सावन हरियाली तीज 2026: सुहागिनों के पावन पर्व पर क्यों पहनते हैं हरे वस्त्र? जानिए झूला झूलने और व्रत का पूरा विधान
हरियाली तीज 2026 पर सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए व्रत रखेंगी। जानिए इस पर्व पर हरे रंग, सोलह श्रृंगार और झूले की सदियों पुरानी परंपरा का क्या महत्व है।

- Hariyali Teej 2026: हरियाली तीज पर हरे रंग और झूले की परंपरा का महत्व, जानिए पूजा विधि और धार्मिक मान्यताएं
- हरियाली तीज पर क्यों पहना जाता है हरा रंग और झूला झूलने का क्या है गहरा रहस्य? जानें इस पावन पर्व की पूरी परंपरा
- Hariyali Teej 2026: सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर हरियाली तीज का व्रत, बाजारों और घरों में उत्सव का माहौल
हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पावन पर्व पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य, दांपत्य सुख और पति की लंबी उम्र की कामना का मुख्य अवसर माना जाता है। उत्तर और मध्य भारत के घरों में महिलाएं निर्जला व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत आराधना करती हैं। इस पर्व की सबसे प्रमुख पहचान हरे रंग के वस्त्र, हरी चूड़ियां, मेहंदी और पेड़ों पर झूला झूलने की परंपरा है। प्रकृति के नवजीवन और सौंदर्य से जुड़े इस उत्सव के लिए बाजारों में विशेष रौनक देखी जा रही है और महिलाएं पूजा की तैयारियों में जुटी हैं।
- क्या है हरियाली तीज का पावन पर्व
हरियाली तीज श्रावण मास के सबसे प्रमुख और लोकप्रिय त्योहारों में से एक है, जो विशेष रूप से भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी और 108वें जन्म में इसी पावन तिथि पर भगवान भोलेनाथ ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था।
यही कारण है कि विवाहित महिलाएं अपने दांपत्य जीवन की स्थिरता, सुख-समृद्धि और पति के उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु के लिए इस व्रत का पालन करती हैं। वहीं अविवाहित कन्याएं भी योग्य और मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए इस दिन पूरी श्रद्धा से व्रत और पूजन करती हैं। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और लोक संस्कृति के अटूट संबंध को भी दर्शाता है।
- हरे रंग और झूले की समृद्ध परंपरा
सावन के महीने में चारों ओर प्रकृति हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, जो नवीन ऊर्जा और ताजगी का प्रतीक है। हिंदू परंपरा में हरे रंग को प्रकृति, उर्वरता, खुशहाली और अखंड सौभाग्य का परिचायक माना गया है। हरियाली तीज के दिन महिलाएं विशेष रूप से हरे रंग की साड़ी, लहरिया परिधान और हरी कांच की चूड़ियां पहनती हैं। हाथों में रची मेहंदी भी सुहाग का शुभ चिन्ह मानी जाती है। धार्मिक दृष्टि से हरा रंग बुध ग्रह और प्रकृति के संतुलन से भी जुड़ा है, जो मानसिक शांति और दांपत्य जीवन में मधुरता लाने का कारक माना जाता है।
इसके साथ ही सावन में झूला झूलने की परंपरा सदियों पुरानी है। वर्षा ऋतु में पेड़ों की मजबूत डालियों पर सुंदर झूले डाले जाते हैं, जिन पर बैठकर महिलाएं और युवतियां पारंपरिक कजरी और तीज के लोकगीत गाती हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार झूला झूलना मन के आनंद, स्वतंत्रता और उत्साह को प्रकट करता है। यह ऋतु के स्वागत और सामाजिक मेलजोल का एक सशक्त माध्यम है, जहां परिवार और समाज की महिलाएं एक साथ मिलकर त्योहार का उल्लास साझा करती हैं।
- सामाजिक और पारिवारिक वातावरण का उल्लास
हरियाली तीज के आगमन से पूर्व ही घरों में विशेष उत्साह देखने को मिलता है। इस अवसर पर 'सिंधारे' की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें मायके से नवविवाहिता के लिए कपड़े, आभूषण, श्रृंगार सामग्री, फल और पारंपरिक मिठाइयां जैसे घेवर और गुझिया भेजी जाती हैं। सास अपनी बहू को आशीर्वाद स्वरूप श्रृंगार की वस्तुएं भेंट करती हैं, जिससे पारिवारिक रिश्तों में मधुरता और सम्मान का भाव बढ़ता है।
समाज के विभिन्न वर्गों में इस पर्व को लेकर गहरी आत्मीयता देखने को मिलती है। लोक कलाकारों और ग्रामीण महिलाओं के अनुसार, तीज के पारंपरिक गीत भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी रिश्तों को जोड़े रखने का कार्य करते हैं।
धार्मिक महत्व के साथ-साथ हरियाली तीज स्थानीय अर्थव्यवस्था और खुदरा बाजार को भी नई ऊर्जा प्रदान करती है। बाजारों में साड़ियों, पारंपरिक परिधानों, चूड़ियों, आभूषणों और कॉस्मेटिक उत्पादों की मांग में तेज उछाल आता है। इसके अतिरिक्त, मिठाई की दुकानों पर विशेष रूप से घेवर, फीणी और अन्य पारंपरिक व्यंजनों की भारी बिक्री दर्ज की जाती है।
मेहंदी लगाने वाले कलाकारों और स्थानीय कारीगरों के लिए यह पर्व रोजगार के बड़े अवसर लेकर आता है। समाजशास्त्रियों के दृष्टिकोण से, ऐसे पर्व न केवल परंपराओं को जीवित रखते हैं बल्कि सामुदायिक सौहार्द और नारी सशक्तिकरण के सकारात्मक पहलुओं को भी उजागर करते हैं।
- व्रत और पूजा का सही विधान
हरियाली तीज के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके पश्चात पूजा स्थल पर चौकी स्थापित कर उस पर पीला या लाल वस्त्र बिछाया जाता है। बालू या मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं बनाकर उन्हें स्थापित किया जाता है। माता पार्वती को सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित की जाती है और भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और पुष्प अर्पित किए जाते हैं।
पूजा के समय हरियाली तीज की पावन व्रत कथा का पाठ करना अनिवार्य माना जाता है। कथा श्रवण के उपरांत धूप-दीप से आरती की जाती है और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। महिलाएं दिनभर उपवास रखकर संध्या के समय पुन: आराधना करती हैं और अगले दिन विधिपूर्वक पारण कर व्रत को पूर्ण करती हैं।
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