वीएचपी का ओवैसी पर पलटवार- तुष्टिकरण की राजनीति को बताया देश की एकता में बाधक, यूसीसी लागू करने की मांग हुई तेज

वीएचपी ने ओवैसी के 'हिंदू कोड बिल' वाले तंज पर पलटवार करते हुए कहा कि हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में पहले ही कई सुधार किए जा चुके हैं, जिनसे महिलाओं को अधिक अधिकार और सुरक्षा मिली है। परिषद ने तर्क दिया कि यदि मुस्लिम महि

Apr 5, 2026 - 11:40
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वीएचपी का ओवैसी पर पलटवार- तुष्टिकरण की राजनीति को बताया देश की एकता में बाधक, यूसीसी लागू करने की मांग हुई तेज
वीएचपी का ओवैसी पर पलटवार- तुष्टिकरण की राजनीति को बताया देश की एकता में बाधक, यूसीसी लागू करने की मांग हुई तेज
  • समान नागरिक संहिता पर ओवैसी के तीखे वार से गरमाया राजनीतिक माहौल, संवैधानिक अधिकारों को लेकर खड़ी की नई बहस
  • धार्मिक स्वतंत्रता बनाम एक कानून: ओवैसी के 'हिंदू कोड बिल' वाले तंज पर छिड़ा वाकयुद्ध, विश्व हिंदू परिषद ने किया करारा जवाब

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मुद्दा एक बार फिर भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गया है, जिससे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने हाल ही में यूसीसी को लेकर एक विवादास्पद बयान दिया है, जिसमें उन्होंने इसे विविधता के खिलाफ बताया है। ओवैसी के अनुसार, सरकार यूसीसी के नाम पर 'हिंदू कोड बिल' को पूरे देश पर थोपने की कोशिश कर रही है, जो भारत की संवैधानिक पहचान और बहुसांस्कृतिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचा सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि भारत जैसे देश में जहां हर कुछ किलोमीटर पर भाषा और रीति-रिवाज बदल जाते हैं, वहां एक जैसा व्यक्तिगत कानून लागू करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। उनके इस बयान ने न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, बल्कि इसे लेकर सार्वजनिक विमर्श भी काफी उग्र हो गया है।

ओवैसी ने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा कि इस्लाम में निकाह एक धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि एक दीवानी अनुबंध (सिविल कॉन्ट्रैक्ट) है, जो मुस्लिम व्यक्तिगत कानून का अभिन्न अंग है। उनका मानना है कि यूसीसी के माध्यम से अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों और उनकी विशिष्ट पहचान को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या सरकार आदिवासियों और विभिन्न समुदायों के उन विशेष अधिकारों को भी वापस लेगी जो उन्हें संविधान द्वारा प्रदान किए गए हैं। ओवैसी का कहना है कि यह केवल आगामी चुनावों से पहले ध्यान भटकाने की एक राजनीतिक कवायद है ताकि गरीबी, बेरोजगारी और सीमा पर चीन के अतिक्रमण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से जनता का ध्यान हटाया जा सके। उनके इस रुख को लेकर कई अन्य विपक्षी दलों ने भी चिंता जताई है, हालांकि वे सीधे तौर पर ओवैसी के सुर में सुर मिलाने से बच रहे हैं।

असदुद्दीन ओवैसी के इन बयानों पर विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने कड़ा ऐतराज जताते हुए तत्काल जवाब दिया है। वीएचपी के नेताओं ने कहा कि यूसीसी किसी विशेष धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह लैंगिक न्याय और सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करने की दिशा में एक आवश्यक कदम है। परिषद का मानना है कि ओवैसी अपनी राजनीति चमकाने के लिए सांप्रदायिक आधार पर लोगों को बांटने का काम कर रहे हैं। वीएचपी ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत समान नागरिक संहिता का स्पष्ट उल्लेख है, जिसे लागू करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। परिषद ने यह भी जोड़ा कि 'एक देश, एक कानून' की अवधारणा भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाने के लिए अनिवार्य है और जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, वे वास्तव में पिछड़ेपन को बढ़ावा दे रहे हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 राज्यों को पूरे भारत के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का निर्देश देता है। वर्तमान में, गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहां पुर्तगाली शासन के समय से ही समान नागरिक संहिता लागू है। हाल ही में उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों ने इसे लागू करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर इसके कार्यान्वयन की संभावनाओं को बल मिला है।

वीएचपी ने ओवैसी के 'हिंदू कोड बिल' वाले तंज पर पलटवार करते हुए कहा कि हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में पहले ही कई सुधार किए जा चुके हैं, जिनसे महिलाओं को अधिक अधिकार और सुरक्षा मिली है। परिषद ने तर्क दिया कि यदि मुस्लिम महिलाओं को भी समान अधिकार प्राप्त होते हैं, तो इसमें किसी भी समुदाय को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। वीएचपी ने आरोप लगाया कि ओवैसी जैसे नेता वोट बैंक की राजनीति के कारण सुधारों का विरोध कर रहे हैं। संगठन ने सरकार से मांग की है कि वह किसी भी दबाव में आए बिना जल्द से जल्द राष्ट्रीय स्तर पर यूसीसी का मसौदा तैयार करे और उसे संसद में पेश करे। उनका कहना है कि अब समय आ गया है जब धर्म के आधार पर बने अलग-अलग नागरिक कानूनों को समाप्त कर सभी भारतीयों के लिए एक साझा कानूनी ढांचा तैयार किया जाए।

इस सियासी घमासान के बीच, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यूसीसी को लागू करना कोई सरल कार्य नहीं है। इसके लिए विभिन्न समुदायों की धार्मिक भावनाओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होगा। जहां एक तरफ सरकार इसे आधुनिक और प्रगतिशील कदम के रूप में पेश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विरोधियों का तर्क है कि यह अनुच्छेद 25 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है। ओवैसी ने गुजरात और उत्तराखंड में यूसीसी लागू करने के मॉडल पर भी सवाल उठाए हैं और इसे एकतरफा फैसला बताया है। उनका दावा है कि आदिवासी क्षेत्रों में उनके अपने कानून चलते हैं और वहां यूसीसी लागू करना एक बड़ी चुनौती होगी, जिससे सामाजिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों ने ओवैसी के दावों को निराधार बताते हुए इसे 'डर की राजनीति' करार दिया है। सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना है कि यूसीसी का उद्देश्य किसी की धार्मिक पहचान को मिटाना नहीं, बल्कि महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना है, विशेष रूप से उत्तराधिकार, गोद लेने और विवाह जैसे मामलों में। वीएचपी ने कहा कि जिस तरह से दुनिया के कई मुस्लिम देशों ने अपने कानूनों में सुधार किए हैं, उसी तर्ज पर भारत में भी सुधारों की आवश्यकता है। उन्होंने ओवैसी को चुनौती दी कि वे तुष्टिकरण की भाषा छोड़कर राष्ट्र के विकास और समानता के पक्ष में खड़े हों। यह विवाद केवल राजनीतिक नहीं रह गया है, बल्कि यह अब भारतीय समाज की भविष्य की दिशा को लेकर एक वैचारिक युद्ध में बदल गया है।

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