Entertainment News: रणवीर सिंह की फिल्म को ऑस्कर चयन में क्यों नहीं मिले वोट? फिल्ममेकर विवेक वासवानी ने खोला अंदरूनी सच
फिल्म निर्माता विवेक वासवानी ने ऑस्कर चयन प्रक्रिया पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि रणवीर सिंह की फिल्म को जूरी से पर्याप्त वोट क्यों नहीं मिले और चयन का पैमाना क्या रहा।

- Oscar Selection Process: ऑस्कर की रेस से कैसे बाहर हुई थी रणवीर सिंह की फिल्म, पूर्व जूरी मेंबर विवेक वासवानी का बड़ा खुलासा
- Bollywood News: विवेक वासवानी ने बताया ऑस्कर में भारतीय फिल्मों के चयन का गणित, रणवीर सिंह की फिल्म को लेकर कही यह बात
- Film Federation Of India: जूरी वोटिंग और ऑस्कर एंट्री के नियमों पर बोले विवेक वासवानी, रणवीर सिंह की दावेदारी पर साझा किए तथ्य
मुंबई। एकेडमी अवार्ड्स यानी ऑस्कर में भारत की तरफ से आधिकारिक प्रविष्टि (ऑफिशियल एंट्री) भेजने की प्रक्रिया हमेशा से फिल्म उद्योग और सिनेमा प्रेमियों के बीच गहन चर्चा का विषय रही है। हर साल जब 'फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया' (एफएफआई) की जूरी किसी एक भारतीय फिल्म को सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म श्रेणी के लिए चुनती है, तो कई अन्य दावेदारों के बाहर होने पर सवाल उठते हैं। इसी संदर्भ में जाने-माने अभिनेता, निर्माता और पूर्व जूरी सदस्य विवेक वासवानी ने एक साक्षात्कार के दौरान ऑस्कर चयन प्रक्रिया के भीतर के समीकरणों पर प्रकाश डाला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि रणवीर सिंह की मुख्य भूमिका वाली फिल्म को चयन समिति के सदस्यों से बेहद कम वोट क्यों मिले थे और किस आधार पर अंतिम फैसला लिया जाता है।
विवेक वासवानी, जो भारतीय फिल्म उद्योग में दशकों का अनुभव रखते हैं और चयन समितियों की आंतरिक कार्यप्रणाली से भली-भांति परिचित हैं, ने बताया कि ऑस्कर के लिए भेजी जाने वाली फिल्म का निर्णय किसी एक व्यक्ति की पसंद पर नहीं, बल्कि एक बहु-सदस्यीय जूरी के गुप्त मतदान पर टिका होता है। जब किसी बड़ी बजट या चर्चित फिल्म को अपेक्षित समर्थन नहीं मिलता, तो उसके पीछे जूरी सदस्यों का सिनेमाई दृष्टिकोण और अंतरराष्ट्रीय मानकों का आकलन मुख्य कारण होता है।
- जूरी वोटिंग का गणित और फिल्मों का मूल्यांकन
फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया द्वारा गठित चयन समिति में देश के विभिन्न भाषाई उद्योगों हिंदी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, बंगाली, मराठी आदि के अनुभवी तकनीशियन, निर्देशक और लेखक शामिल होते हैं। विवेक वासवानी के अनुसार, जब रणवीर सिंह की चर्चित फिल्म दावेदारों की सूची में शामिल थी, तब स्क्रीनिंग रूम में मौजूद कई विशेषज्ञों का मानना था कि फिल्म में व्यावसायिक आकर्षण और बेहतरीन अभिनय होने के बावजूद वह मौलिकता और वैश्विक दृष्टिकोण के उन पैमानों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर रही थी, जिनकी ऑस्कर की अंतरराष्ट्रीय श्रेणी में आवश्यकता होती है।
वासवानी ने रेखांकित किया कि जूरी के अधिकांश सदस्यों ने विषय की प्रस्तुति, कहानी के स्थानीय जुड़ाव और सामाजिक संदर्भों को अधिक वजन दिया। इसके चलते मतदान के अंतिम चरण में संबंधित फिल्म को जूरी सदस्यों की तरफ से बहुत सीमित संख्या में वोट प्राप्त हुए। जब किसी फिल्म को समिति के भीतर आवश्यक बहुमत नहीं मिलता, तो नियमानुसार उसे अंतिम दौड़ से बाहर होना पड़ता है, भले ही बॉक्स ऑफिस पर या आम दर्शकों के बीच उसका प्रभाव कितना भी बड़ा क्यों न रहा हो।
