दिल्ली में 115 तो मुंबई में 114.5 रुपये प्रति लीटर तय हुआ नया रेट, स्वैच्छिक योजना से एयरलाइंस को मिलेगी किराए स्थिर रखने की आजादी

देश के नागरिक उड्डयन क्षेत्र को एक बड़ी वित्तीय स्थिरता देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी नीतिगत

Jun 10, 2026 - 12:45
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दिल्ली में 115 तो मुंबई में 114.5 रुपये प्रति लीटर तय हुआ नया रेट, स्वैच्छिक योजना से एयरलाइंस को मिलेगी किराए स्थिर रखने की आजादी
दिल्ली में 115 तो मुंबई में 114.5 रुपये प्रति लीटर तय हुआ नया रेट, स्वैच्छिक योजना से एयरलाइंस को मिलेगी किराए स्थिर रखने की आजादी
  • नागर विमानन क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक कदम, अब 3 साल तक फिक्स रह सकेंगी जेट फ्यूल की कीमतें, कैबिनेट ने दी बड़ी राहत
  • एटीएफ की कीमतों में 10% का उछाल, सरकार ने तेल कंपनियों और एयरलाइंस को वैश्विक उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए बनाया 10,000 करोड़ का विशेष फंड

देश के नागरिक उड्डयन क्षेत्र को एक बड़ी वित्तीय स्थिरता देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी नीतिगत सुधार को मंजूरी दी है। इस नई व्यवस्था के तहत अब घरेलू एयरलाइंस कंपनियों को आगामी तीन साल तक के लिए एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी जेट ईंधन की कीमतों को एक निश्चित स्तर पर लॉक करने का अधिकार मिल गया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार अनिश्चितता बनी हुई है और भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। सरकार की इस नई पहल को 'प्राइस स्टेबलाइजेशन स्कीम' का नाम दिया गया है, जो पूरी तरह से स्वैच्छिक है। इसके साथ ही देश की सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने जेट फ्यूल की बेस कीमतों में लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी करने का भी निर्णय लिया है, ताकि बाजार की वास्तविकताओं और सरकारी सहायता के बीच एक संतुलन स्थापित किया जा सके। इस कदम से विमानन क्षेत्र को अपनी परिचालन लागत का बेहतर अनुमान लगाने में मदद मिलेगी।

इस नई और महत्वाकांक्षी मूल्य निर्धारण व्यवस्था के लागू होने के बाद, जो भी घरेलू विमानन कंपनियां इस स्वैच्छिक योजना का विकल्प चुनेंगी, उन्हें जेट फ्यूल के लिए 115 रुपये प्रति लीटर की एक तय और स्थिर कीमत का भुगतान करना होगा। इस योजना के आने से ठीक पहले देश में एटीएफ की औसत कीमत 104.927 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर चल रही थी, जिसमें अब तेल कंपनियों की नई समीक्षा के बाद बदलाव किया गया है। सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि जो एयरलाइंस इस फिक्स्ड प्राइसिंग फ्रेमवर्क का हिस्सा बनने के बजाय इससे बाहर रहने का निर्णय लेती हैं, उनके लिए ईंधन की खरीद की पुरानी व्यवस्था ही लागू रहेगी। यानी वे कंपनियां बाजार की तात्कालिक दरों या मार्केट लिंक्ड रेट्स पर ही एटीएफ खरीदती रहेंगी। वर्तमान समय में बाजार से जुड़ा यह रेट लगभग 142 रुपये प्रति लीटर के उच्च स्तर पर बना हुआ है, जो कि अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस द्वारा भारतीय हवाई अड्डों पर ईंधन भरने के लिए चुकाई जाने वाली कीमतों के बिल्कुल बराबर है।

विमानन मंत्रालय और उद्योग से जुड़े विभिन्न स्रोतों के माध्यम से जो जानकारियां सामने आई हैं, उनके मुताबिक यह पूरी स्कीम पूरी तरह से ऑप्शनल या वैकल्पिक रखी गई है। सरकार की तरफ से किसी भी एयरलाइन पर इसे चुनने का कोई कानूनी या प्रशासनिक दबाव नहीं होगा, बल्कि विमानन कंपनियां अपनी वित्तीय स्थिति और व्यावसायिक रणनीति को ध्यान में रखकर खुद यह तय करेंगी कि उन्हें इस तीन साल की योजना में शामिल होना है या नहीं। जो कंपनियां इस योजना को स्वीकार कर इसके दायरे में आएंगी, वे पूरे लॉक-इन पीरियड के दौरान अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क कीमतों में होने वाले किसी भी आकस्मिक और बड़े उतार-चढ़ाव से पूरी तरह सुरक्षित हो जाएंगी। इसके विपरीत, जो एयरलाइंस इस तंत्र से बाहर रहने का फैसला करती हैं, उन्हें भविष्य में वैश्विक कीमतें घटने पर तो सीधा आर्थिक फायदा मिल सकता है, लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम अचानक बढ़ते हैं, तो उस अतिरिक्त वित्तीय बोझ को भी उन्हें पूरी तरह खुद ही वहन करना होगा।

