भिंडी की फसल में येलो वेन मोजैक वायरस से भारी नुकसान की आशंका।

भिंडी की खेती भारत में विशेष रूप से ग्रीष्मकालीन मौसम में फरवरी से मार्च के बीच शुरू हो जाती है, जब किसान गर्मी की भिंडी की बुवाई की तैयारियां

Mar 13, 2026 - 10:50
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भिंडी की फसल में येलो वेन मोजैक वायरस से भारी नुकसान की आशंका।
भिंडी की फसल में येलो वेन मोजैक वायरस से भारी नुकसान की आशंका।
  • सफेद मक्खी नियंत्रण और रोग-प्रतिरोधी किस्मों से 80-90% तक पैदावार बचाई जा सकती है
  • बीज उपचार, समय पर बुवाई और एकीकृत प्रबंधन से फसल सुरक्षित रखें

भिंडी की खेती भारत में विशेष रूप से ग्रीष्मकालीन मौसम में फरवरी से मार्च के बीच शुरू हो जाती है, जब किसान गर्मी की भिंडी की बुवाई की तैयारियां तेज कर देते हैं। इस दौरान येलो वेन मोजैक वायरस (OYVMV) सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है, जो सफेद मक्खी (Bemisia tabaci) द्वारा फैलता है। यह वायरस पौधों की पत्तियों की नसों को पीला कर देता है, पौधे बौने रह जाते हैं, फल छोटे और कठोर हो जाते हैं तथा बाजार योग्य नहीं रहते। यदि समय पर नियंत्रण न किया जाए तो यह रोग 80 से 90 प्रतिशत तक पैदावार को कम कर सकता है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान होता है। यह रोग मुख्य रूप से बेगोमोवायरस परिवार से संबंधित है और इसका प्रसार गर्म तथा शुष्क मौसम में तेजी से होता है, जहां सफेद मक्खी की संख्या बढ़ जाती है।

रोग के लक्षण शुरुआत में पत्तियों की नसों पर पीली धारियां दिखाई देती हैं, जो धीरे-धीरे पूरे पत्ते को पीला कर देती हैं। संक्रमित पौधों में विकास रुक जाता है, फूल कम लगते हैं और फल विकृत हो जाते हैं। सफेद मक्खी वायरस को पौधे से पौधे तक लगातार फैलाती है, जिससे एक खेत में जल्दी ही पूरे क्षेत्र में संक्रमण फैल सकता है। उच्च तापमान और मध्यम वर्षा वाले मौसम में सफेद मक्खी की आबादी बढ़ने से रोग का प्रकोप अधिक होता है, जबकि उच्च आर्द्रता और कम तापमान में इसका प्रभाव कम रहता है। यह वायरस पौधों के द्वितीयक चयापचय को भी प्रभावित करता है, जिससे पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है और कुल उत्पादन में कमी आती है।

रोग से बचाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन है। पूसा ए-4, अरका अनामिका, परभणी क्रांति, अरका अभय और वर्षा उफर जैसी किस्में येलो वेन मोजैक वायरस के प्रति अच्छी प्रतिरोधक क्षमता दिखाती हैं। इन किस्मों में संक्रमण का स्तर कम रहता है और पैदावार भी अच्छी मिलती है। हाल के अध्ययनों में इन किस्मों को ग्रीष्मकालीन बुवाई के लिए उपयुक्त पाया गया है, जहां सफेद मक्खी की गतिविधि अधिक होती है। संवेदनशील किस्मों से बचना चाहिए, क्योंकि वे जल्दी प्रभावित हो जाती हैं। प्रतिरोधी किस्में न केवल रोग को रोकती हैं बल्कि उच्च उपज वाली भी होती हैं, जो किसानों के लिए लाभदायक साबित होती हैं।

बीज उपचार रोग प्रबंधन की पहली पंक्ति है। बुवाई से पहले बीजों को 4-6 घंटे साफ पानी में भिगोने से अंकुरण दर बढ़ती है और पौधे मजबूत बनते हैं। इसके अलावा इमिडाक्लोप्रिड जैसे कीटनाशक से बीज उपचार किया जा सकता है, जो सफेद मक्खी के प्रारंभिक हमले को रोकता है। भिगोए गए बीजों में अंकुरण बेहतर होने से पौधे जल्दी स्थापित हो जाते हैं और रोग का खतरा कम होता है। यह सरल तरीका किसानों के लिए आसानी से अपनाया जा सकता है और फसल की शुरुआत मजबूत बनाता है।

सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड सबसे प्रभावी साबित हुआ है। इसका छिड़काव बीज उपचार के साथ मिलाकर किया जाए तो रोग की घटना 70 प्रतिशत से अधिक कम हो सकती है। इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL का उपयोग 0.3 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करने से सफेद मक्खी की संख्या काफी हद तक नियंत्रित रहती है। अन्य विकल्पों में एसिटामिप्रिड, थियामेथॉक्साम या बायोप्रोडक्ट्स जैसे नीम तेल (4-5 मिली प्रति लीटर) का छिड़काव शामिल है। रासायनिक छिड़काव को आवश्यकता अनुसार सीमित रखें और सिंथेटिक पाइरेथ्रॉइड्स से बचें, क्योंकि ये सफेद मक्खी की समस्या को बढ़ा सकते हैं। एकीकृत कीट प्रबंधन में जैविक और रासायनिक तरीकों का संयोजन सबसे बेहतर परिणाम देता है।

संक्रमण दिखने पर प्रभावित पौधों को तुरंत उखाड़कर जला देना या गहराई से दबाना चाहिए, ताकि वायरस का आगे प्रसार रुके। खेत में खरपतवार हटाना, उचित दूरी पर बुवाई करना और फसल चक्र अपनाना भी महत्वपूर्ण है। सफेद मक्खी के प्राकृतिक शत्रुओं जैसे लेडीबर्ड बीटल को बढ़ावा देना और पीले चिपचिपे ट्रैप का उपयोग करना रोग नियंत्रण में सहायक होता है। इन उपायों से फसल की सुरक्षा सुनिश्चित होती है और पैदावार में स्थिरता आती है।

समय पर बुवाई, प्रतिरोधी किस्में, बीज उपचार और सफेद मक्खी प्रबंधन का संयोजन अपनाकर किसान येलो वेन मोजैक वायरस से 90 प्रतिशत तक नुकसान से बच सकते हैं। ग्रीष्मकालीन भिंडी की खेती में ये सावधानियां अपनाने से न केवल उत्पादन बढ़ता है बल्कि फसल की गुणवत्ता भी बनी रहती है। निरंतर निगरानी और एकीकृत प्रबंधन से यह रोग नियंत्रण योग्य बन जाता है, जिससे किसानों को बेहतर लाभ मिलता है।

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