Ladakh Protest: सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार को दिया एक हफ्ते का अल्टीमेटम, मांगें न मानने पर अनशन की चेतावनी
लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर पर्यावरणविद सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार को एक हफ्ते का समय दिया है।

- Ladakh Protest: सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार को दिया एक हफ्ते का अल्टीमेटम, मांगें न मानने पर अनशन की चेतावनी
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लद्दाख के पर्यावरण, सांस्कृतिक अस्मिता और लोकतांत्रिक अधिकारों के संरक्षण को लेकर चल रहे आंदोलन ने एक बार फिर गति पकड़ ली है। प्रख्यात पर्यावरणविद् और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार को लद्दाख के प्रमुख मुद्दों के समाधान के लिए एक सप्ताह का समय दिया है। वांगचुक ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित अवधि के भीतर गृह मंत्रालय लद्दाख के प्रतिनिधियों के साथ ठोस और सार्थक वार्ता की दिशा में कदम नहीं उठाता है, तो वे क्षेत्र के लोगों के साथ मिलकर अपने आंदोलन को और व्यापक रूप देंगे, जिसमें आमरण अनशन और शांतिपूर्ण सत्याग्रह के चरण शामिल होंगे।
यह घोषणा ऐसे समय में सामने आई है जब लद्दाख के दोनों प्रमुख सामाजिक-राजनीतिक मंच—लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA)—लंबे समय से अपनी चार सूत्रीय मांगों पर अडिग हैं। सोनम वांगचुक के नेतृत्व में आयोजित प्रेस वार्ता और जनसंवाद के दौरान उन्होंने लद्दाख के संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय जनजातीय आबादी के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों की अनिवार्यता दोहराई।
- क्या हैं लद्दाख के प्रतिनिधियों की चार प्रमुख मांगें?
अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। शुरुआत में लेह क्षेत्र में इस फैसले का स्वागत हुआ था, लेकिन समय बीतने के साथ स्थानीय नेतृत्व को यह महसूस हुआ कि बिना निर्वाचित प्रतिनिधियों और नौकरशाही पर नियंत्रण के बिना क्षेत्र की जमीन, रोजगार और पर्यावरण असुरक्षित हो गए हैं। इसके बाद लेह और करगिल ने साझा मंच बनाकर चार बुनियादी मांगें रखीं:
- संविधान की छठी अनुसूची में समावेशन:
लद्दाख की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी जनजातीय है। आंदोलनकारियों का तर्क है कि पूर्वोत्तर के कई राज्यों की तरह लद्दाख को भी संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत छठी अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए, जिससे स्थानीय स्वायत्त जिला परिषदों (ADCs) को भूमि, जंगल और जल संसाधनों के उपयोग पर कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार मिल सके।
- पूर्ण राज्य का दर्जा:
केंद्र शासित प्रदेश में निर्वाचित विधानसभा न होने के कारण नीतियां पूरी तरह उपराज्यपाल और नौकरशाही द्वारा तय की जाती हैं। लद्दाखवासी चाहते हैं कि उन्हें अपनी लोकतांत्रिक सरकार चुनने का अधिकार मिले ताकि विधानसभा के जरिए जनआकांक्षाएं पूरी हो सकें।
- दो लोकसभा और एक राज्यसभा सीट:
वर्तमान में विशाल भूभाग वाले पूरे लद्दाख क्षेत्र में केवल एक लोकसभा सीट है। मांग की जा रही है कि लेह और करगिल दोनों क्षेत्रों के लिए अलग-अलग लोकसभा सीटें और संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व के लिए एक राज्यसभा सीट दी जाए।
- स्थानीय युवाओं के लिए नौकरियों में आरक्षण व लोक सेवा आयोग:
जम्मू-कश्मीर से अलग होने के बाद लद्दाख के लिए स्वतंत्र लोक सेवा आयोग (PSC) का गठन अब तक नहीं हुआ है। मांग है कि लद्दाख के मूल निवासियों के लिए सभी सरकारी भर्तियों में आरक्षण का कानूनी प्रावधान किया जाए।
- गृह मंत्रालय के साथ वार्ताओं का इतिहास और गतिरोध
केंद्र सरकार ने इन मुद्दों पर विचार के लिए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPC) का गठन किया था। इस समिति के साथ लेह एपेक्स बॉडी और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के नेताओं की कई दौर की औपचारिक वार्ताएं नई दिल्ली में आयोजित हुईं।
वार्ता के दौरान केंद्र सरकार ने लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदों (LAHDC) को अधिक वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सौंपने तथा नौकरियों में स्थानीय प्राथमिकता का आश्वासन दिया था। हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची लागू करने की मांग पर कोई ठोस सहमति नहीं बन सकी। मार्च 2024 के बाद से यह औपचारिक संवाद व्यावहारिक रूप से रुका हुआ है। सोनम वांगचुक का कहना है कि संवाद में आ रहे इसी ठहराव को तोड़ने के लिए उन्होंने सरकार को सात दिनों की समय सीमा दी है ताकि प्रशासनिक उदासीनता खत्म हो।
- पर्यावरण और ग्लेशियरों के संकट का गहराता सवाल
सोनम वांगचुक केवल राजनीतिक अधिकारों की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनका मुख्य ध्यान लद्दाख के नाजुक पर्यावरण पर है। तिब्बती पठार और पश्चिमी हिमालय के संगम पर स्थित लद्दाख जलवायु परिवर्तन की मार सबसे पहले झेलने वाले क्षेत्रों में से एक है।
वांगचुक का तर्क है कि यदि लद्दाख की भूमि को अनियंत्रित खनन, बड़े औद्योगिक घरानों और अनियोजित पर्यटन परियोजनाओं के लिए बिना स्थानीय लोगों की सहमति के खोल दिया गया, तो यहां के ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे। इससे न केवल लद्दाख में जल संकट उत्पन्न होगा, बल्कि सिंधु नदी तंत्र पर निर्भर उत्तर भारत के लाखों लोगों के लिए भी गंभीर पर्यावरणीय समस्या पैदा हो जाएगी। छठी अनुसूची जैसे मजबूत संवैधानिक सुरक्षा कवच ही इस संवेदनशील भूभाग को कॉर्पोरेट दोहन से बचा सकते हैं।
एक हफ्ते की इस मियाद के ऐलान के बाद लेह और करगिल में नागरिक समाज संगठनों ने अपनी रणनीतिक तैयारियां तेज कर दी हैं। इससे पहले वांगचुक ने माइनस तापमान में 21 दिनों का जलवायु उपवास (क्लाइमेट फास्ट) रखकर राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया था। इसके बाद लद्दाख से दिल्ली तक 'दिल्ली चलो' पदयात्रा भी निकाली गई थी, जिसे राजधानी की सीमाओं पर पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद व्यापक चर्चा मिली थी।
सोनम वांगचुक ने आह्वान किया है कि केंद्र सरकार इस शांतिपूर्ण आंदोलन को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय लद्दाख के सीमावर्ती नागरिकों की वैध चिंता के रूप में देखे। चीन और पाकिस्तान दोनों की सीमाओं से सटे इस संवेदनशील क्षेत्र में आंतरिक असंतोष देश की सामरिक सुरक्षा के लिहाज से भी किसी के हित में नहीं है। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि गृह मंत्रालय इस एक हफ्ते के भीतर क्या प्रतिक्रिया देता है।
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