राष्ट्रपति भवन के रक्षा अलंकरण समारोह में भावुक हुआ पूरा देश, मरणोपरांत कीर्ति चक्र लेते समय भावविह्वल हुईं अमर शहीद की माता
देश की राजधानी दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन के ऐतिहासिक दरबार हॉल में आयोजित भव्य रक्षा अलंकरण समारोह के दौरान
- वीर सपूत सेपॉय जंजाल प्रवीण प्रभाकर के सर्वोच्च बलिदान को राष्ट्र का नमन, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गले लगाकर ढांढस बंधाया
- आतंकवादियों के खिलाफ अभियान में अदम्य साहस का परिचय देने वाले जांबाज की शौर्य गाथा सुनकर नम हुईं उपस्थित गणमान्य लोगों की आंखें
देश की राजधानी दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन के ऐतिहासिक दरबार हॉल में आयोजित भव्य रक्षा अलंकरण समारोह के दौरान एक ऐसा अभूतपूर्व और संवेदनशील क्षण देखने को मिला, जिसने वहां मौजूद प्रत्येक विशिष्ट अतिथि, सैन्य अधिकारी और पूरे देश को गहरे तक झकझोर दिया। भारतीय सेना की राष्ट्रीय राइफल्स के जांबाज सेपॉय जंजाल प्रवीण प्रभाकर को देश की संप्रभुता, अखंडता की रक्षा और आतंकवाद के खिलाफ चलाए गए एक अत्यंत जटिल अभियान में उनके असाधारण पराक्रम, अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत प्रतिष्ठित 'कीर्ति चक्र' से सम्मानित किया गया। जब शहीद सैनिक का नाम पुकारा गया, तो उनकी वृद्ध माता अपने लाडले के इस सर्वोच्च सम्मान को ग्रहण करने के लिए मंच की ओर बढ़ीं। अपने इकलौते बेटे की शहादत के गम और इस गौरवमयी क्षण के बीच वे अपनी भावनाओं और आंसुओं के वेग को रोक नहीं सकीं और देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगीं। इस दृश्य को देखकर दरबार हॉल में कुछ पलों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया और स्वयं राष्ट्रपति की आंखें भी पूरी तरह नम हो गईं।
शहीद सेपॉय जंजाल प्रवीण प्रभाकर की यह शौर्य गाथा जम्मू-कश्मीर के एक अत्यधिक संवेदनशील और दुर्गम पहाड़ी इलाके में चलाए गए एक विशेष आतंकवाद विरोधी अभियान से जुड़ी हुई है। खुफिया एजेंसियों से मिली पुख्ता और सटीक जानकारी के आधार पर सेना की टुकड़ी ने घने जंगलों के बीच छिपे भारी हथियारों से लैस अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों के एक गुप्त ठिकाने को चारों तरफ से घेर लिया था। इस बेहद खतरनाक घेराबंदी (कॉर्डन एंड सर्च ऑपरेशन) के दौरान आतंकवादियों ने खुद को घिरता देख सेना के जवानों पर आधुनिक और स्वचालित हथियारों से अंधाधुंध गोलाबारी शुरू कर दी। विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों और रात के घने अंधेरे के बावजूद सेपॉय प्रवीण प्रभाकर ने अपनी जान की परवाह न करते हुए मोर्चे को अग्रिम पंक्ति से संभाला और अपनी सटीक रणनीति व अचूक गोलाबारी से दो खूंखार आतंकवादियों को मौके पर ही ढेर कर दिया। इस आमने-सामने की भीषण मुठभेड़ के दौरान वे खुद भी गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उन्होंने अंतिम सांस तक अपनी पोजीशन नहीं छोड़ी और रेंगते हुए अपने साथियों को कवर प्रदान किया।
इस अलंकरण समारोह के दौरान जब सैन्य उद्घोषक द्वारा शहीद प्रवीण प्रभाकर के अदम्य साहस और अंतिम क्षणों के वीरतापूर्ण विवरण का प्रशस्ति पत्र पढ़ा जा रहा था, तो हॉल में उपस्थित प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और तीनों सेनाओं के प्रमुखों सहित सभी गणमान्य नागरिकों के चेहरे पर उस जांबाज के प्रति गहरा सम्मान और कृतज्ञता का भाव साफ दिखाई दे रहा था। जैसे ही राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शहीद की माता के हाथों में कीर्ति चक्र और प्रशस्ति पत्र सौंपा, वैसे ही मां का मातृ हृदय बेटे की याद में पूरी तरह टूट गया। राष्ट्रपति ने प्रोटोकॉल और औपचारिकताओं की सीमाओं से परे हटकर एक मां की तरह शहीद की माता को अपने गले से लगा लिया और काफी देर तक उनके कंधे पर हाथ रखकर उन्हें ढांढस बंधाया। