'छह महीने तो दूर, तीन महीने भी मुश्किल से टिक पाएगी यह व्यवस्था' - चेन्नै के राजनीतिक मंच से पूर्व मुख्यमंत्री का बड़ा हमला
दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य तमिलनाडु की राजनीति में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से जारी उठापटक अब एक बेहद
- तमिलनाडु की सियासत में भारी उबाल, एम.के. स्टालिन ने नई सरकार के स्थायित्व पर खड़े किए बेहद गंभीर और तीखे सवाल
- संगठनात्मक ढांचे के बिना केवल सोशल मीडिया के दम पर सत्ता में आने का आरोप, सहयोगी दलों के रुख को लेकर बढ़ीं राजनीतिक सरगर्मियां
दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य तमिलनाडु की राजनीति में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से जारी उठापटक अब एक बेहद आक्रामक और दिलचस्प मोड़ पर पहुंच चुकी है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के अध्यक्ष और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने राजधानी चेन्नै में आयोजित एक महत्वपूर्ण राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान नवनिर्वाचित सरकार के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा और सीधा हमला बोला है। अभिनेता से राजनेता बने जोसफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) सरकार के गठन के बमुश्किल एक महीने के भीतर ही स्टालिन ने इसके भविष्य और स्थायित्व को लेकर बेहद चौंकाने वाली टिप्पणी की है। पूर्व मुख्यमंत्री के इस तीखे बयान ने राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में एक नया भूचाल ला दिया है, जिससे यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में राज्य के भीतर एक बड़ा और दीर्घकालिक राजनीतिक टकराव देखने को मिल सकता है।
इस पूरे सियासी हमले की परतों को खोलते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने चेन्नै में आयोजित उस विशेष समारोह का हवाला दिया, जहां एक प्रमुख राजनीतिक दल के पूर्व विधायक पनियूर बाबू अपने सैकड़ों वफादार समर्थकों के साथ औपचारिक रूप से डीएमके में शामिल हो रहे थे। स्टालिन ने इस मंच से राज्य की जनता और राजनीतिक विश्लेषकों को संबोधित करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान करते हुए उनकी पार्टी ने शुरुआत में यह नीतिगत निर्णय लिया था कि वे नई सरकार के गठन के बाद कम से कम छह महीने तक उसकी कार्यप्रणाली पर कोई प्रत्यक्ष आलोचना या टिप्पणी नहीं करेंगे। हालांकि, राज्य के वर्तमान प्रशासनिक हालात और तेजी से बदलते समीकरणों ने उन्हें समय से पहले अपनी चुप्पी तोड़ने पर मजबूर कर दिया है। उन्होंने बेहद कड़े लहजे में कहा कि आज पूरे राज्य के भीतर जनता और राजनीतिक गलियारों में यह गंभीर चर्चा शुरू हो चुकी है कि क्या यह नई प्रशासनिक व्यवस्था छह या पांच महीने तो दूर, तीन महीने भी सम्मानजनक तरीके से टिक पाएगी या नहीं।
स्टालिन ने टीवीके के संगठनात्मक ढांचे और जमीनी पकड़ पर सीधा प्रहार करते हुए इसे महज एक कृत्रिम और डिजिटल लहर का परिणाम करार दिया। उन्होंने तुलनात्मक कूटनीति का सहारा लेते हुए साझा किया कि उनकी पार्टी ने पिछले आम चुनावों के तुरंत बाद से ही आगामी विधानसभा चुनावों के लिए बेहद गहन और सूक्ष्म स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी थीं, जिसके तहत प्रत्येक मतदान केंद्र पर बूथ स्तर के एजेंटों की नियुक्ति, व्यापक सदस्य नामांकन अभियान और क्षेत्रीय सम्मेलनों का सफल आयोजन किया गया था। इतनी व्यापक और व्यवस्थित जमीनी मेहनत के बावजूद चुनावी गणित में उतार-चढ़ाव देखने को मिले। इसके विपरीत, वर्तमान सत्ताधारी दल ने न तो जमीनी स्तर पर मतदाताओं से कोई सीधा और सघन जनसंपर्क किया और न ही कई महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में उनके पास पोलिंग या काउंटिंग एजेंट तक मौजूद थे। