SBI Loan Recovery: पति के कर्ज की वसूली के लिए बैंक ने तोड़ी पत्नी की एफडी, हाईकोर्ट ने ब्याज सहित रकम लौटाने का दिया आदेश

पति के बकाया ऋण की वसूली के लिए पत्नी की एफडी से रकम काटने के मामले में हाईकोर्ट ने बैंक की कार्रवाई को अवैध करार दिया। बैंक को ब्याज सहित पैसा लौटाने का आदेश।

Sep 19, 2026 - 14:03
 0  1
SBI Loan Recovery: पति के कर्ज की वसूली के लिए बैंक ने तोड़ी पत्नी की एफडी, हाईकोर्ट ने ब्याज सहित रकम लौटाने का दिया आदेश
  • बैंक मनमाने ढंग से नहीं वसूल सकता लोन: विधवा की फिक्स्ड डिपॉजिट से पैसे काटने पर हाईकोर्ट सख्त, एसबीआई को दिया निर्देश
  • High Court on Bank Loan Recovery: पति के लोन के लिए पत्नी की जमा पूंजी पर बैंक का अधिकार नहीं, अदालत ने एसबीआई को लगाई फटकार
  • Banking Law: कानूनी प्रक्रिया के बिना एफडी से लोन वसूली अवैध, हाईकोर्ट ने बैंक को ब्याज सहित पाई-पाई चुकाने का सुनाया फैसला

नई दिल्ली। बैंकिंग प्रणाली में ऋण वसूली (लोन रिकवरी) के नाम पर मनमाने कदमों और ग्राहक अधिकारों के हनन को लेकर उच्च न्यायालय ने कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी बैंक किसी व्यक्ति के बकाया ऋण की भरपाई के लिए उसकी पत्नी के व्यक्तिगत बैंक खाते या सावधि जमा (फिक्स्ड डिपॉजिट - FD) से मनमाने ढंग से राशि नहीं काट सकता। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) से जुड़े एक मामले में अदालत ने मृत पति के लोन खाते की भरपाई के लिए विधवा पत्नी की एफडी से की गई गुपचुप कटौती को पूरी तरह गैरकानूनी करार दिया और बैंक को काटी गई पूरी रकम ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया है।

न्यायालय ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि कानून सम्मत प्रक्रिया का पालन किए बिना वित्तीय संस्थान किसी भी नागरिक की वैध जमा पूंजी पर अपना अधिकार नहीं जता सकते। यदि कोई व्यक्ति किसी ऋण में सह-उधारकर्ता (को-बॉरोअर) अथवा गारंटर (जमानती) नहीं है, तो उसकी व्यक्तिगत संपत्ति या बैंक खातों पर बकाएदार की देनदारी जबरन नहीं थोपी जा सकती।

  • क्या था पूरा विवाद?

प्रकरण के अनुसार, मृत व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में बैंक से ऋण लिया था। संबंधित व्यक्ति की असमय मृत्यु के बाद लोन खाते में कुछ देनदारी बाकी रह गई थी। इसी बीच, उनकी विधवा पत्नी ने अपने जीवन यापन और भविष्य की सुरक्षा के लिए उसी बैंक शाखा में अपनी व्यक्तिगत बचत से एक सावधि जमा (एफडी) खाता खोला था।

जब बैंक शाखा को मृत व्यक्ति के ऋण खाते के एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) होने का खतरा दिखा, तो प्रबंधन ने बिना किसी पूर्व लिखित नोटिस, चेतावनी या कानूनी प्रक्रिया के महिला की एफडी से ऋण की बकाया राशि काटकर लोन खाते में समायोजित कर ली। जब पीड़िता ने एफडी की परिपक्वता (मैच्योरिटी) अथवा ब्याज की निकासी के लिए संपर्क किया, तब उन्हें जानकारी मिली कि बैंक ने गुपचुप तरीके से उनकी एफडी तोड़कर पति के कर्ज की वसूली कर ली है। बैंक के इस कदम से स्तब्ध महिला ने पहले बैंक के उच्च अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन कोई सुनवाई न होने पर उन्होंने उच्च न्यायालय की शरण ली।