- बॉक्स ऑफिस सफलता बनाम अंतरराष्ट्रीय सिनेमाई मानदंड
भारतीय सिनेमा में अक्सर यह धारणा बन जाती है कि जो फिल्म घरेलू बॉक्स ऑफिस पर सैकड़ों करोड़ रुपये कमाती है या समीक्षकों से भरपूर प्रशंसा पाती है, उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी स्वतः प्राथमिकता मिलनी चाहिए। वासवानी ने इस अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि एक घरेलू हिट फिल्म और ऑस्कर के मंच पर प्रतिस्पर्धा करने वाली फिल्म के तकनीकी व कलात्मक तत्व पूरी तरह भिन्न हो सकते हैं।
एकेडमी अवार्ड्स की जूरी मुख्य रूप से कहानी की नवीनता, सांस्कृतिक प्रामाणिकता, दृश्य भाषा (विजुअल लैंग्वेज) और बिना किसी अति-नाटकीयता के मानवीय संवेदनाओं को छूने की क्षमता को देखती है। कई बार भारतीय मुख्यधारा की फिल्मों में उपयोग किए जाने वाले पारंपरिक फॉर्मूले जैसे अत्यधिक बैकग्राउंड स्कोर, तयशुदा नाटकीय मोड़ या पश्चिमी फिल्मों से प्रेरित कथानक अंतरराष्ट्रीय समीक्षकों को प्रभावित नहीं कर पाते। जूरी सदस्य स्क्रीनिंग के दौरान इन्हीं पहलुओं का कड़ाई से विश्लेषण करते हैं, जिसके चलते कई बड़ी व्यावसायिक फिल्में अंतिम चयन से बाहर रह जाती हैं।
विवेक वासवानी ने चयन प्रक्रिया की स्वायत्तता का बचाव करते हुए कहा कि जूरी पर किसी बड़े स्टार या प्रोडक्शन हाउस के नाम का दबाव नहीं होता। समिति के सामने सभी फिल्में एक समान धरातल पर रखी जाती हैं। हाल के वर्षों में यह स्पष्ट देखा गया है कि क्षेत्रीय भाषाओं विशेषकर मलयालम, तमिल और मराठी की कम बजट वाली लेकिन बेहद मजबूत कथानक वाली फिल्मों ने हिंदी की विशाल बजट फिल्मों को कड़ी टक्कर दी है और कई बार आधिकारिक प्रविष्टि का दर्जा हासिल किया है।
जब चयन के लिए मतदान होता है, तो प्रत्येक जूरी सदस्य लिखित रूप में अपने अंक और प्राथमिकता दर्ज करता है। वासवानी के अनुसार, इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में वही फिल्म बाजी मारती है जो भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से परे जाकर चयनकर्ताओं के मन में एक अमिट प्रभाव छोड़ती है। रणवीर सिंह की फिल्म के संदर्भ में भी यही हुआ कि अन्य क्षेत्रीय प्रविष्टियों ने कलात्मक बारीकियों के मामले में जूरी को अधिक प्रभावित किया, जिसके चलते मुख्यधारा की इस दावेदारी को पर्याप्त संख्याबल नहीं मिल सका।
यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े बॉलीवुड स्टार की फिल्म ऑस्कर की दौड़ से बाहर हुई हो। इससे पहले भी कई बहुचर्चित फिल्मों को लेकर सार्वजनिक बहसें हुई हैं। सिनेमा विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय फिल्म निर्माताओं को ऑस्कर को ध्यान में रखकर काम करते समय विशुद्ध भारतीय संस्कृति, अनकही कहानियों और यथार्थवादी सिनेमा पर अधिक भरोसा करना होगा।
विवेक वासवानी के इस स्पष्टीकरण ने एक बार फिर फिल्म उद्योग के सामने यह तथ्य रखा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए स्टारडम या पीआर अभियान पर्याप्त नहीं हैं। चयन समिति के विवेक, निष्पक्ष वोटिंग और अंतरराष्ट्रीय सिनेमाई व्याकरण के तालमेल से ही कोई फिल्म उस प्रतिष्ठित मंच तक पहुंचने का रास्ता तय कर सकती है।
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