UP: मऊ की एमपी/एमएलए अदालत ने सपा विधायक सुधाकर सिंह को भगोड़ा घोषित किया: 39 साल पुराने मामले में 10 जुलाई को होगी अगली सुनवाई। 

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले की एमपी/एमएलए अदालत ने घोसी विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी (सपा) के विधायक सुधाकर सिंह को 25 जुलाई...

Jul 4, 2025 - 11:43
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UP: मऊ की एमपी/एमएलए अदालत ने सपा विधायक सुधाकर सिंह को भगोड़ा घोषित किया: 39 साल पुराने मामले में 10 जुलाई को होगी अगली सुनवाई। 

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले की एमपी/एमएलए अदालत ने घोसी विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी (सपा) के विधायक सुधाकर सिंह को 25 जुलाई 2023 को एक 39 साल पुराने मामले में भगोड़ा घोषित किया। यह मामला 1986 का है, जब सुधाकर सिंह पर दोहरीघाट पुलिस ने सरकारी कार्य में बाधा डालने, तोड़फोड़ करने, और 400 केवी बिजली उपकेंद्र पर प्रदर्शन के दौरान अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया था। अदालत ने उनके खिलाफ फरारी आदेश को बरकरार रखा है, और इस मामले की अगली सुनवाई 10 जुलाई 2025 को निर्धारित की गई है। इस फैसले ने न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी हलचल मचा दी है, क्योंकि सुधाकर सिंह अपने क्षेत्र में सक्रिय रूप से राजनीति कर रहे हैं।

यह मामला 1986 का है, जब सुधाकर सिंह, जो उस समय एक छात्र नेता थे, ने मऊ के घोसी में 400 केवी बिजली उपकेंद्र पर बिजली कटौती के विरोध में प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर तोड़फोड़, सरकारी कार्य में बाधा, और अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार हुआ। दोहरीघाट पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया, जिसमें सरकारी कार्य में व्यवधान (धारा 353), तोड़फोड़ (धारा 427), और अन्य संबंधित धाराएं शामिल थीं। उस समय मऊ जिला अस्तित्व में नहीं था, और यह मामला तत्कालीन आजमगढ़ जिला न्यायालय में विचाराधीन था। सुधाकर सिंह को इस मामले में जमानत मिल गई थी, और वे नियमित रूप से कोर्ट में हाजिर होते रहे। 1989 में मऊ के जिला बनने के बाद, इस मामले की पत्रावली मऊ जिला अदालत में स्थानांतरित हो गई। हालांकि, कई वर्षों तक यह मामला ठंडे बस्ते में रहा। 25 जुलाई 2023 को मऊ की एमपी/एमएलए अदालत ने सुधाकर सिंह को भगोड़ा घोषित कर दिया, यह दावा करते हुए कि उनकी उपस्थिति की कोई संभावना नहीं थी। यह आदेश विवादास्पद रहा, क्योंकि सुधाकर सिंह ने दावा किया कि उन्हें समन या वारंट की कोई जानकारी नहीं थी।

सुधाकर सिंह, जो वर्तमान में घोसी से सपा विधायक हैं, ने इस फरारी आदेश पर सवाल उठाए। उनके वकील वीरेंद्र बहादुर पाल ने अदालत में तर्क दिया कि समन या वारंट तामील नहीं किए गए, और सुधाकर सिंह को कोर्ट के आदेश की जानकारी नहीं थी। उन्होंने फरारी आदेश को निरस्त करने की याचिका दायर की। 4 जून 2024 को, सुधाकर सिंह ने जिला न्यायाधीश के समक्ष एक निगरानी याचिका दायर की, जिसके बाद मामला एमपी/एमएलए अदालत में स्थानांतरित हो गया। सुधाकर सिंह ने कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण कार्यालय में 2000 रुपये का अर्थदंड भी जमा किया। उन्होंने दावा किया कि वे नियमित रूप से अन्य मामलों में कोर्ट में हाजिर हो रहे हैं, और इस मामले में फरार घोषित होना गलत है। उनके बयान में कहा गया, “मेरे खिलाफ और भी दो मुकदमे हैं, जिनमें मैं नियमित रूप से हाजिर होता हूं। फिर मुझे इस मामले में फरार कैसे घोषित किया जा सकता है?” हालांकि, अपर शासकीय अधिवक्ता राजेश पांडे और अजय सिंह ने तर्क दिया कि सुधाकर सिंह को मामले की जानकारी थी, और वे कोर्ट के समन का जवाब देने में विफल रहे। अदालत ने उनकी याचिका पर स्थगन आदेश देने से इनकार कर दिया और अगली सुनवाई के लिए 10 जुलाई 2025 की तारीख तय की।

  • सुधाकर सिंह का राजनीतिक सफर

सुधाकर सिंह घोसी विधानसभा क्षेत्र से 2022 में सपा के टिकट पर विधायक चुने गए। वे एक प्रभावशाली स्थानीय नेता हैं और समाजवादी पार्टी के प्रमुख चेहरों में से एक माने जाते हैं। उनके खिलाफ यह कानूनी कार्रवाई उनके राजनीतिक करियर के लिए एक चुनौती बन सकती है, खासकर तब जब वे अपने क्षेत्र में सक्रिय रूप से जनता के बीच काम कर रहे हैं, इस मामले ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी हलचल मचा दी है। कुछ लोग इसे सपा के खिलाफ राजनीतिक साजिश के रूप में देख रहे हैं, जबकि अन्य का मानना है कि यह कानून का सामान्य प्रक्रिया है। सुधाकर सिंह के समर्थकों का कहना है कि 39 साल पुराने मामले को अब उठाना एक लक्षित कार्रवाई हो सकती है।

इस मामले ने कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। पहला, इतने पुराने मामले में फरारी का आदेश जारी करना कितना उचित है, खासकर तब जब अभियुक्त एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि है और क्षेत्र में सक्रिय है? दूसरा, क्या समन और वारंट की तामील में कोई चूक हुई, जैसा कि सुधाकर सिंह के वकील ने दावा किया है? तीसरा, क्या यह मामला सपा और उत्तर प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के बीच राजनीतिक टकराव का हिस्सा है? मऊ की एमपी/एमएलए अदालत का यह फैसला स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर भी इस मामले ने तूल पकड़ा है, जहां कुछ लोग सुधाकर सिंह के समर्थन में हैं, तो कुछ इसे कानून की जीत मान रहे हैं। एक एक्स पोस्ट में कहा गया, “39 साल पुराने केस में विधायक को भगोड़ा घोषित करना सियासी तूल पकड़ने वाला है।”

उत्तर प्रदेश में एमपी/एमएलए अदालतें सांसदों और विधायकों से संबंधित आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए स्थापित की गई हैं। इनका उद्देश्य जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित मामलों को तेजी से निपटाना है। सुधाकर सिंह का मामला भी इसी विशेष अदालत में स्थानांतरित हुआ, क्योंकि वे एक निर्वाचित विधायक हैं। हालांकि, इस तरह के पुराने मामलों को उठाने से यह सवाल भी उठता है कि क्या इन अदालतों का उपयोग चयनात्मक रूप से हो रहा है। मऊ की एमपी/एमएलए अदालत द्वारा सपा विधायक सुधाकर सिंह को 1986 के एक मामले में भगोड़ा घोषित करना एक महत्वपूर्ण कानूनी और राजनीतिक घटना है। यह मामला, जो चार दशक पुराना है, न केवल सुधाकर सिंह के व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन को प्रभावित कर रहा है, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी नई बहस छेड़ रहा है।

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