Digital Payment Policy: USTR की रिपोर्ट में भारत की फ्री डिजिटल पेमेंट व्यवस्था पर उठे सवाल, क्या बदलेगा यूपीआई का ढांचा?
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) की रिपोर्ट में भारत की मुफ्त डिजिटल भुगतान नीति को व्यापारिक बाधा बताए जाने के बाद केंद्र सरकार की वित्तीय नीतियों और डिजिटल ढांचे पर चर्चा तेज हो गई है।

- Digital Payment Policy: USTR की रिपोर्ट में भारत की फ्री डिजिटल पेमेंट व्यवस्था पर उठे सवाल, क्या बदलेगा यूपीआई का ढांचा?
- भारत की डिजिटल भुगतान नीति पर अमेरिका की नजर: USTR ने 'ट्रेड बैरियर' बताया, केंद्र सरकार के संभावित कदमों पर टिकी निगाहें
- Free UPI vs US Trade Concerns: अमेरिकी व्यापार रिपोर्ट के बाद डिजिटल पेमेंट नीति पर विमर्श, जानिए भारत के रुख के मायने
- वैश्विक व्यापार मंच पर भारत का डिजिटल मॉडल: यूएसटीआर की आपत्ति के बीच मुफ्त डिजिटल ट्रांजैक्शन नीति की नई समीक्षा
नई दिल्ली। भारत में डिजिटल भुगतान क्रांति की रीढ़ बन चुकी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) और शून्य मर्चेंट डिस्काउंट रेट (जीरो एमडीआर) की नीति अब अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं और वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ गई है। यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (यूएसटीआर) की समीक्षा रिपोर्ट में भारत द्वारा अपनाई गई मुफ्त डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए इसे अमेरिकी वित्तीय कंपनियों और वैश्विक भुगतान नेटवर्क के लिए एक प्रकार की व्यापारिक बाधा (ट्रेड बैरियर) के रूप में चिह्नित किया गया है।
अमेरिकी व्यापार निकाय की इस आपत्ति के सार्वजनिक होने के बाद भारत सरकार के नीति-निर्माताओं, बैंकिंग नियामक और वित्तीय प्रौद्योगिकी (फिनटेक) उद्योग के बीच इस व्यवस्था के भविष्य को लेकर मंथन तेज हो गया है। वैश्विक दबाव और घरेलू वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन साधने के लिए केंद्र सरकार द्वारा इस नीतिगत ढांचे की आंतरिक समीक्षा किए जाने की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है।
- यूएसटीआर की आपत्ति का मूल कारण क्या है?
संयुक्त राज्य अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय की रिपोर्ट का मुख्य आक्षेप यह है कि भारत में खुदरा लेन-देन के लिए डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (डीपीआई) को जिस तरह से पूरी तरह निःशुल्क या शून्य लागत पर अनिवार्य किया गया है, उससे अंतरराष्ट्रीय भुगतान दिग्गज विशेष रूप से वैश्विक कार्ड नेटवर्क और बहुराष्ट्रीय वित्तीय सेवा प्रदाता भारतीय बाजार में समान स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं।
यूएसटीआर का तर्क है कि भारत सरकार द्वारा रुपे डेबिट कार्ड और यूपीआई लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) को शून्य रखना तथा बैंकों को इसके बदले बजटीय सब्सिडी प्रदान करना एक गैर-बाजार नीतिगत हस्तक्षेप है। अमेरिकी कंपनियों की शिकायत रही है कि जब तक किसी भुगतान नेटवर्क में मर्चेंट से शुल्क वसूलने की अनुमति नहीं होती, तब तक निजी और विदेशी कंपनियां भारत के विशाल खुदरा भुगतान तंत्र में स्वतंत्र रूप से मुनाफा कमाने योग्य व्यावसायिक मॉडल स्थापित नहीं कर पाती हैं। रिपोर्ट में इस व्यवस्था को अमेरिकी सेवाओं के लिए भारतीय बाजार तक पहुंच सीमित करने वाले कारक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- भारत की 'जीरो एमडीआर' नीति और उसका जमीनी प्रभाव
भारत सरकार ने डिजिटल अर्थव्यवस्था को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने और औपचारिक बैंकिंग चैनल को व्यापक बनाने के उद्देश्य से जनवरी 2020 में रुपे डेबिट कार्ड और भीम-यूपीआई के जरिए किए जाने वाले मर्चेंट लेन-देन पर एमडीआर समाप्त कर दिया था। इसका सीधा अर्थ यह था कि चाय की थड़ी से लेकर बड़े सुपरमार्केट तक किसी भी व्यापारी से डिजिटल माध्यम से पैसे स्वीकार करने पर कोई ट्रांजैक्शन फीस नहीं काटी जाएगी।
