महिला पत्रकार का आरोप: प्रेस वार्ता में सवाल टालने के बाद सोशल मीडिया पर मिलीं धमकियां, निष्पक्ष जांच की उठी मांग
एक महिला पत्रकार ने प्रेस वार्ता में सवाल पूछने के बाद लगातार धमकियां और ऑनलाइन प्रताड़ना मिलने का आरोप लगाया है। पत्रकार संगठनों ने मामले में निष्पक्ष जांच और सुरक्षा की मांग की है।

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प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछने पर विवाद: पत्रकार ने सुरक्षा को लेकर दर्ज कराई शिकायत, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर छिड़ी बहस
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पत्रकार सुरक्षा का मुद्दा: सीएम की प्रेस वार्ता के बाद महिला रिपोर्टर को ऑनलाइन प्रताड़ना का दावा, विपक्ष ने सरकार को घेरा
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मीडिया अधिकारों पर नई बहस: सवाल पूछने के बाद मिल रही धमकियों पर प्रेस संगठनों ने जताई चिंता, सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग
लखनऊ: एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से तीखा सवाल पूछने के बाद एक महिला पत्रकार ने खुद को लगातार धमकियां मिलने और डिजिटल मंचों पर प्रताड़ित किए जाने का गंभीर आरोप लगाया है। पत्रकार का दावा है कि प्रेस वार्ता समाप्त होने के तुरंत बाद से ही विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, कॉल्स और मैसेजेस के जरिए उन्हें निशाना बनाया जा रहा है, जिससे उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। यह मामला सामने आते ही मीडिया जगत, नागरिक संगठनों और राजनीतिक हलकों में पत्रकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक बार फिर व्यापक बहस छिड़ गई है।
प्राप्त विवरण के अनुसार, संबंधित पत्रकार ने आधिकारिक प्रेस वार्ता के दौरान सार्वजनिक नीति एवं प्रशासनिक मुद्दों से जुड़ा एक सीधा सवाल पूछा था। पत्रकार का आरोप है कि उनके सवाल का औपचारिक उत्तर दिए बिना मंच से प्रस्थान कर लिया गया। हालांकि किसी प्रेस वार्ता में सवालों का चयन और उत्तर देने की समय-सीमा आयोजकों व वक्ताओं के विवेक पर निर्भर करती है, लेकिन घटना के कुछ ही घंटों बाद सोशल मीडिया पर शुरू हुए समन्वित हमलों और कथित धमकियों ने मामले को कानूनी और सुरक्षा संबंधी विवाद में बदल दिया है।
ऑनलाइन प्रताड़ना और सुरक्षा की गुहार
पत्रकार ने सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर न केवल उनके पेशेवर काम को लेकर अनुचित टिप्पणियां की जा रही हैं, बल्कि उनकी निजी जिंदगी, पहचान और सुरक्षा से जुड़ी अपमानजनक सामग्री भी प्रसारित की जा रही है। उन्होंने कई संदेशों और पोस्ट्स के स्क्रीनशॉट्स साझा करते हुए आरोप लगाया कि अज्ञात व्यक्तियों द्वारा उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनियां दी जा रही हैं।
महिला पत्रकार ने इस संबंध में कानून प्रवर्तन एजेंसियों और संबंधित पुलिस प्रशासन से शिकायत करते हुए अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने और धमकियां देने वाले खातों की साइबर जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतिगत मुद्दों पर जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछना मीडिया का बुनियादी संवैधानिक दायित्व है, और इसके बदले किसी पत्रकार को मानसिक और शारीरिक भय के साए में धकेलना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
प्रेस संगठनों ने जताई गहरी चिंता
इस पूरे घटनाक्रम पर विभिन्न मीडिया यूनियनों, महिला पत्रकार संगठनों और प्रेस फ्रीडम से जुड़ी संस्थाओं ने संज्ञान लिया है। प्रेस निकायों ने एक संयुक्त बयान में कहा कि फील्ड पर काम करने वाले संवाददाताओं, विशेष रूप से महिला पत्रकारों को सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और हिंसा की धमकियों का शिकार बनाना एक खतरनाक प्रवृत्ति है।
संगठनों ने राज्य और केंद्र सरकार से मांग की है कि किसी भी पत्रकार द्वारा उठाए गए सवालों के बाद होने वाली संगठित ट्रोलिंग और व्यक्तिगत धमकियों को संज्ञेय अपराध मानते हुए तत्काल कानूनी कदम उठाए जाएं। प्रेस क्लबों का मानना है कि यदि सवाल पूछने पर संवाददाताओं को व्यक्तिगत खतरों का सामना करना पड़ेगा, तो इसका असर पूरे मीडिया तंत्र की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर पड़ेगा।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और प्रशासन का दायित्व
मामले के तूल पकड़ते ही विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर राज्य सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। विपक्ष का तर्क है कि सरकार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछे जाने वाले हर सवाल का लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना प्रशासन का दायित्व है कि किसी भी रिपोर्टर को उसके कर्तव्य निर्वहन के कारण डराया-धमकाया न जाए।
वहीं, दूसरी ओर प्रशासनिक सूत्रों और सत्तारूढ़ दल से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि किसी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में समय की सीमा होती है और सभी सवालों को शामिल करना हमेशा संभव नहीं होता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करती है और यदि किसी नागरिक या पत्रकार को वास्तविक धमकियां मिली हैं, तो पुलिस नियमानुसार जांच कर उचित वैधानिक कदम उठाएगी। किसी भी प्रकार की साइबर हिंसा या कानून हाथ में लेने की गतिविधि को कानून के तहत बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय न्याय संहिता और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम के तहत इंटरनेट पर किसी को जान से मारने या गंभीर नुकसान पहुंचाने की धमकी देना, महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाना और ऑनलाइन स्टॉकिंग करना दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।
साइबर सेल को सौंपे गए मामलों में डिजिटल फुटप्रिंट्स, आईपी एड्रेस और सोशल मीडिया अकाउंट्स के मेटाडेटा के आधार पर संदिग्धों की पहचान की जाती है। जानकारों का कहना है कि पुलिस प्रशासन को इस तरह के संवेदनशील मामलों में तत्काल प्राथमिकी दर्ज कर साइबर फॉरेंसिक जांच तेज करनी चाहिए, ताकि ऐसे तत्वों पर कानूनी लगाम लगाई जा सके जो डिजिटल माध्यमों का दुरुपयोग कर कानून-व्यवस्था को चुनौती देते हैं।
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