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि केवल इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की चकाचौंध के भरोसे चुनी गई सरकारें दीर्घकालिक रूप से राज्य का शासन चलाने में पूरी तरह से अक्षम साबित होती हैं। पूर्व मुख्यमंत्री ने एक और बेहद बड़ा और सनसनीखेज दावा करते हुए कहा कि उनकी पार्टी ने अपने पुराने सहयोगी दलों को नई सरकार को समर्थन देने की मौन सहमति केवल एक विशिष्ट उद्देश्य से दी थी। उनका मुख्य लक्ष्य राज्य में किसी भी सूरत में राष्ट्रपति शासन लागू होने की परिस्थितियों को रोकना था, क्योंकि वैसी स्थिति बनने पर अप्रत्यक्ष रूप से केंद्रीय सत्ताधारी दल को तमिलनाडु के प्रशासनिक मामलों में सीधे हस्तक्षेप करने का मौका मिल जाता। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि यह समर्थन बेहद अस्थाई है और बहुत जल्द वे इस सरकार को लोकतांत्रिक तरीके से अपदस्थ करने का संकल्प लेंगे।
इस राजनीतिक घटनाक्रम के समानांतर राज्य के एक अन्य प्रमुख विपक्षी दल के महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने भी नई सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए स्टालिन के सुर में सुर मिलाया है। सलेम में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान मुख्यमंत्री के पास विधानसभा में पूर्ण और स्पष्ट बहुमत का आंकड़ा मौजूद नहीं है और वे पूरी तरह से बैसाखियों पर टिकी सरकार चला रहे हैं। उन्होंने एक व्यावहारिक उदाहरण देते हुए कहा कि यह सरकार एक ऐसी कुर्सी की तरह है जिसके दो पैर तो मुख्य दल के हैं, लेकिन बाकी के दो पैर गठबंधन सहयोगियों के समर्थन पर टिके हुए हैं। यदि आने वाले समय में वैचारिक मतभेदों के कारण किसी भी सहयोगी दल ने अपना समर्थन वापस खींच लिया, तो यह राजनीतिक कुर्सी ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी, जिससे राज्य में दोबारा चुनाव की नौबत आ सकती है।
विपक्षी दलों द्वारा उठाए जा रहे इन गंभीर और तीखे सवालों के केंद्र में नई सरकार की पहली कैबिनेट बैठक के दौरान लिए गए कुछ प्रशासनिक फैसले भी शामिल हैं। मुख्यमंत्री जोसफ विजय की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में युवाओं और महिलाओं को केंद्रित करते हुए कुल 436 नई विकास परियोजनाओं को लागू करने की घोषणा की गई थी, जिसमें नशामुक्त तमिलनाडु का संकल्प भी शामिल था। विपक्ष का आरोप है कि सरकार केवल बड़ी-बड़ी घोषणाएं करके जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रही है, क्योंकि इन योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर न तो विभागों का कोई स्पष्ट वर्गीकरण किया गया है और न ही बजट में किसी ठोस वित्तीय आवंटन का पारदर्शी विवरण प्रस्तुत किया गया है। बिना वित्तीय बैकअप के की जाने वाली ऐसी घोषणाएं केवल कागजी साबित होती हैं, जिससे प्रशासनिक तंत्र में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।
इस बड़े दल-बदल कार्यक्रम के दौरान डीएमके नेतृत्व ने अपनी पार्टी के सामाजिक न्याय और विकास के पुराने रिकॉर्ड को भी जनता के सामने बेहद मजबूती से रखा ताकि वे अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को दोबारा हासिल कर सकें। स्टालिन ने चेय्यूर निर्वाचन क्षेत्र में अपने पिछले कार्यकाल के दौरान किए गए महत्वपूर्ण कार्यों, जैसे कला और विज्ञान कॉलेज की स्थापना, सिपकॉट औद्योगिक एस्टेट का निर्माण और हजारों भूमिहीन लाभार्थियों को मुफ्त आवासीय पट्टे बांटने के कार्यों को गिनाया। उन्होंने नए शामिल हुए नेताओं का स्वागत करते हुए कहा कि वैचारिक रूप से मजबूत कार्यकर्ता हमेशा उसी आंदोलन को चुनते हैं जिसके पास समाज कल्याण की एक स्पष्ट और दीर्घकालिक दूरदृष्टि होती है, न कि क्षणिक चकाचौंध।
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