है कि जुलाई और अगस्त के महीनों में होने वाली बारिश जून की इस कमी की काफी हद तक भरपाई कर सकती है।

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