ईरान-इजरायल महायुद्ध के 40 दिन: 650 मिसाइलों के बदले 10,800 हवाई हमले, मलबे में तब्दील हुए ईरान के रणनीतिक ठिकाने।

इजरायल और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों को निशाना बनाने के साथ ही इस युद्ध

Apr 10, 2026 - 12:16
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ईरान-इजरायल महायुद्ध के 40 दिन: 650 मिसाइलों के बदले 10,800 हवाई हमले, मलबे में तब्दील हुए ईरान के रणनीतिक ठिकाने।
ईरान-इजरायल महायुद्ध के 40 दिन: 650 मिसाइलों के बदले 10,800 हवाई हमले, मलबे में तब्दील हुए ईरान के रणनीतिक ठिकाने।
  • तबाही का 40 दिवसीय लेखा-जोखा: इजरायल ने ईरान पर बरसाए 16,000 से अधिक गोला-बारूद, 40 शीर्ष अधिकारियों के खात्मे का दावा।
  • आसमान से बरसती मौत और जमीनी तबाही: ईरान के मिसाइल अटैक का इजरायल ने दिया प्रचंड जवाब, 17.5 अरब डॉलर तक पहुंची युद्ध की लागत।

28 फरवरी, 2026 को इजरायल और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों को निशाना बनाने के साथ ही इस युद्ध की शुरुआत हुई थी। इस हमले ने ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व को सीधे तौर पर प्रभावित किया, जिसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजरायल और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर 650 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें और हजारों की संख्या में कामिकेज़ ड्रोन दागे। हालांकि, इजरायल के अभेद्य 'एरो' और 'डेविड्स स्लिंग' डिफेंस सिस्टम ने अधिकांश खतरों को हवा में ही नष्ट कर दिया, लेकिन कुछ मिसाइलें इजरायली शहरों और सैन्य हवाई अड्डों तक पहुंचने में सफल रहीं। इस अप्रत्याशित हमले ने इजरायल को अपनी पूरी सैन्य शक्ति के साथ ईरान पर पलटवार करने के लिए मजबूर कर दिया, जो पिछले 40 दिनों से निरंतर जारी है।

इजरायली रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 40 दिनों में इजरायली वायुसेना ने 800 से अधिक लड़ाकू सॉर्टियां (Sorties) की हैं और ईरान के भीतर लगभग 4,000 से अधिक लक्ष्यों पर 10,800 से अधिक सटीक हमले किए हैं। इन हमलों में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के मुख्यालय, भूमिगत मिसाइल साइलो, और हथियार निर्माण इकाइयों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है। इजरायल का दावा है कि उसने एक विशेष 'सर्जिकल स्ट्राइक' के दौरान मात्र 40 सेकंड के भीतर ईरान के 40 शीर्ष सैन्य और राजनीतिक अधिकारियों को समाप्त कर दिया, जिससे ईरान की कमान और नियंत्रण प्रणाली पूरी तरह बिखर गई। इस प्रचंड सैन्य अभियान का उद्देश्य ईरान की जवाबी हमला करने की क्षमता को शून्य करना है।

युद्ध के आर्थिक और मानवीय परिणामों पर नजर डालें तो इजरायल के वित्त मंत्रालय ने इस 40 दिवसीय संघर्ष की लागत लगभग 17.5 अरब डॉलर (लगभग 54 अरब शेकेल) आंकी है। इसमें सैन्य खर्च के साथ-साथ नागरिक बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान की भरपाई भी शामिल है। इजरायली शहरों में अब तक संपत्ति के नुकसान के 28,000 से अधिक दावे किए गए हैं, जिनमें सबसे अधिक प्रभावित तेल अवीव और बीरशेबा जैसे शहर हैं। दूसरी ओर, ईरान में तबाही का मंजर कहीं अधिक भयावह है। इजरायली और अमेरिकी हमलों में ईरान के 6,000 से अधिक सैन्य कर्मी मारे गए हैं और वहां के प्रमुख बंदरगाहों व तेल रिफाइनरियों को भारी क्षति पहुंची है। इस युद्ध ने वैश्विक तेल बाजार को भी अस्थिर कर दिया है, क्योंकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की कोशिश की है। 40 दिनों के इस संघर्ष में इजरायल का प्रत्यक्ष सैन्य खर्च 12.9 अरब डॉलर रहा है, जबकि नागरिक क्षति और मुआवजे की लागत 4.5 अरब डॉलर तक पहुंच गई है। यह 2006 के लेबनान युद्ध के बाद इजरायल के लिए सबसे महंगा सैन्य अभियान साबित हो रहा है।

ईरान की ओर से किए गए 650 मिसाइल हमलों ने इजरायल के भीतर सुरक्षा व्यवस्था की सीमाओं का परीक्षण किया। यद्यपि इजरायल का दावा है कि उसकी मारक क्षमता ने ईरान के मिसाइल भंडार को 90 प्रतिशत तक कम कर दिया है, लेकिन ईरान ने हिजबुल्लाह और अन्य समर्थित गुटों के जरिए इजरायल के उत्तरी और दक्षिणी मोर्चों पर दबाव बनाए रखा है। लेबनान सीमा पर भी युद्ध की आग फैल चुकी है, जहां इजरायल ने हिजबुल्लाह के 1,400 से अधिक लड़ाकों को मार गिराने का दावा किया है। युद्ध के दसवें दिन के बाद ईरान की मिसाइल दागने की गति में कमी आई है, जिसका मुख्य कारण इजरायल द्वारा ईरान के लॉन्चिंग पैड्स और रसद आपूर्ति लाइनों पर की गई निरंतर बमबारी को माना जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस युद्ध के कारण गहरा मानवीय संकट पैदा हो गया है। संयुक्त राष्ट्र और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने रिहायशी इलाकों में क्लस्टर बमों और मिसाइलों के उपयोग की कड़ी निंदा की है। ईरान द्वारा इजरायली बस्तियों को निशाना बनाए जाने और इजरायल द्वारा ईरानी शहरों में सैन्य ठिकानों पर की गई बमबारी ने लाखों लोगों को विस्थापित कर दिया है। खाड़ी देशों, विशेषकर कुवैत और सऊदी अरब ने भी अपनी संप्रभुता के उल्लंघन और ड्रोन हमलों की शिकायत की है। युद्ध ने न केवल मध्य पूर्व के भूगोल को बदल दिया है, बल्कि इसने वैश्विक शक्तियों को भी दो धड़ों में बांट दिया है, जिससे तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाएं बलवती होने लगी थीं।

राहत की बात यह है कि 10 अप्रैल, 2026 यानी आज, संघर्ष विराम की दिशा में पहली बड़ी उम्मीद जगी है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता वार्ता शुरू होने जा रही है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस बातचीत का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम को स्थायी शांति में बदलना है। ईरान के नए नेतृत्व ने भी संकेत दिए हैं कि वे और अधिक विनाश नहीं चाहते हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य को व्यापार के लिए फिर से खोलने पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, इजरायल अभी भी पूरी तरह सतर्क है और उसका कहना है कि जब तक ईरान के परमाणु खतरे को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता, वह अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। 40 दिनों के इस भीषण अध्याय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य के युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वे तकनीक, साइबर हमलों और सटीक मिसाइल मारक क्षमता पर आधारित होंगे। इजरायल ने 10,800 हमलों के जरिए अपनी तकनीकी श्रेष्ठता सिद्ध की है, लेकिन ईरान की 650 मिसाइलों ने यह भी दिखाया है कि प्रतिरोध की क्षमता को पूरी तरह खत्म करना कठिन है।

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