- इस नीतिगत कदम ने देश के डिजिटल परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया:
नकद से डिजिटल की ओर तीव्र रूपांतरण: छोटे दुकानदारों ने बिना किसी अतिरिक्त खर्च के क्यूआर कोड आधारित भुगतान को अपनाया, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर वास्तविक समय के डिजिटल लेन-देन में सबसे आगे निकल गया।
वित्तीय समावेशन में तेजी: बैंक खाते और आधार से जुड़े डिजिटल तंत्र ने दूरदराज के इलाकों में बैंकिंग सेवाओं की पहुंच को आसान बना दिया।
कम लागत में अर्थव्यवस्था का डिजिटलीकरण: कागजी मुद्रा की छपाई, रखरखाव और ढुलाई में होने वाले विशाल खर्च को कम करने में डिजिटल भुगतान ने बड़ी भूमिका निभाई।
हालांकि, इस व्यवस्था का दूसरा पहलू यह भी रहा कि बैंकों और फिनटेक कंपनियों को नेटवर्क के बुनियादी ढांचे, डेटा सुरक्षा और सर्वर क्षमता को अपग्रेड करने के लिए आवश्यक राजस्व नहीं मिल पा रहा था। इसके समाधान के लिए केंद्र सरकार हर साल केंद्रीय बजट में वित्तीय प्रोत्साहन राशि का आवंटन कर बैंकों के नुकसान की आंशिक भरपाई करती रही है।
- भारतीय फिनटेक उद्योग की मांग और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
घरेलू स्तर पर भी भारतीय बैंक और फिनटेक स्टार्टअप्स लंबे समय से यह मांग उठाते रहे हैं कि यूपीआई और डिजिटल भुगतानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बड़े व्यापारियों (टियर-1 और टियर-2 रिटेलर्स) पर एक न्यूनतम शुल्क की व्यवस्था पुनः शुरू की जानी चाहिए। उनका तर्क है कि लगातार सरकारी सब्सिडी पर निर्भर रहने से नवाचार और तकनीकी सुरक्षा में दीर्घकालिक निवेश प्रभावित हो सकता है।
अब जब यूएसटीआर ने इसे व्यापार समझौते के स्तर पर एक विवादित बिंदु के रूप में उठाया है, तो भारतीय नीति-निर्माताओं के सामने दोहरा सवाल खड़ा हो गया है: क्या अंतरराष्ट्रीय व्यापार संतुलन को साधने और फिनटेक कंपनियों की वाणिज्यिक स्थिरता के लिए डिजिटल भुगतानों पर सीमित शुल्क की अनुमति दी जाए, या फिर देश के करोड़ों आम नागरिकों और छोटे दुकानदारों के वित्तीय समावेशन को प्राथमिकता देते हुए मुफ्त व्यवस्था को बरकरार रखा जाए?
- नीतिगत समीक्षा के संभावित रास्ते
आर्थिक विशेषज्ञों और नीति विश्लेषकों का मानना है कि भारत सरकार किसी बाहरी रिपोर्ट के दबाव में अचानक अपने घरेलू डिजिटल पब्लिक गुड्स मॉडल को समाप्त नहीं करेगी, लेकिन व्यापारिक वार्ताओं में गतिरोध दूर करने के लिए कुछ व्यावहारिक संशोधन संभव हैं:
श्रेणीबद्ध एमडीआर (टियर्ड एमडीआर): छोटे दुकानदारों (जैसे 20 लाख रुपये से कम वार्षिक टर्नओवर वाले व्यापारी) के लिए लेन-देन पूरी तरह मुफ्त रखा जा सकता है, जबकि बड़े कॉरपोरेट रिटेलर्स, ई-कॉमर्स कंपनियों और लक्जरी स्टोर्स पर मामूली ट्रांजैक्शन चार्ज लगाने की अनुमति दी जा सकती है।
क्रेडिट-ऑन-यूपीआई का विस्तार: क्रेडिट लाइन और क्रेडिट कार्ड्स को यूपीआई से जोड़ने की मौजूदा व्यवस्था में पहले से ही वाणिज्यिक शुल्क का प्रावधान है, जिसे वैश्विक संस्थाओं के लिए और अधिक खुला बनाया जा सकता है।
द्विपक्षीय बातचीत में डीपीआई की वकालत: भारत ने जी20 सहित कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को विकासशील देशों के लिए एक आदर्श मॉडल के रूप में पेश किया है। भारत व्यापार वार्ताकारों के समक्ष यह तर्क मजबूती से रख सकता है कि डिजिटल भुगतान को सार्वजनिक सुविधा (यूटिलिटी) की तरह देखा जाना चाहिए, न कि केवल वाणिज्यिक सेवा के रूप में।
यूएसटीआर की यह रिपोर्ट आने वाले समय में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार नीति मंच (Trade Policy Forum) की बैठकों में एक प्रमुख एजेंडा बनने जा रही है। भारत सरकार का निर्णय यह तय करेगा कि देश का फिनटेक उद्योग पूरी तरह बाजार-आधारित शुल्क मॉडल की ओर बढ़ेगा या आम नागरिकों के लिए शून्य-लागत का सुरक्षा चक्र निरंतर जारी रहेगा।
What's Your Reaction?





