POCSO Act SC Verdict: अभियोजन का पक्ष आंख मूंदकर सच नहीं माना जा सकता, सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो केस में आरोपी को किया बरी

सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो कानून की व्याख्या करते हुए कहा है कि अभियोजन की दलील आंख मूंदकर सच नहीं मानी जा सकती। बुनियादी साक्ष्य के बिना दोष का अनुमान लागू नहीं होगा।

Sep 19, 2026 - 14:27
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POCSO Act SC Verdict: अभियोजन का पक्ष आंख मूंदकर सच नहीं माना जा सकता, सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो केस में आरोपी को किया बरी
  • सुप्रीम कोर्ट का पॉक्सो मामले में बड़ा फैसला: केवल वैधानिक अनुमान अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं, सबूत जरूरी
  • Supreme Court on POCSO: प्राथमिक तथ्य सिद्ध किए बिना लागू नहीं होगा अपराध का अनुमान, शीर्ष अदालत ने रद्द की सजा
  • पॉक्सो कानून पर सुप्रीम कोर्ट की अहम व्याख्या: अभियोजन को पहले स्थापित करने होंगे बुनियादी तथ्य, आरोपी हुआ दोषमुक्त

नई दिल्ली। देश की शीर्ष अदालत ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने वाले विशेष कानून (पॉक्सो अधिनियम) से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट कानूनी व्यवस्था दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि किसी भी आपराधिक मामले में केवल इसलिए अभियोजन पक्ष के दावों को आंख मूंदकर सच स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि कानून के तहत आरोपी के खिलाफ अपराध का कानूनी अनुमान (प्रिजम्प्शन ऑफ गिल्ट) लगाने का प्रावधान मौजूद है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष को यह कानूनी लाभ तभी मिल सकता है, जब वह पहले ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए घटना के बुनियादी तथ्यों (फाउंडेशनल फैक्ट्स) को संदेह से परे सिद्ध करे।

शीर्ष अदालत की पीठ ने एक निचली अदालत द्वारा सुनाई गई और उच्च न्यायालय द्वारा बरकरार रखी गई दोषसिद्धि के आदेश को पलटते हुए संबंधित आरोपी को सभी आरोपों से ससम्मान बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि प्रस्तुत मामले में अभियोजन का पूरा ढांचा अस्पष्ट और विरोधाभासी साक्ष्यों पर टिका था, जिसके आधार पर किसी व्यक्ति को वर्षों के लिए जेल की सलाखों के पीछे रखना न्याय के सिद्धांतों के पूर्णतः विपरीत होगा।

  • पॉक्सो कानून की धारा 29 और 30 की न्यायिक व्याख्या

पॉक्सो कानून के तहत धारा 29 और 30 में यह व्यवस्था दी गई है कि जब किसी व्यक्ति पर कानून के तहत गंभीर यौन अपराधों का आरोप लगाया जाता है, तो विशेष अदालत यह मानकर चलेगी कि आरोपी ने वह अपराध किया है, जब तक कि वह स्वयं को निर्दोष सिद्ध न कर दे। सामान्य आपराधिक न्यायशास्त्र में 'निर्दोष होने की धारणा' (प्रिजम्प्शन ऑफ इनोसेंस) का सिद्धांत लागू होता है, लेकिन बाल अपराधों की गंभीरता को देखते हुए विधायिका ने इसमें सबूत का भार आरोपी पर स्थानांतरित किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी कानूनी प्रावधान की सीमाएं स्पष्ट करते हुए रेखांकित किया कि धारा 29 का वैधानिक अनुमान स्वतः या निरपेक्ष (एब्सोल्यूट) रूप से लागू नहीं होता। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि जैसे ही पुलिस ने किसी व्यक्ति के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल की, अदालत अभियोजन की हर कहानी को अंतिम सत्य मान लेगी। पीठ ने व्यवस्था दी कि इस अनुमान को सक्रिय करने के लिए अभियोजन पक्ष को पहले यह साबित करना होगा कि कोई घटना वास्तव में घटी थी और उसमें आरोपी की प्रारंभिक संलिप्तता मौजूद थी। यदि बुनियादी तथ्य ही संदिग्ध हैं, तो कानूनन अपराध का अनुमान लागू करने का कोई आधार नहीं बचता।

  • साक्ष्यों की कमी और विरोधाभास पर अदालत की सख्त टिप्पणी

अदालत ने संबंधित मामले का परीक्षण करते हुए दर्ज किया कि जांच के दौरान और गवाहों के बयानों में गंभीर विसंगतियां पाई गईं। पीड़िता के बयानों, मेडिकल रिपोर्ट और घटनास्थल के विवरण में आपसी तालमेल नहीं था। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने केवल इस आधार पर आरोपी को दोषी ठहरा दिया कि पॉक्सो एक्ट में आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करनी होती है।

शीर्ष अदालत ने इस दृष्टिकोण को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण ठहराया। अदालत ने कहा कि जब अभियोजन पक्ष का अपना मामला ही विरोधाभासों से भरा हो और विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने में विफल रहा हो, तो आरोपी पर अपनी बेगुनाही साबित करने का अनुचित भार नहीं डाला जा सकता। न्याय का बुनियादी सिद्धांत यह मांग करता है कि अभियोजन को अपने पैरों पर खड़ा होना होगा, न कि आरोपी की विवशता या कानून के कड़े प्रावधानों की आड़ में दोषसिद्धि हासिल करनी चाहिए।

  • निष्पक्ष सुनवाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संतुलन

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इस बात पर विशेष बल दिया कि पॉक्सो जैसे कड़े कानूनों में जहां न्यूनतम सजा का प्रावधान अत्यंत कठोर है, वहां अदालतों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। कानून जितना अधिक कठोर होता है, साक्ष्यों की जांच-परख की प्रक्रिया भी उतनी ही अधिक सतर्क और सूक्ष्म होनी चाहिए।

पीठ ने टिप्पणी की कि बाल उत्पीड़न के मामलों में समाज की चिंता और संवेदनशीलता पूरी तरह स्वाभाविक है। बच्चों की सुरक्षा के लिए कठोर कानून का होना आवश्यक है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया को केवल भावनात्मक दृष्टिकोण या जनधारणा के आधार पर संचालित नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष सुनवाई (फेयर ट्रायल) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है। यदि बिना पुख्ता साक्ष्य के मात्र आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी मान लिया जाएगा, तो इससे कानून का दुरुपयोग बढ़ेगा और निर्दोष व्यक्तियों के जीवन पर अपूरणीय संकट खड़ा होगा।

  • निचली अदालतों के लिए स्पष्ट संदेश

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय देश भर की विशेष पॉक्सो अदालतों और उच्च न्यायालयों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत स्थापित करता है। कई बार यह देखने में आता है कि विशेष कानूनों के मामलों में अभियोजन की खामियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि जांच एजेंसियों को पेशेवर तरीके से साक्ष्य जुटाने होंगे। फॉरेंसिक सबूत, स्वतंत्र गवाहों की गवाही और मेडिकल साक्ष्य का उचित मूल्यांकन अनिवार्य है। अदालत ने दोहराया कि संदेह चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, वह कानूनी साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता। इसी कानूनी आधार पर आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए अदालत ने उसे तुरंत रिहा करने का आदेश जारी किया।

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