Third Front Politics: कांग्रेस से राहें अलग होने के बाद तीसरे मोर्चे की तैयारी में DMK, कोलकाता में ममता बनर्जी से मिलीं कनिमोझी
कांग्रेस से गठबंधन में दरार के बाद डीएमके ने तीसरे मोर्चे की कवायद तेज कर दी है। पार्टी सांसद कनिमोझी ने कोलकाता के कालीघाट में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की।

- National Politics: क्या फिर बनेगा गैर-कांग्रेसी तीसरा मोर्चा? कनिमोझी ने कोलकाता में ममता बनर्जी संग की अहम बैठक
- विपक्ष में नया सियासी समीकरण: डीएमके नेता कनिमोझी पहुंचीं कालीघाट, टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी से की गुप्त मंत्रणा
- INDIA Bloc Crisis: डीएमके-कांग्रेस में दरार के बाद क्षेत्रीय दलों की लामबंदी तेज, कोलकाता में हुई रणनीतिक मुलाकात
कोलकाता/नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी खेमे के भीतर एक बार फिर नए समीकरणों की हलचल तेज हो गई है। दक्षिण भारत की प्रमुख सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) द्वारा कांग्रेस के साथ अपने पुराने गठबंधन से अलग होने के बाद अब क्षेत्रीय दलों को एकजुट कर एक गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपा विकल्प तलाशने की प्रक्रिया गति पकड़ती दिख रही है। इसी राजनीतिक रणनीति के तहत डीएमके की उप महासचिव और लोकसभा सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सुप्रीमो ममता बनर्जी से उनके कोलकाता स्थित कालीघाट आवास पर जाकर औपचारिक मुलाकात की।
दोनों वरिष्ठ महिला नेताओं के बीच बंद कमरे में हुई इस उच्चस्तरीय चर्चा को विपक्षी राजनीति में एक नए ध्रुवीकरण के रूप में देखा जा रहा है। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA bloc) के भीतर प्रमुख क्षेत्रीय क्षत्रपों के बीच आपसी संपर्क और कांग्रेस से इतर एक स्वतंत्र रणनीतिक धड़े की आवश्यकता पर लंबे समय से कयास लगाए जा रहे थे। कनिमोझी का सीधे कोलकाता पहुंचकर ममता बनर्जी से भेंट करना यह स्पष्ट संकेत देता है कि डीएमके अब केवल अपने गृह राज्य तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय दलों का एक मजबूत मोर्चा खड़ा करने के प्रयास में सक्रिय हो गई है।
- कालीघाट में रणनीतिक मंथन के मायने
बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने वर्तमान राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य, केंद्र सरकार की नीतियों, संघीय ढांचे पर बढ़ते दबाव और आगामी संसदीय रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया। हालांकि बैठक के औपचारिक ब्योरे को पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस बात की स्पष्ट चर्चा है कि डीएमके नेतृत्व अब कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ढांचे से अलग होकर सीधे अन्य प्रभावशाली क्षेत्रीय दलों के साथ एक समानांतर समन्वय स्थापित करना चाहता है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पूर्व में भी कई मौकों पर यह दोहराती रही हैं कि राज्यों में मजबूत जनाधार रखने वाले क्षेत्रीय दलों को अपनी शर्तों पर आगे बढ़ना चाहिए और राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। डीएमके सांसद कनिमोझी ने मुख्यमंत्री से भेंट के बाद सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई बातचीत की पुष्टि की। विश्लेषकों का मानना है कि इस मुलाकात का प्राथमिक उद्देश्य यह समझना था कि क्या तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और दक्षिण भारत के अन्य प्रभावशाली दल एक साझा न्यूनतम मंच पर बिना कांग्रेस की मध्यस्थता के साथ आ सकते हैं।
- कांग्रेस से दूरी और क्षेत्रीय दलों का स्वतंत्र रुख
विगत वर्षों में विपक्षी राजनीति की धुरी बने ‘इंडिया’ गठबंधन में नेतृत्व और सीट बंटवारे को लेकर समय-समय पर अंतर्विरोध उभरते रहे हैं। तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस के बीच दशकों पुराना तालमेल रहा था, किंतु स्थानीय प्रशासनिक प्राथमिकताओं, सांगठनिक महत्वाकांक्षाओं और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के दृष्टिकोण को लेकर दोनों दलों के बीच बनी असहजता अंततः संबंधों में दरार का कारण बनी।
डीएमके का मानना है कि क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का सीधा और प्रभावी मुकाबला करने में सक्षम हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की कमजोरियां अक्सर समूचे गठबंधन के प्रदर्शन को प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि डीएमके आलाकमान अब ऐसे दलों से सीधा संपर्क साध रहा है जो अपने राज्यों में राजनीतिक रूप से अजेय रहे हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का मजबूत किला इस परिकल्पना के लिए सबसे स्वाभाविक साझीदार दिखाई देता है।
- क्या तीसरे मोर्चे की अवधारणा फिर से व्यावहारिक है?
भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि 1989 का राष्ट्रीय मोर्चा और 1996 का संयुक्त मोर्चा जैसे प्रयोग क्षेत्रीय दलों की एकता के दम पर ही केंद्र की सत्ता तक पहुंचे थे। हालांकि हालिया दशकों में द्विध्रुवीय राजनीति (NDA बनाम संप्रग/इंडिया) का प्रभाव अधिक रहा है। ऐसे दौर में कांग्रेस-मुक्त तीसरा मोर्चा खड़ा करना एक जटिल राजनीतिक कार्य है।
विशेषज्ञों के अनुसार, तीसरे मोर्चे के गठन में सबसे बड़ी चुनौती नेतृत्व का चेहरा तय करना और विभिन्न राज्यों में दलों के अपने स्थानीय अंतर्विरोधों को साधना होगा। उदाहरण के लिए, कुछ राज्यों में क्षेत्रीय दलों के अपने-अपने प्रतिद्वंद्वी हैं। फिर भी, यदि तृणमूल कांग्रेस और डीएमके जैसी दो बड़ी ताकतें एक साथ आकर साझा रुख अपनाती हैं, तो संसद के भीतर और बाहर वे एक ऐसा दबाव समूह बना सकती हैं, जिसे नजरअंदाज करना केंद्र की सत्ता और मुख्य विपक्षी दल दोनों के लिए संभव नहीं होगा।
- केंद्र-राज्य संबंध
इस मुलाकात का एक अन्य महत्वपूर्ण आधार केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर दोनों दलों की समान वैचारिक दृष्टि है। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल दोनों ही राज्यों की सरकारें राज्यपालों की कार्यप्रणाली, केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग, राज्य सूची के विषयों में केंद्रीय हस्तक्षेप और केंद्रीय करों के वितरण के मुद्दे पर निरंतर मुखर रही हैं।
कनिमोझी और ममता बनर्जी के बीच हुई बातचीत में राज्यों के अधिकारों की रक्षा और राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) को मजबूत करने पर विशेष जोर दिए जाने की संभावना है। दोनों दलों का नेतृत्व यह मानता है कि एक मजबूत क्षेत्रीय मंच ही राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और भाषाई व सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए प्रभावी आवाज बन सकता है।
- राजनीतिक हलचल पर नजर
कोलकाता की इस बैठक के बाद यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि डीएमके का नेतृत्व आने वाले दिनों में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के अन्य प्रमुख गैर-कांग्रेसी विपक्षी नेताओं से भी संपर्क साध सकता है। इसमें समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव, दिल्ली और पंजाब में सक्रिय आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेताओं तथा दक्षिण के कुछ अन्य क्षेत्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद की श्रृंखला शुरू हो सकती है।
फिलहाल तृणमूल कांग्रेस और डीएमके दोनों ही दलों ने अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं। लेकिन कोलकाता के कालीघाट से शुरू हुई यह राजनीतिक पहल इस बात का पर्याप्त आधार देती है कि विपक्षी खेमा अब किसी एक राष्ट्रीय दल के इर्द-गिर्द बंधकर रहने के मूड में नहीं है। आने वाले सप्ताहों में क्षेत्रीय दलों की यह कवायद राष्ट्रीय राजनीति के शक्ति संतुलन को किस दिशा में मोड़ती है, इस पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहेंगी।
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