सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में अदालतों को युद्ध का मैदान न बनाने की चेतावनी दी, मध्यस्थता अपनाने पर जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालतें पति-पत्नी के झगड़ों का युद्ध का मैदान नहीं हैं। कोर्ट ने
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अदालतें पति-पत्नी के झगड़ों का युद्धक्षेत्र नहीं, मध्यस्थता से सुलझाएं विवाद, 65 दिन साथ रहने वाले दंपति का तलाक मंजूर
- 65 दिन साथ रहे और 10 साल से अलग, 40 से अधिक केस दाखिल करने वाले दंपति का विवाह भंग, सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत फैसला सुनाया
सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालतें पति-पत्नी के झगड़ों का युद्ध का मैदान नहीं हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लगातार लड़ रहे दंपति अदालतों का समय बर्बाद न करें और अपने विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थता का रास्ता अपनाएं। यह टिप्पणी दिल्ली के एक दंपति के मामले में की गई जिसमें पति-पत्नी ने शादी के बाद सिर्फ 65 दिन साथ रहकर पिछले एक दशक से अधिक समय से अलग रह रहे थे। दंपति ने एक-दूसरे के खिलाफ 40 से अधिक केस दाखिल किए थे। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने मामले में अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्ति का प्रयोग करते हुए विवाह को भंग कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अदालत में आरोप-प्रत्यारोप से विवाद और बढ़ता है इसलिए झगड़े का जल्दी समाधान बेहतर रास्ता है। कोर्ट ने दोनों पक्षों पर 10-10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और भविष्य में एक-दूसरे के खिलाफ केस दाखिल करने पर रोक लगा दी। कोर्ट ने माना कि यह शादी के अपूरणीय टूटने का मामला है जहां सुलह की कोई संभावना नहीं बची है। दंपति 2012 में शादी के बाद सिर्फ 65 दिन साथ रहे लेकिन कानूनी लड़ाई में उलझे रहे। कोर्ट ने पूर्व मध्यस्थता प्रयासों का जिक्र किया लेकिन वे सफल नहीं हुए। कोर्ट ने कहा कि पूर्व-मुकदमेबाजी मध्यस्थता से विवाद सुलझाने की कोशिश की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले में कहा कि झगड़ते दंपति अदालतों को अपना युद्धक्षेत्र बनाकर न्याय व्यवस्था को बाधित नहीं कर सकते। कोर्ट ने चिंता जताई कि ऐसे मामलों से अदालतों पर बोझ बढ़ता है। दंपति ने एक-दूसरे के खिलाफ 40 से अधिक मुकदमे दाखिल किए थे जो विभिन्न अदालतों में लंबित थे। पीठ ने अनुच्छेद 142 के तहत विवाह भंग करते हुए सभी लंबित मामलों को बंद करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि आरोप-प्रत्यारोप से विवाद बढ़ता है और मध्यस्थता से जल्द समाधान संभव है। मामले में पत्नी ने अनुच्छेद 142 के तहत आवेदन दिया था। कोर्ट ने पाया कि दंपति एक दशक से अधिक अलग रह रहे हैं और कोई सुलह संभव नहीं। कोर्ट ने दोनों पक्षों को 10-10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया क्योंकि उन्होंने अदालतों का दुरुपयोग किया। कोर्ट ने कहा कि परिवार के सदस्यों और वकीलों को पूर्व मध्यस्थता के लिए प्रयास करना चाहिए। यह फैसला वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता के महत्व को रेखांकित करता है। कोर्ट ने कहा कि अदालतों को युद्ध का मैदान नहीं बनाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के दंपति के मामले में विवाह भंग करते हुए कहा कि अदालतें पति-पत्नी के झगड़ों का मैदान नहीं हैं। दंपति ने शादी के बाद सिर्फ 65 दिन साथ रहकर 10 साल से अधिक अलग रहते हुए 40 से अधिक केस दाखिल किए। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने अनुच्छेद 142 के तहत शादी खत्म की। कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता अपनाकर विवाद सुलझाने चाहिए क्योंकि अदालत में आरोप-प्रत्यारोप विवाद बढ़ाते हैं। कोर्ट ने दोनों पर 10 हजार रुपये जुर्माना लगाया और आगे केस दाखिल करने पर रोक लगाई। कोर्ट ने माना कि शादी अपूरणीय रूप से टूट चुकी है। मामले में मध्यस्थता प्रयास असफल रहे। कोर्ट ने पूर्व-मुकदमेबाजी मध्यस्थता पर जोर दिया। यह फैसला 20 जनवरी 2026 को सुनाया गया। कोर्ट ने न्याय व्यवस्था पर बोझ की चिंता जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालतों को युद्ध का मैदान नहीं बनाया जा सकता। दंपति ने 65 दिन साथ रहने के बाद 10 साल से अलग रहते हुए एक-दूसरे के खिलाफ मुकदमे दाखिल किए। कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत विवाह भंग किया। कोर्ट ने मध्यस्थता का रास्ता अपनाने की सलाह दी। आरोप-प्रत्यारोप से विवाद बढ़ता है। कोर्ट ने दोनों पक्षों पर जुर्माना लगाया। सभी लंबित केस बंद करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि सुलह की कोई उम्मीद नहीं बची। मध्यस्थता से जल्द समाधान संभव। कोर्ट ने अदालतों के समय बर्बाद होने पर चिंता जताई।
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