फ्यूल प्राइसिंग और प्रमुख शहरों के प्रभावी रेट्स

फ्री-ऑन-बोर्ड (FOB) बेंचमार्क: 86.32 रुपये प्रति लीटर

शामिल अन्य शुल्क: एयरपोर्ट चार्ज, ऑयल कंपनियों का मार्जिन और स्थानीय लागू टैक्स

दिल्ली में प्रभावी कीमत: 115 रुपये प्रति लीटर

मुंबई में प्रभावी कीमत: 114.5 रुपये प्रति लीटर

चेन्नई में प्रभावी कीमत: 139 रुपये प्रति लीटर

इस पूरी योजना के तहत फिक्स्ड प्राइसिंग का जो फॉर्मूला तैयार किया गया है, वह पूरी तरह से 86.32 रुपये प्रति लीटर के 'फ्री-ऑन-बोर्ड' (FOB) बेंचमार्क पर आधारित है। इस बेस रेट के ऊपर विभिन्न प्रकार के अतिरिक्त खर्चों को जोड़ा गया है, जिनमें हवाई अड्डों पर लगने वाले विभिन्न चार्ज, तेल विपणन कंपनियों का परिचालन मार्जिन और अलग-अलग राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले स्थानीय टैक्स व वैट शामिल हैं। इन सभी घटकों को मिलाने के बाद जो अंतिम प्रभावी कीमत निकलकर सामने आ रही है, वह देश के अलग-अलग महानगरों में वहां के टैक्स ढांचे के हिसाब से भिन्न होगी। इस फॉर्मूले के अनुसार, दिल्ली के हवाई अड्डों पर विमानों को 115 रुपये प्रति लीटर की दर से ईंधन मिलेगा, जबकि मुंबई में यह दर 114.5 रुपये प्रति लीटर तय की गई है। वहीं, चेन्नई में स्थानीय टैक्स दरों के उच्च होने के कारण विमानन कंपनियों को 139 रुपये प्रति लीटर की प्रभावी कीमत का भुगतान करना होगा।

यह बड़ा नीतिगत और रणनीतिक कदम सरकार द्वारा एक ऐसे नाजुक समय पर उठाया गया है, जब इस साल की शुरुआत में पश्चिम एशिया के भीतर एक नया संघर्ष और भू-राजनीतिक तनाव शुरू हो गया था। इस तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और जेट ईंधन की कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया गया था, लेकिन इसके बावजूद देश की राजधानी दिल्ली में घरेलू विमानन ईंधन की कीमतें लगातार दो महीने से अधिक समय तक लगभग 105 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर ही स्थिर बनी रही थीं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतों में हुई इस भारी और अप्रत्याशित बढ़ोतरी का पूरा बोझ देश के हवाई यात्रियों और घरेलू एयरलाइंस कंपनियों पर नहीं डाला गया था, बल्कि इसका एक बहुत छोटा हिस्सा ही उपभोक्ताओं के ऊपर ट्रांसफर किया गया था। इस मानवीय और जनहितैषी दृष्टिकोण के कारण देश की सरकारी तेल विपणन कंपनियों को पिछले कुछ महीनों के दौरान बहुत बड़ा वित्तीय और परिचालन नुकसान उठाना पड़ा था, जिसकी भरपाई करना बेहद जरूरी हो गया था।

तेल कंपनियों को हुए इस बड़े नुकसान की भरपाई करने और देश के पूरे एविएशन सेक्टर को भविष्य में आने वाले किसी भी बड़े वैश्विक उतार-चढ़ाव या झटके से पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए केंद्रीय कैबिनेट ने 10,000 करोड़ रुपये के एक विशाल 'प्राइस स्टेबलाइजेशन फ्रेमवर्क' को अपनी मंजूरी दी है। इस नए वित्तीय सिस्टम के संचालन की प्रक्रिया बेहद पारदर्शी और संतुलित रखी गई है, जिसके तहत यदि अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क कीमतें 86.32 रुपये प्रति लीटर के तय बेस रेट से ऊपर चली जाती हैं, तो सरकार इस वित्तीय अंतर को पाटने के लिए ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को बिना किसी ब्याज के एडवांस राशि जारी करेगी। इसके विपरीत, जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और ईंधन की कीमतें इस बेस रेट से नीचे आएंगी, तो तेल कंपनियों द्वारा बाजार से अतिरिक्त रकम की वसूली की जाएगी और उस अधिशेष राशि को वापस भारत के कंसोलिडेटेड फंड (संचित निधि) में जमा करा दिया दिया जाएगा, जिससे यह पूरा मॉडल आत्मनिर्भर बना रहेगा।

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