Kurukshetra Pehowa News: कुरुक्षेत्र में बेसहारा भाई की मौत पर बहन ने अंतिम संस्कार और अस्थियां लेने से किया इनकार, संस्था ने दी मुखाग्नि

हरियाणा के कुरुक्षेत्र (पिहोवा) में बेसहारा भाई की मौत के बाद सगी बहन ने अंतिम संस्कार और अस्थियां लेने से हाथ जोड़कर मना कर दिया। संस्था ने पूरी की अंतिम रस्में।

Sep 10, 2026 - 13:50
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Kurukshetra Pehowa News: कुरुक्षेत्र में बेसहारा भाई की मौत पर बहन ने अंतिम संस्कार और अस्थियां लेने से किया इनकार, संस्था ने दी मुखाग्नि
  • पिहोवा में मानवीय रिश्तों को झकझोरने वाला वाकया: अस्पताल में भाई के शव को लेने नहीं आई बहन, सेवा संस्था ने निभाई अंतिम रस्म
  • 'आप ही कर दो अंतिम संस्कार'... कुरुक्षेत्र में भाई के निधन पर बहन ने फेरा मुंह, समाज सेवी संस्था बनी सहारा
  • कुरुक्षेत्र के पिहोवा में बेसहारा युवक की मौत, सगी बहन ने अंतिम संस्कार से किया इनकार, संस्था ने किया दाह संस्कार

हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के उपमंडल पिहोवा से मानवीय रिश्तों और पारिवारिक संवेदनाओं को स्तब्ध कर देने वाला एक अत्यंत भावुक मामला सामने आया है। सड़क किनारे व खुले स्थानों पर बेसहारा जिंदगी गुजार रहे एक गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति की उपचार के दौरान अस्पताल में मृत्यु हो गई। स्थानीय सामाजिक संस्था और पुलिस प्रशासन ने जब कागजातों व छानबीन के आधार पर मृतक की सगी और इकलौती बहन से संपर्क साधा, तो उसने भाई का शव लेने और अंतिम संस्कार करने से सीधे तौर पर इनकार कर दिया। बहन ने हाथ जोड़ते हुए साफ शब्दों में कह दिया कि उसका अब मृतक से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए वे ही उसका अंतिम संस्कार कर दें और वह उसकी अस्थियां भी नहीं लेगी। इसके बाद सामाजिक संस्था के पदाधिकारियों ने आगे आकर धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार मृतक का दाह संस्कार संपन्न कराया।

  • पिहोवा के सरकारी अस्पताल में तोड़ा दम, बीमारी के चलते हुआ था दाखिल

स्थानीय स्तर पर प्राप्त जानकारी के अनुसार, मृतक लंबे समय से पिहोवा कस्बे और आसपास के इलाकों में बेसहारा अवस्था में घूमता रहता था। उसके पास न तो रहने के लिए कोई पक्का ठिकाना था और न ही कोई नियमित सहारा। कुछ दिनों पहले उसकी शारीरिक स्थिति बेहद नाजुक हो गई थी और वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गया था। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जब उसकी गंभीर हालत देखी, तो तुरंत पहल करते हुए उसे पिहोवा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सरकारी अस्पताल) में भर्ती कराया।

अस्पताल में चिकित्सकों ने उसका प्राथमिक उपचार शुरू किया, लेकिन संक्रमण और कमजोरी अत्यधिक बढ़ जाने के कारण उसकी हालत में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका। लगातार निगरानी के बावजूद उपचार के दौरान उसने दम तोड़ दिया। अस्पताल प्रशासन ने कानूनी प्रक्रिया के तहत स्थानीय पुलिस को मामले की जानकारी दी, जिसके बाद लावारिस स्थिति को देखते हुए शव को मोर्चरी में सुरक्षित रखवाया गया ताकि उसके परिजनों की शिनाख्त की जा सके।

  • दस्तावेजों से हुई पहचान, इकलौती बहन तक पहुंची सामाजिक संस्था

युवक की मौत के बाद उसकी पहचान सुनिश्चित करना पुलिस और अस्पताल प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती थी। मृतक के पास से मिले कुछ कागजात, पुराने पहचान पत्र और स्थानीय संपर्कों की पड़ताल के बाद आखिरकार उसकी वास्तविक पहचान स्थापित हो सकी। जांच में यह तथ्य सामने आया कि उसका परिवार बहुत बड़ा नहीं है और उसकी केवल एक सगी बहन है, जो शादीशुदा है और अपने ससुराल में रहती है।

पहचान स्पष्ट होते ही मामले में सहयोग कर रही स्थानीय सेवाभावी संस्था के सदस्यों ने पुलिस के साथ मिलकर उसकी बहन से संपर्क किया। संस्था के प्रतिनिधियों ने उसे उसके भाई की बीमारी, अस्पताल में भर्ती होने और अंततः मृत्यु होने की पूरी जानकारी दी। दल ने उम्मीद जताई थी कि खून का रिश्ता होने के नाते परिजन अस्पताल पहुंचकर शव को अपने कब्जे में लेंगे और सम्मानपूर्वक उसका अंतिम संस्कार करेंगे।

  • 'आप ही कर दो अंतिम संस्कार, मुझे अस्थियां भी नहीं चाहिए'