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठी हस्ती और एक वीर माता के बीच का यह आत्मीय और कूटनीतिक संवाद इस बात का प्रमाण था कि राष्ट्र अपने शहीदों के परिवारों के दुख में पूरी तरह उनके साथ खड़ा है। महाराष्ट्र के एक छोटे से ग्रामीण अंचल से आने वाले सेपॉय जंजाल प्रवीण प्रभाकर बचपन से ही भारतीय सेना में शामिल होकर देश की सेवा करने का सपना देखते थे। उनके पिता के असमय निधन के बाद उनकी माता ने अत्यंत कठिनाइयों और आर्थिक अभावों का सामना करते हुए अपने बेटे को पाला-पोषा और उसे देश की रक्षा के लिए सेना में भेजा था। बेटे की शहादत के बाद यद्यपि उनका पूरा संसार उजड़ गया, लेकिन उन्हें इस बात का गर्व है कि उनके बेटे ने पीठ दिखाकर नहीं बल्कि सीने पर गोली खाकर अपनी मातृभूमि का कर्ज चुकाया है।
इस भव्य समारोह के संपन्न होने के तुरंत बाद सोशल मीडिया के विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और संचार माध्यमों पर इस भावुक क्षण की तस्वीरें और वीडियो बहुत तेजी से वायरल हो गए, जिसने इंटरनेट पर राष्ट्रवाद और मानवीय संवेदनाओं की एक नई बहस को जन्म दे दिया है। देश के करोड़ों नागरिकों ने इस दृश्य को भारतीय लोकतंत्र और सैन्य परंपरा की सबसे खूबसूरत और संवेदनशील तस्वीर बताया है। लोग इस बात की काफी सराहना कर रहे हैं कि देश की सर्वोच्च कमांडर ने एक मां के दुख को कितनी आत्मीयता से समझा और औपचारिकताओं को दरकिनार कर उन्हें अपनी गोद में समेट लिया। इस घटना ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले सैनिकों का परिवार किसी एक राज्य या समाज का नहीं, बल्कि पूरे देश की साझा जिम्मेदारी और धरोहर होता है।
सैन्य अधिकारियों ने इस अभियान के तकनीकी और रणनीतिक पहलुओं पर चर्चा करते हुए बताया कि जिस दुर्गम क्षेत्र में यह मुठभेड़ हुई थी, वहां आतंकवादियों के पास अत्याधुनिक संचार उपकरण और अमेरिकी मूल के घातक हथियार मौजूद थे। ऐसे में सेपॉय प्रवीण प्रभाकर द्वारा दिखाया गया त्वरित निर्णय और अद्भुत युद्ध कौशल असाधारण श्रेणी में आता है। यदि उस रात उन्होंने अपनी पोजीशन छोड़कर पीछे हटने का फैसला किया होता, तो आतंकवादी घने जंगलों का फायदा उठाकर भागने में सफल हो जाते और रिहायशी बस्तियों में घुसकर किसी बड़ी तबाही को अंजाम दे सकते थे। उनके इस सर्वोच्च बलिदान ने न केवल उनके पूरी पलटन की जान बचाई, बल्कि घाटी में शांति और सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखने में भी एक बेहद निर्णायक भूमिका निभाई।
शहीद के पैतृक गांव में भी इस सम्मान की सूचना मिलने के बाद से ही एक तरफ जहां माहौल बेहद गमगीन है, वहीं दूसरी तरफ अपने ग्रामीण लाडले को मिले इस सर्वोच्च नागरिक और सैन्य सम्मान को लेकर पूरा जिला गौरव का अनुभव कर रहा है। राज्य सरकार ने शहीद के सम्मान में उनके गांव की मुख्य सड़क और स्थानीय शासकीय विद्यालय का नामकरण शहीद सेपॉय जंजाल प्रवीण प्रभाकर के नाम पर करने की आधिकारिक घोषणा की है, ताकि आने वाली युवा पीढ़ियां उनके इस बलिदान से निरंतर प्रेरणा ले सकें। इसके साथ ही पीड़ित परिवार को आर्थिक संबल प्रदान करने के लिए विशेष अनुग्रह राशि और परिवार के एक योग्य सदस्य को सरकारी नौकरी देने की प्रक्रिया को भी त्वरित गति से पूरा करने के निर्देश जारी किए गए हैं।
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