Bageshwar Dham: धीरेंद्र शास्त्री का पटाखों पर तीखा प्रहार, 'दूसरे धर्म वाले ज्ञान न दें, हम दिवाली पर पटाखे फोड़ेंगे'।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित बागेश्वर धाम के प्रमुख संत पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने दिवाली के अवसर पर पटाखों को लेकर एक विवादास्पद बयान दिया है। उन्होंने कहा कि दूसरे
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित बागेश्वर धाम के प्रमुख संत पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने दिवाली के अवसर पर पटाखों को लेकर एक विवादास्पद बयान दिया है। उन्होंने कहा कि दूसरे धर्म के लोग हिंदू त्योहारों पर पटाखों के उपयोग को लेकर ज्ञान न दें, क्योंकि हम उनके त्योहारों पर सवाल नहीं उठाते। शास्त्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'होली-दिवाली पर ज्ञान दिया जाता है, लेकिन बकरीद पर कुर्बानी या ताजिया पर कोई सवाल क्यों नहीं उठता? हम तो पटाखे फोड़ेंगे।' यह बयान 11 अक्टूबर 2025 को छतरपुर में एक धार्मिक सभा के दौरान दिया गया, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। लाखों लोगों ने इसे देखा और साझा किया, जिससे राजनीतिक और सामाजिक बहस छिड़ गई। शास्त्री का यह कथन दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और तमिलनाडु जैसे राज्यों में लगे पटाखा प्रतिबंध पर केंद्रित है, जहां प्रदूषण के नाम पर दिवाली पर सख्ती की जा रही है। उन्होंने इसे हिंदू संस्कृति पर हमला बताया और कहा कि नई साल पर पटाखे फोड़ने पर कोई रोक नहीं लगती। यह बयान न केवल धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाला है, बल्कि पर्यावरण बनाम परंपरा की बहस को नई ऊंचाई दे रहा है।
धीरेंद्र शास्त्री, जिन्हें बागेश्वर धाम सरकार या बाबा बागेश्वर के नाम से जाना जाता है, एक युवा संत हैं जो पिछले कुछ वर्षों में लाखों अनुयायियों के बीच लोकप्रिय हो चुके हैं। उनका जन्म 4 जुलाई 1996 को मध्य प्रदेश के गड़ा गांव में हुआ था। वे एक ब्राह्मण परिवार से हैं और बचपन से ही धार्मिक प्रवचनों में रुचि रखते थे। 2017 में वे बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर बने, जहां वे दिव्य दर्शन और राम कथा के नाम से प्रसिद्ध सभाएं आयोजित करते हैं। उनकी सभाओं में लाखों लोग आते हैं, और वे अक्सर सामाजिक मुद्दों पर बेबाकी से बोलते हैं। शास्त्री ने पहले भी लव जिहाद, धर्मांतरण और हिंदू एकता जैसे विषयों पर विवादास्पद टिप्पणियां की हैं, जिससे वे सुर्खियों में रहते हैं। इस बार उनका बयान दिवाली के संदर्भ में आया, जब देशभर में प्रदूषण नियंत्रण के लिए पटाखों पर पाबंदी लगाई गई है। सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत दिल्ली-एनसीआर में केवल हरे पटाखे ही अनुमत हैं, जो 2 घंटे तक ही फोड़े जा सकते हैं। शास्त्री ने कहा कि यह साजिश है, क्योंकि हिंदू त्योहारों पर ही ऐसी सख्ती होती है। उन्होंने न्यू ईयर पर वैश्विक पटाखेबाजी का उदाहरण देते हुए कहा कि तब प्रदूषण पर कोई चर्चा क्यों नहीं होती?
बयान के दौरान शास्त्री एक सभा को संबोधित कर रहे थे, जहां हजारों भक्त मौजूद थे। वीडियो में वे जोशीले अंदाज में बोलते नजर आते हैं। उन्होंने कहा, 'जब होली आती है तो पानी की बर्बादी का ज्ञान दिया जाता है। दिवाली पर प्रदूषण का। लेकिन बकरीद पर कुर्बानी से निकलने वाले कचरे या ताजिया के जुलूस पर कोई बोलता क्यों नहीं? अगर दूसरे धर्म के लोग हमें सलाह देते हैं, तो हम उनके रीति-रिवाजों पर क्यों चुप रहें?' शास्त्री ने यह भी जोड़ा कि दिवाली रोशनी का त्योहार है, लेकिन पटाखे हमारी परंपरा का हिस्सा हैं। वे राम जन्म की खुशी में फोड़े जाते हैं। इस बयान पर तुरंत प्रतिक्रियाएं आने लगीं। बरेली के मौलाना तौकीर रजा खान ने पलटवार किया और कहा कि दिवाली रोशनी का त्योहार है, न कि धमाकों का। पटाखों से खुशी का इजहार प्रदूषण फैलाकर नहीं होता। मौलाना ने कहा कि अगर पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध न लगे, तो सीमा तय होनी चाहिए। जान-माल की हानि रोकना जरूरी है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी पटाखा प्रतिबंध का समर्थन किया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करें। प्रदूषण से लाखों लोग प्रभावित होते हैं।
यह बयान सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर DhirendraShastri और DiwaliFirecrackers जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। बीजेपी समर्थक इसे हिंदू अस्मिता की आवाज बता रहे हैं, जबकि विपक्षी दल इसे ध्रुवीकरण का हथकंडा कह रहे हैं। एक यूजर ने लिखा कि शास्त्री ने सच्चाई कह दी, दूसरे धर्मों पर सवाल क्यों नहीं? दूसरे ने कहा कि पर्यावरण सबका है, धर्म से ऊपर। वीडियो को एबीपी न्यूज, इंडिया टीवी और आज तक जैसे चैनलों ने प्रमुखता से दिखाया। शास्त्री के अनुयायी कहते हैं कि वे हिंदू संस्कृति की रक्षा कर रहे हैं। लेकिन आलोचक पूछते हैं कि पटाखे वास्तव में हिंदू परंपरा का हिस्सा हैं या नहीं? इतिहासकारों के अनुसार, पटाखे 19वीं सदी में चीन से भारत आए, और दिवाली पर उनका उपयोग ब्रिटिश काल से प्रचलित हुआ। स्कंद पुराण में उल्का (आग के गोले) का जिक्र है, लेकिन आधुनिक पटाखों का नहीं। फिर भी, आज यह परंपरा बन चुकी है। सिवाकासी (तमिलनाडु) में पटाखा उद्योग 3,000 करोड़ का है, जो 2.5 लाख लोगों को रोजगार देता है। प्रतिबंध से इनकी आजीविका प्रभावित होती है।
धीरेंद्र शास्त्री का यह बयान उनकी पिछली टिप्पणियों का विस्तार लगता है। 2023 में उन्होंने रामदेव बाबा के समर्थन में कहा था कि दूसरे धर्मों पर सवाल उठाने का प्रश्न ही नहीं। हाल ही में उन्होंने पश्चिम बंगाल में कथा की अनुमति न मिलने पर ममता बनर्जी पर निशाना साधा था। कहा था कि जब तक दीदी सत्ता में हैं, बंगाल नहीं जाऊंगा। शास्त्री अक्सर कहते हैं कि सनातन धर्म अनादि है, और दूसरे धर्मों की जड़ें भी उसी में हैं। लेकिन उनके बयान विवाद खड़े करते हैं। इस बार भी, मौलाना तौकीर की प्रतिक्रिया ने बहस को धार्मिक रंग दे दिया। मौलाना ने कहा कि कुर्बानी धार्मिक दान है, जबकि पटाखे धमाके मात्र। अगर खुशी से प्रदूषण फैलता है, तो वह सच्ची खुशी नहीं। यह टकराव समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा सकता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि त्योहारों पर पर्यावरण नियम लागू करने से पहले जागरूकता जरूरी है। हरे पटाखे विकल्प हैं, जो कम प्रदूषण फैलाते हैं। लेकिन शास्त्री जैसे संतों के प्रभाव से लोग नियम तोड़ सकते हैं।
दिवाली 2025 का संदर्भ विशेष है। यह राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के बाद पहली बड़ी दिवाली है। अयोध्या में 28 लाख दीये जलेंगे, और सरयू घाट पर भव्य दीपोत्सव होगा। शास्त्री ने इसे राम भक्तों के लिए ऐतिहासिक दिन बताया। लेकिन प्रदूषण चिंता का विषय है। दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स अक्सर खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है। पटाखों से धूल कण बढ़ते हैं, जो सांस की बीमारियां फैलाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 से ही दिशानिर्देश दिए हैं। फिर भी, हर साल बहस होती है। शास्त्री ने कहा कि दीये का तेल गरीबों को बांटने का सुझाव भी गलत है। यह त्योहार है, दान अलग। उनके समर्थक कहते हैं कि वे हिंदुओं की आवाज उठा रहे हैं। विपक्ष कहता है कि यह वोट बैंक की राजनीति है। बीजेपी ने चुप्पी साधी है, जबकि कांग्रेस ने कहा कि पर्यावरण से ऊपर कोई धर्म नहीं।
यह बयान समाज को सोचने पर मजबूर करता है। क्या परंपरा को बचाना प्रदूषण को नजरअंदाज करने का बहाना है? या सख्ती हिंदू संस्कृति पर हमला? शास्त्री के अनुयायी बढ़ रहे हैं, खासकर युवाओं में। उनकी सभाएं डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाइव आती हैं। लेकिन विवाद से उनकी छवि प्रभावित हो सकती है। मौलाना तौकीर ने अपील की कि सीमा तय हो, ताकि कोई आहत न हो। केजरीवाल ने कहा कि कानून सबके लिए बराबर। यह बहस जारी रहेगी। दिवाली नजदीक आ रही है, और लोग तय कर रहे हैं कि कैसे मनाएं। शास्त्री का संदेश साफ है- हम अपनी परंपरा निभाएंगे। लेकिन पर्यावरणविद् चेतावनी देते हैं कि अगर सतर्क न हुए, तो आने वाली पीढ़ियां त्योहारों का मजा नहीं ले पाएंगी। सरकार को संतुलन बनाना होगा। हरे पटाखों को बढ़ावा दें, और जागरूकता अभियान चलाएं। शास्त्री जैसे धार्मिक नेताओं को भी पर्यावरण का संदेश देना चाहिए। आखिर, सनातन धर्म प्रकृति पूजा का धर्म है।
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