जब सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बहन से अस्पताल आकर अपने भाई का पार्थिव शरीर लेने का अनुरोध किया, तो उसका जो रुख सामने आया उसने वहां मौजूद सभी लोगों को हैरान कर दिया। बहन ने अस्पताल आने या शव पर दावा करने से साफ मना कर दिया। उसने हाथ जोड़ते हुए कहा कि उसका अपने भाई के साथ वर्षों से कोई वास्ता नहीं रहा है और पारिवारिक कारणों तथा उसके पिछले आचरण के चलते उनके बीच दूरियां आ चुकी थीं।

संस्था के सदस्यों ने उसे समझाने का प्रयास किया कि कम से कम अंतिम विदाई और मुखाग्नि के समय परिवार के सदस्य का मौजूद रहना जरूरी होता है, लेकिन उसने अपनी असमर्थता और अनिच्छा व्यक्त कर दी। बहन ने स्पष्ट कहा, "आप ही उसका अंतिम संस्कार कर दीजिए। मुझे उसकी अस्थियां भी नहीं लेनी हैं।" इस दो-टूक जवाब के बाद प्रशासन और संस्था के सामने यह स्पष्ट हो गया कि परिवार की ओर से कोई भी व्यक्ति मृतक की अंतिम यात्रा में शामिल होने नहीं आएगा।

  • सामाजिक संस्था ने संभाली कमान, विधि-विधान से दी गई मुखाग्नि

बहन के साफ इनकार के बाद कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करने की प्रक्रिया शुरू की गई। पुलिस ने पंचनामा तैयार किया और परिजनों के लिखित अथवा मौखिक बयान के आधार पर शव को सामाजिक संस्था को सौंपने की प्रक्रिया पूरी की। पिहोवा में लंबे समय से लावारिस और बेसहारा शवों का अंतिम संस्कार करने वाली सामाजिक संस्था के कार्यकर्ताओं ने पूरे आदर और मानवीय गरिमा के साथ जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली।

संस्था के सदस्यों ने शव को अस्पताल से मोर्चरी वाहन के जरिए स्थानीय श्मशान घाट पहुंचाया। वहां हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार कफन, सामग्री और अन्य धार्मिक विधियों की व्यवस्था की गई। संस्था के पदाधिकारियों ने मृतक को नहलाकर नई चादर ओढ़ाई और मंत्रोच्चार के बीच मुखाग्नि देकर उसका अंतिम संस्कार संपन्न कराया। संस्था के प्रतिनिधियों का कहना था कि भले ही परिवार ने उससे मुंह मोड़ लिया हो, लेकिन एक इंसान के रूप में उसका यह अधिकार बनता था कि उसे सम्मानपूर्वक विदाई मिले।

  • पारिवारिक बिखराव और बेसहारा जीवन की त्रासदी

यह घटना समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है जहां कई बार घरेलू कलह, नशा, आर्थिक तंगी या व्यक्तिगत मतभेद पारिवारिक ताने-बाने को इस हद तक तोड़ देते हैं कि खून के रिश्ते भी पूरी तरह बेअसर हो जाते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, मृतक पिछले काफी समय से भटक रहा था और उसने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा सड़कों, धर्मशालाओं और सार्वजनिक स्थानों पर ही बिताया था।

कई बार ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति का अपने घर-परिवार से संपर्क पूरी तरह कट जाता है। जब तक वह जीवित रहता है, परिवार उसकी सुध नहीं लेता और मौत के बाद भी वही दूरी कायम रहती है। पिहोवा का यह मामला इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि किस तरह सामाजिक और पारिवारिक उपेक्षा किसी इंसान को जीते जी ही नहीं, बल्कि मरने के बाद भी लावारिस बना देती है।

  • श्मशान घाट में संस्था करेगी अस्थि विसर्जन की व्यवस्था

हिंदू मान्यताओं के अनुसार दाह संस्कार के तीसरे दिन अस्थियां संचित की जाती हैं और उन्हें पवित्र नदियों या तीर्थों में विसर्जित किया जाता है। पिहोवा स्वयं सरस्वती नदी के पावन तट पर स्थित एक ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल है, जिसे हिंदू परंपरा में 'पिंडदान' और पितरों की मुक्ति के लिए हरिद्वार और गया के समान ही पवित्र माना जाता है।

चूंकि बहन ने अस्थियां लेने से भी पूरी तरह मना कर दिया है, इसलिए संस्था ने निर्णय लिया है कि उसके फूल (अस्थियां) भी संस्था के कार्यकर्ता ही एकत्र करेंगे। संस्था के पदाधिकारियों ने बताया कि तीसरे दिन श्मशान घाट से अस्थियां एकत्र कर पिहोवा के पावन सरस्वती तीर्थ के तट पर पूरे विधि-विधान और पिंडदान की रस्म के साथ जल में प्रवाहित की जाएंगी, ताकि मृतक की आत्मा को शांति मिल सके। संस्था ने स्थानीय नागरिकों से भी अपील की है कि समाज में ऐसे उपेक्षित और बीमार लोगों की समय रहते मदद की जानी चाहिए ताकि किसी को इस तरह की लाचारगी का सामना न करना पड़े।

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