Graham Staines Murder Case: ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों की हत्या का मामला, जानें दोषी दारा सिंह और पूरे घटनाक्रम की कहानी
Graham Staines Murder Case: 1999 में ओडिशा में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों की हत्या के दोषी दारा सिंह की उम्रकैद की सजा और पूरा घटनाक्रम।

- Dara Singh Life Imprisonment: 1999 का वो झकझोर देने वाला ओडिशा कांड, जिसके लिए दारा सिंह काट रहा है उम्रकैद की सजा
- Graham Staines Case: 1999 में ओडिशा को दहला देने वाला ग्राहम स्टेन्स हत्याकांड, जानें दोषी दारा सिंह की सजा और पूरा मामला
- ग्राहम स्टेन्स और उनके दो मासूम बेटों की हत्या का मामला: दोषी दारा सिंह काट रहा है उम्रकैद की सजा
वर्ष 1999 में ओडिशा के मयूरभंज जिले में घटे देश के सबसे चर्चित और दर्दनाक अपराध मामलों में से एक, ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो मासूम बेटों की जिंदा जलाकर हत्या किए जाने की घटना में मुख्य दोषी रवींद्र कुमार पाल उर्फ दारा सिंह उम्रकैद की सजा काट रहा है। जनवरी 1999 में हुई इस वीभत्स घटना ने पूरे देश और दुनिया को स्तब्ध कर दिया था। इस मामले की गहन जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा की गई थी, जिसके बाद अदालती प्रक्रिया के तहत दारा सिंह और उसके साथियों को दोषी ठहराया गया था। निचली अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को बाद में उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट ने आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया था। वर्तमान में दारा सिंह कानून के तहत निर्धारित अपनी जेल की सजा भुगत रहा है।
जनवरी 1999 की कड़ाके की ठंड में ओडिशा के मयूरभंज जिले के मनोहरपुर गांव में एक ऐसी घटना घटी जिसने भारतीय आपराधिक और न्यायिक इतिहास में गहरा असर छोड़ा। ऑस्ट्रेलियाई समाज सेवी और मिशनरी ग्राहम स्टुअर्ट स्टेन्स अपने दो मासूम बेटों, फिलिप (10 वर्ष) और टिमोथी (6 वर्ष) के साथ अपनी स्टेशन वैगन गाड़ी में सो रहे थे।
इसी दौरान दारा सिंह के नेतृत्व में आई एक उग्र भीड़ ने उस गाड़ी को घेर लिया और बाहर से बंद करके आग के हवाले कर दिया। इस दुखद हादसे में ग्राहम स्टेन्स और उनके दोनों बेटों की मौके पर ही झुलसकर मौत हो गई। इस जघन्य अपराध ने न केवल ओडिशा बल्कि पूरे देश में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।
ग्राहम स्टेन्स वर्ष 1965 से भारत में रहकर कुष्ठ रोगियों की सेवा और समाज सेवा के कार्यों में लगे हुए थे। वे मयूरभंज क्षेत्र में कुष्ठ रोगियों के पुनर्वास के लिए एक अस्पताल चलाते थे। 22-23 जनवरी 1999 की मध्य रात्रि को वे एक वार्षिक शिविर में हिस्सा लेने मनोहरपुर गांव पहुंचे थे, जहां रात में वे अपनी गाड़ी में ही विश्राम कर रहे थे।
आरोप लगे थे कि दारा सिंह और उसके सहयोगियों ने धर्मांतरण के संदेह के आधार पर उस स्थान पर धावा बोला। भीड़ ने वाहन को घेरकर पेट्रोल डाला और आग लगा दी। जब पीड़ितों ने बाहर निकलने की कोशिश की, तो उन्हें कथित तौर पर बाहर निकलने से रोका गया। घटना के बाद पूरे क्षेत्र में भारी तनाव फैल गया।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने तत्परता से कार्रवाई करते हुए दारा सिंह सहित कई आरोपियों को गिरफ्तार किया। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद सितंबर 2003 में सीबीआई की विशेष अदालत ने दारा सिंह को मृत्युदंड की सजा सुनाई, जबकि अन्य 12 सहयोगियों को उम्रकैद की सजा दी गई।
इस मामले में सबसे अभूतपूर्व और मानवीय प्रतिक्रिया ग्राहम स्टेन्स की पत्नी ग्लेडिस स्टेन्स की ओर से आई। उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि वे अपने पति और बच्चों के हत्यारों को क्षमा करती हैं और उनका हृदय किसी के प्रति घृणा से नहीं भरा है। उन्होंने भारत में रहकर कुष्ठ रोगियों की सेवा का कार्य जारी रखा, जिसके लिए बाद में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया।
कानूनी मोर्चे पर यह मामला ओडिशा उच्च न्यायालय पहुंचा। मई 2005 में उड़ीसा हाई कोर्ट ने दारा सिंह की मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास (उम्रकैद) में बदल दिया, जबकि सबूतों के अभाव में कुछ अन्य सह-आरोपियों को बरी कर दिया। इसके बाद यह मामला भारत के उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) पहुंचा। जनवरी 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए दारा सिंह और उसके एक अन्य सहयोगी महेंद्र हेम्ब्रम की उम्रकैद की सजा की पुष्टि की।
इस जघन्य हत्याकांड का भारतीय समाज, राजनीति और न्यायिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा। घटना के बाद भारत में धार्मिक सहिष्णुता, अंतर-धार्मिक संबंधों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर देशव्यापी बहस शुरू हो गई। संसद से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक इस घटना की निंदा की गई।
न्यायिक दृष्टिकोण से, इस मामले ने भारत की जांच एजेंसियों की दक्षता और निष्पक्ष न्याय प्रणाली को साबित किया। सीबीआई द्वारा प्रस्तुत किए गए फॉरेंसिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने एक बड़े आपराधिक मामले में तार्किक परिणति तक पहुंचकर दोषियों को सजा दी।
सुप्रीम कोर्ट से सजा की पुष्टि होने के बाद दोषी दारा सिंह ओडिशा की जेल में अपनी उम्रकैद की सजा काट रहा है। समय-समय पर उसकी ओर से समय पूर्व रिहाई या पैरोल के लिए याचिकाएं दायर की जाती रही हैं, परंतु अदालत और प्रशासनिक प्राधिकरण अपराध की गंभीरता और संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर ही कोई भी कानूनी निर्णय लेते हैं।
यह मामला आज भी भारतीय न्याय व्यवस्था में एक मिसाल के रूप में देखा जाता है कि कैसे घृणा और हिंसा के कारण किए गए अपराध का अंत केवल और केवल सख्त कानूनी सजा के रूप में होता है, जबकि पीड़िता द्वारा दिखाई गई क्षमा की भावना ने मानवीय संवेदनाओं का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया।
What's Your Reaction?





