Indian Railway Hindi Language Rule: भारतीय रेलवे में अब 'नो इंग्लिश', हिंदी में काम न करने पर होगी सख्त कार्रवाई
भारतीय रेलवे ने राजभाषा नीति को बढ़ावा देने के लिए दफ्तरों में अंग्रेजी के इस्तेमाल को कम कर हिंदी में काम करने के सख्त निर्देश जारी किए हैं। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

- रेलवे का बड़ा फैसला: अफसर और कर्मचारी अब हिंदी में करेंगे कामकाज, लापरवाही पर सीधे एक्शन
- रेलवे में अब नहीं चलेगी अंग्रेजी! आधिकारिक कामकाज को लेकर जारी हुआ नया फरमान, अनदेखी पर नपेंगे अफसर
- बड़ी खबर: भारतीय रेलवे में राजभाषा नीति सख्त, अब हिंदी में ही होगा दफ्तरों का काम, आदेश जारी
भारतीय रेलवे ने अपने प्रशासनिक और आधिकारिक कामकाज में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव करने का फैसला किया है। देश के सबसे बड़े सरकारी नियोक्ता, रेल मंत्रालय ने सभी जोनों और मंडलों के अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए दफ्तरों में मुख्य रूप से हिंदी भाषा में काम करने के कड़े निर्देश जारी किए हैं। इस नए आदेश के तहत अब नियमित फाइलों, नोटिंग और आंतरिक संवाद में अंग्रेजी के प्रभुत्व को खत्म कर 'नो इंग्लिश' की नीति पर जोर दिया जाएगा। बुधवार को जारी इस आधिकारिक सर्कुलर में स्पष्ट रूप से चेतावनी दी गई है कि राजभाषा नीति के क्रियान्वयन में किसी भी प्रकार की ढिलाई या लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और दोषी पाए जाने वाले कर्मियों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी। सरकार का यह कदम आम जनता और प्रशासन के बीच की दूरी को पाटने तथा फाइलों के निपटारे में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
केंद्र सरकार की राजभाषा नीति को जमीनी स्तर पर पूरी तरह लागू करने के लिए भारतीय रेलवे ने एक अत्यंत सख्त रुख अपनाया है। रेलवे बोर्ड द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, रेलवे के सभी प्रशासनिक प्रभागों, कोर कमेटियों और क्षेत्रीय कार्यालयों में अब अधिकांश काम हिंदी में ही निपटाए जाएंगे। इस नीति का मुख्य उद्देश्य उन फाइलों और दस्तावेजों को आम और सुलभ भाषा में लाना है, जो लंबे समय से केवल अंग्रेजी में तैयार किए जा रहे थे। रेलवे ने साफ किया है कि यह केवल एक सुझाव नहीं है, बल्कि एक अनिवार्य आदेश है जिसका पालन कड़ाई से करना होगा।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ समय से राजभाषा विभाग की समीक्षा बैठकों में यह बात सामने आ रही थी कि कई ए और बी श्रेणी के हिंदी भाषी क्षेत्रों (जैसे उत्तर, मध्य और पश्चिमी रेलवे) में भी अधिकारी अपनी फाइलों पर मुख्य टिप्पणियां (नोटिंग) अंग्रेजी में ही लिख रहे हैं। इसके चलते राजभाषा अधिनियम के लक्ष्यों को हासिल करने में बाधा आ रही थी।
इसी विसंगति को दूर करने के लिए रेलवे बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों ने एक उच्च स्तरीय बैठक की, जिसके बाद यह नया कड़ा रुख सामने आया है। नए आदेश के लागू होते ही अब सभी जोन के महाप्रबंधकों (GMs) और मंडल रेल प्रबंधकों (DRMs) को अपने-अपने क्षेत्रों में इसकी दैनिक निगरानी करने को कहा गया है। अब से रेलवे बोर्ड को भेजी जाने वाली मासिक प्रगति रिपोर्ट में यह दिखाना होगा कि कितने प्रतिशत कार्य मूल रूप से हिंदी में निष्पादित किए गए हैं। जो अधिकारी इसमें पीछे रहेंगे या जानबूझकर नियमों की अनदेखी करेंगे, उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया जाएगा।
इस बड़े फैसले पर रेलवे कर्मचारी यूनियनों और प्रशासनिक हलकों से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। विभिन्न रेलवे यूनियनों के पदाधिकारियों का कहना है कि वे मातृभाषा और राजभाषा हिंदी का पूरा सम्मान करते हैं और इस फैसले का स्वागत करते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी चिंता जताई है कि अचानक पूरी तरह से हिंदी में शिफ्ट होने से उन तकनीकी कर्मचारियों को थोड़ी परेशानी हो सकती है, जो लंबे समय से अंग्रेजी शब्दावली और कोडिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं। यूनियनों ने मांग की है कि इसके लिए कर्मचारियों को उचित प्रशिक्षण और तकनीकी शब्दकोश उपलब्ध कराया जाए।
दूसरी तरफ, भाषाविदों और हिंदी प्रेमियों ने रेल मंत्रालय के इस कदम की सराहना की है। उनका तर्क है कि रेलवे सीधे तौर पर करोड़ों आम भारतीयों से जुड़ा विभाग है, इसलिए इसकी आंतरिक और बाहरी भाषा ऐसी होनी चाहिए जिसे देश का एक बड़ा हिस्सा आसानी से समझ सके। प्रशासन का मानना है कि इस कदम से काम में गति आएगी और बाबूशाही के ढर्रे में बदलाव होगा।
रेलवे के इस 'नो इंग्लिश' के सख्त रुख का व्यापक प्रभाव देखने को मिलेगा। सबसे बड़ा बदलाव फाइलों के मूवमेंट और निर्णय लेने की प्रक्रिया में आएगा। अब तक अंग्रेजी की क्लिष्ट शब्दावली के कारण जो फाइलें निचले स्तर से ऊपरी स्तर तक समझने में समय लेती थीं, वे अब तेजी से आगे बढ़ेंगी। इसके अलावा, दक्षिण और पूर्वोत्तर के उन गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों (सी श्रेणी) में जहां क्षेत्रीय भाषाएं या अंग्रेजी मुख्य साधन हैं, वहां नियमों के मुताबिक द्विभाषी (Bilingual) नीति अपनाई जाएगी, लेकिन हिंदी भाषी राज्यों में पूरी कड़ाई बरती जाएगी। इस फैसले से रेलवे के भीतर राजभाषा अधिकारियों और अनुवादकों की भूमिका और जिम्मेदारी भी काफी बढ़ जाएगी।
रेलवे बोर्ड ने स्पष्ट कर दिया है कि शुरुआती चरण में अधिकारियों और कर्मचारियों को इस व्यवस्था में ढलने के लिए आवश्यक संसाधन दिए जाएंगे। इसके लिए कार्यशालाएं (Workshops) आयोजित की जाएंगी और कंप्यूटर प्रणालियों में हिंदी टाइपिंग टूल्स को और अधिक सुगम बनाया जाएगा। इसके साथ ही, एक आंतरिक सतर्कता दल का गठन किया जाएगा जो औचक निरीक्षण कर यह जांचेगा कि फाइलों पर नोटिंग किस भाषा में की जा रही है। लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की वार्षिक कार्य मूल्यांकन रिपोर्ट (ACR) में भी इसका नकारात्मक उल्लेख किया जा सकता है। आने वाले महीनों में इस नीति की सफलता को देखते हुए केंद्र सरकार के अन्य मंत्रालयों में भी इसी तरह के कड़े नियम लागू किए जा सकते हैं।
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