  • अदालत में बैंक की दलीलें और कानूनी प्रावधान

सुनवाई के दौरान बैंक के अधिवक्ताओं ने बैंकर्स लियन (Banker's Right of Lien) और 'सेट-ऑफ' के अधिकारों का हवाला देते हुए कार्रवाई को उचित ठहराने का प्रयास किया। बैंक का तर्क था कि चूंकि पति की मृत्यु के बाद पत्नी उनकी कानूनी वारिस हैं, इसलिए संपत्ति और देनदारी दोनों उनके हिस्से में आती हैं।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने बैंक के इन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने भारतीय अनुबंध अधिनियम (Indian Contract Act) और बैंकिंग विनियमन से जुड़े नियमों का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया:

स्वतंत्र वित्तीय अस्तित्व: कानून की नजर में पति और पत्नी दो अलग-अलग वित्तीय और विधिक इकाइयां हैं। किसी एक की देनदारी दूसरे पर तब तक नहीं डाली जा सकती, जब तक कि वह उस ऋण में आधिकारिक सह-आवेदक या गारंटर न हो।

बैंकर का लियन अधिकार: बैंक को अपने बकाए के बदले किसी ग्राहक की जमा पूंजी को जब्त करने या रोकने (Right of Lien) का अधिकार केवल उसी ग्राहक के खिलाफ होता है जो सीधे तौर पर देनदार हो। यह अधिकार किसी तीसरे पक्ष की व्यक्तिगत जमा पूंजी पर लागू नहीं किया जा सकता।

उत्तराधिकार और सीमा: भले ही कोई व्यक्ति कानूनी वारिस हो, लेकिन ऋण की वसूली केवल उस सीमा तक की जा सकती है जिस सीमा तक वारिस को मृतक की संपत्ति विरासत में मिली हो। इसके लिए भी एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया, सिविल कोर्ट या सक्षम अधिकरण (डीआरटी) से आदेश प्राप्त करना अनिवार्य होता है। बैंक खुद ही जज बनकर किसी के खाते से सीधे पैसे नहीं निकाल सकता।

  • ब्याज सहित पूरी राशि लौटाने के निर्देश

उच्च न्यायालय ने बैंक की इस कार्यशैली को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत और अधिकार क्षेत्र से बाहर माना। अदालत ने निर्देश दिया कि बैंक महिला की एफडी से काटी गई पूरी राशि को तुरंत उनके खाते में वापस जमा करे। इसके साथ ही, जितने समय तक महिला का पैसा बैंक ने अवैध रूप से रोके रखा, उस पूरी अवधि का वाणिज्यिक एफडी दरों के अनुसार ब्याज भी अदा करने का आदेश दिया गया है।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि वित्तीय संस्थानों को यह समझना होगा कि आम नागरिकों की जमा पूंजी उनकी गाढ़ी कमाई होती है, जिसे सुरक्षा के भरोसे बैंक में रखा जाता है। बैंकों द्वारा नियमों को दरकिनार कर की जाने वाली ऐसी एकतरफा कार्रवाई न केवल बैंकिंग प्रणाली पर जनता के भरोसे को कमजोर करती है, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर और असहाय लोगों को संकट में डालती है।

  • ग्राहकों के लिए इस फैसले के मायने

यह फैसला देश भर के उन लाखों बैंक खाताधारकों और ग्राहकों के लिए एक नजीर की तरह है जो अक्सर ऋण वसूली के दौरान बैंकों की सख्त और गैरकानूनी कार्यप्रणाली का शिकार होते हैं। आमतौर पर कई मामलों में देखा गया है कि परिवार के किसी सदस्य के लोन डिफ़ॉल्ट होने पर बैंक दूसरे सदस्यों के खातों पर रोक लगा देते हैं या पैसे काट लेते हैं।

  • अदालत के इस निर्णय ने स्पष्ट कर दिया है कि:

यदि आपने किसी के लोन में हस्ताक्षर नहीं किए हैं, तो बैंक आपके खाते को छू भी नहीं सकता।

किसी भी प्रकार की वसूली के लिए बैंक को खाताधारक को उचित नोटिस देना और कानूनी फोरम का दरवाजा खटखटाना जरूरी है।

मनमाने ढंग से की गई किसी भी कटौती को उपभोक्ता फोरम, बैंकिंग लोकपाल अथवा उच्च न्यायालय में चुनौती देकर ब्याज और मुआवजे की मांग की जा सकती है।

Also Read- Delhi News: सत्य निकेतन पीजी हादसे में दिल्ली पुलिस की बड़ी कार्रवाई, ऑपरेटर सुधांशु को किया अरेस्ट

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow