अधिक मास की अमावस्या पर बन रहा है दुर्लभ संयोग: सुबह उठते ही करें महादान, तीन साल बाद मिलने वाले इस पुण्य अवसर को हाथ से न जाने दें।

भारतीय सनातन धर्म और वैदिक पंचांग में अधिक मास, जिसे पुरुषोत्तम मास या मलमास भी कहा जाता है, का एक विशेष

Jun 5, 2026 - 15:27
 0  1
अधिक मास की अमावस्या पर बन रहा है दुर्लभ संयोग: सुबह उठते ही करें महादान, तीन साल बाद मिलने वाले इस पुण्य अवसर को हाथ से न जाने दें।
अधिक मास की अमावस्या पर बन रहा है दुर्लभ संयोग: सुबह उठते ही करें महादान, तीन साल बाद मिलने वाले इस पुण्य अवसर को हाथ से न जाने दें।
  • पितृदोष और ग्रहों की पीड़ा से मुक्ति का अचूक मार्ग: पुरुषोत्तम मास की अंतिम तिथि पर अनाज और वस्त्र का दान बदल सकता है आपके जीवन की दिशा।
  • भूलकर भी न करें पवित्र तिथियों की अनदेखी: शास्त्रों में वर्णित एक विशेष दान से प्रसन्न होंगे भगवान विष्णु और पूर्वज, घर में आएगी सुख-समृद्धि।

भारतीय सनातन धर्म और वैदिक पंचांग में अधिक मास, जिसे पुरुषोत्तम मास या मलमास भी कहा जाता है, का एक विशेष और अत्यंत पवित्र स्थान है। यह महीना सामान्य महीनों की तुलना में तीन साल में एक बार आता है, जिसके कारण इसका आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस पूरे पवित्र महीने में किए जाने वाले जप, तप, पूजा-पाठ और ध्यान का फल अनंत गुना माना गया है। इस पूरे महीने की जो अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण तिथि होती है, वह है अधिक मास की अमावस्या। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, इस विशेष तिथि पर ब्रह्मांड में ऊर्जा का एक अनूठा प्रवाह होता है, जो मानव जीवन के कष्टों को दूर करने में सहायक सिद्ध होता है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर पवित्र नदियों में स्नान करने और दान-पुण्य करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसे जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है।

इस विशेष अमावस्या के दिन सुबह के समय किया जाने वाला दान केवल एक सामान्य धार्मिक कृत्य नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के संचित कर्मों के शुद्धिकरण की एक गहरी प्रक्रिया है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन सुबह सूर्योदय से ठीक पहले उठकर, जिसे ब्रह्म मुहूर्त कहा जाता है, स्नान आदि से निवृत्त होकर किसी योग्य या जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, जल, तिल या वस्त्र का दान अवश्य करना चाहिए। इस दिन विशेष रूप से कच्चे अनाज जैसे चावल, गेहूं और दालों का दान करने से घर में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति इस अत्यंत दुर्लभ और पवित्र अवसर को आलस्य या अज्ञानता के कारण गंवा देता है, उसे भविष्य में कई प्रकार की आर्थिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि ऐसा सुअवसर पुनः तीन वर्षों के बाद ही प्राप्त होता है। अधिक मास की अमावस्या पर दान करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य माना गया है। दान हमेशा पूरी श्रद्धा और बिना किसी अहंकार के दिया जाना चाहिए। इस दिन कांसे के पात्र में शुद्ध घी भरकर, उसमें सोने या तांबे का सिक्का डालकर दान करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है। इसके अतिरिक्त, यदि संभव हो तो मालपुए का दान भी इस दिन सर्वोत्तम माना गया है, क्योंकि पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु को मालपुए का भोग अति प्रिय है। दान देने से पहले सामग्री पर गंगाजल छिड़क कर उसे पवित्र कर लेना चाहिए और हाथ में जल लेकर संकल्प अवश्य लेना चाहिए।

इस तिथि का संबंध न केवल देवताओं से है, बल्कि इसे पितरों की तृप्ति के लिए भी सबसे उत्तम दिन माना गया है। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि अमावस्या तिथि के स्वामी पितृदेव होते हैं और जब यह तिथि अधिक मास में आती है, तो इसकी शक्ति और महत्ता असीमित हो जाती है। जिन परिवारों में लंबे समय से पितृदोष की समस्या चल रही है, जिसके कारण संतान प्राप्ति में बाधा, विवाह में देरी या परिवार के सदस्यों के बीच लगातार कलह का माहौल रहता है, उनके लिए यह दिन एक वरदान की तरह है। इस दिन सुबह उठकर अपने पूर्वजों के नाम से काले तिल, जल और कुश लेकर तर्पण करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों को सुख, शांति और दीर्घायु होने का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। पितरों की प्रसन्नता से घर का वास्तुदोष और मानसिक तनाव भी स्वतः ही समाप्त होने लगता है।

धार्मिक दृष्टिकोण के साथ-साथ इस विशेष तिथि का ज्योतिषीय महत्व भी बहुत व्यापक है, क्योंकि इस दिन कई ग्रहों की युति और नक्षत्रों का ऐसा योग बनता है जो सीधे तौर पर मानव भाग्य को प्रभावित करता है। कुंडली में राहु, केतु और शनि जैसे क्रूर ग्रहों के कुप्रभावों को शांत करने के लिए इस अमावस्या पर किए जाने वाले उपाय बेहद कारगर सिद्ध होते हैं। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से अज्ञात भय, अवसाद या कार्यों में बार-बार आने वाली रुकावटों से परेशान है, तो उसे इस दिन सुबह काले कपड़े में थोड़े से काले तिल और लोहे की कोई वस्तु रखकर किसी जरूरतमंद को दान कर देनी चाहिए। यह उपाय ग्रहों की विपरीत दशा को अनुकूल बनाने में मदद करता है और जीवन की अवरुद्ध प्रगति को पुनः गति प्रदान करता है, जिससे समाज में मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।

संसार के चक्र में उलझे आम मनुष्यों के लिए इस तिथि को आत्म-मंथन और आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत करने का समय भी माना जाता है। इस दिन दान-पुण्य करने से मनुष्य के भीतर की नकारात्मक भावनाएं जैसे लोभ, मोह और अहंकार का नाश होता है तथा सेवा भाव का उदय होता है। आध्यात्मिक साधना में रुचि रखने वाले लोग इस दिन मौन व्रत का पालन करते हैं और गायत्री मंत्र या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' महामंत्र का मानसिक जाप करते हैं। सुबह के समय किए गए दान का वैज्ञानिक महत्व भी है, क्योंकि सुबह का वातावरण शुद्ध और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर होता है, जिससे इस समय किए गए सात्विक कार्यों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बेहद अनुकूल प्रभाव पड़ता है, जो व्यक्ति को पूरे वर्ष ऊर्जावान बनाए रखता है।

Also Read- लिवर की सूजन को प्राकृतिक रूप से कम करने के लिए आज ही से अपनी डाइट में शामिल करें ये 6 चमत्कारी और असरदार सुपरफूड्स।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow