बहुत ज्यादा मानसिक तनाव झेल रही अपने बच्चे की हत्या के लिए सजा काटने वाली महिला को कर्नाटक HC ने किया बरी

मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक प्रताड़ना के गंभीर प्रभाव को स्वीकार करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में उच्च

Jun 13, 2026 - 10:48
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बहुत ज्यादा मानसिक तनाव झेल रही अपने बच्चे की हत्या के लिए सजा काटने वाली महिला को कर्नाटक HC ने किया बरी
बहुत ज्यादा मानसिक तनाव झेल रही अपने बच्चे की हत्या के लिए सजा काटने वाली महिला को कर्नाटक HC ने किया बरी
  • गंभीर मानसिक तनाव और प्रताड़ना का मामला: बच्चे की जान लेने के आरोप में सजा काट रही महिला को उच्च न्यायालय ने किया बरी
  • अदालत का ऐतिहासिक फैसला: आत्महत्या के प्रयास और अत्यधिक मानसिक अवसाद के साक्ष्यों के आधार पर मां को मिली बड़ी राहत

मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक प्रताड़ना के गंभीर प्रभाव को स्वीकार करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में उच्च न्यायालय ने अपनी ही पंद्रह महीने की मासूम संतान की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रही एक महिला को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया है। अदालत ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान महिला की अत्यधिक विकृत और तनावपूर्ण मानसिक स्थिति को गहराई से समझा। कानूनी प्रावधानों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद यह माना गया कि जब यह दुखद घटना घटित हुई थी, उस समय संबंधित महिला बेहद गंभीर मानसिक तनाव, गहरे अवसाद और असहनीय पीड़ा के दौर से गुजर रही थी। निचली अदालत द्वारा पूर्व में सुनाए गए आजीवन कारावास के फैसले को पलटते हुए उच्च न्यायालय ने महिला की तुरंत रिहाई के आदेश जारी किए हैं, जिससे इस लंबे समय से चल रहे कानूनी और सामाजिक विवाद पर एक नया कानूनी दृष्टिकोण सामने आया है।

यह बेहद जटिल और दर्दनाक मामला साल दो हजार सोलह का है, जब एक मां ने अपनी ही छोटी संतान का गला घोंटकर उसकी जान ले ली थी। इस घटना के तुरंत बाद महिला ने खुद भी भारी मात्रा में पेरासिटामोल की गोलियां खाकर और अपने हाथों की कलाइयों व कोहनी पर धारदार हथियार से गहरे घाव करके अपनी जीवनलीला समाप्त करने का आत्मघाती प्रयास किया था। घटना के समय महिला अत्यधिक अचेत और गंभीर रूप से घायल अवस्था में पाई गई थी, जिसके बाद उसे तत्काल चिकित्सीय उपचार दिया गया था। साल दो हजार तेईस में इस मामले की सुनवाई करते हुए सत्र न्यायालय ने महिला को अपनी संतान की हत्या का दोषी माना था और उसे भारतीय दंड संहिता के तहत उम्रकैद की सख्त सजा सुनाई थी। इसी फैसले के खिलाफ पीड़ित महिला ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी, जिसमें उसकी मानसिक स्थिति और उसके साथ हुई घरेलू क्रूरता को मुख्य आधार बनाया गया था।

उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष इस मामले की गहन अपीलीय सुनवाई के दौरान महिला की तरफ से उनके वकीलों ने कई महत्वपूर्ण और झकझोर देने वाले तथ्य पेश किए। अदालत के समक्ष यह दलील दी गई कि विवाह के बाद से ही महिला को उसके पति और ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों द्वारा लगातार शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था। महिला पर न केवल अतिरिक्त दहेज लाने का लगातार अनुचित दबाव बनाया जा रहा था, बल्कि उसके चरित्र पर भी गंभीर लांछन लगाए जा रहे थे। ससुराल वालों द्वारा मासूम बच्चे की पितृत्व स्थिति पर सवाल उठाए जा रहे थे, जिसने एक मां के आत्मसम्मान और मानसिक संतुलन को पूरी तरह से छिन्न-भिन्न कर दिया था। इस लगातार जारी रहने वाले घरेलू उत्पीड़न और क्रूरता के संचयी प्रभाव के कारण महिला अत्यंत गहरे मानसिक आघात और अवसाद की स्थिति में पहुंच गई थी, जिसके चलते उसने अंततः इतना खौफनाक कदम उठाने का प्रयास किया।

विशेष नोट: इस मामले की कानूनी बारीकियों को स्पष्ट करते हुए उच्च न्यायालय ने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, दो हजार सत्रह की धारा एक सौ पंद्रह के प्रावधानों का विशेष रूप से उल्लेख किया। इस कानून के तहत यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करता है, तो कानूनन यह माना जाएगा कि वह गंभीर मानसिक तनाव की स्थिति से गुजर रहा था, और ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति पर मुकदमा चलाकर उसे दंडित नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान यह तकनीकी बिंदु भी सामने आया कि अभियोजन पक्ष ने शुरुआत में महिला के खिलाफ आत्महत्या के प्रयास से जुड़ी धारा के तहत भी मामला दर्ज किया था, लेकिन बाद में निचली अदालत में इस आरोप को साबित करने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किए गए। सत्र न्यायालय ने महिला को इस आधार पर आत्महत्या के प्रयास के आरोप से बरी कर दिया था कि उसकी कलाइयों पर आए घाव इतने गहरे नहीं थे कि उनसे सामान्य रूप से मृत्यु हो सके। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के इस तर्क और दृष्टिकोण को पूरी तरह से कानून विरुद्ध और खारिज करने योग्य माना। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के प्रयास के मामले में कानून का ध्यान इस बात पर होता है कि व्यक्ति ने आत्मघाती कदम उठाने का प्रयास किया अथवा नहीं, न कि इस बात पर कि उसके द्वारा खुद को पहुंचाई गई चोटें अंततः कितनी घातक या जानलेवा साबित हुईं।

उच्च न्यायालय ने अपने विस्तृत फैसले में इस बात को पूरी तरह स्पष्ट किया कि भले ही मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम साल दो हजार अटठारह में प्रभावी रूप से लागू हुआ था, लेकिन इस मामले का मुकदमा साल दो हजार इक्कीस में शुरू हुआ था। पूर्व के न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार इस मानवीय कानून का प्रभाव पूर्वव्यापी माना जाता है, इसलिए निचली अदालत को मुकदमा चलाते समय इस कानून के कल्याणकारी और सुरक्षात्मक प्रावधानों को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखना चाहिए था। अदालत ने यह माना कि जब महिला ने भारी मात्रा में गोलियों का सेवन किया और अपनी कलाइयां काट लीं, तो वह पूरी तरह से होश खो चुकी थी और उसे अपने आसपास की परिस्थितियों या अपनी संतान के साथ होने वाली किसी भी घटना का जरा भी संज्ञान नहीं था। ऐसे में उसे एक सामान्य अपराधी की तरह जानबूझकर की गई हत्या का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अभियोजन पक्ष की ओर से यह दलील भी दी गई थी कि चूंकि महिला को आत्महत्या के प्रयास के आरोप से तकनीकी रूप से बरी किया जा चुका है, इसलिए उसे मानसिक स्वास्थ्य कानून के तहत मिलने वाले तनाव के वैधानिक लाभ का हकदार नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि, उच्च न्यायालय ने अभियोजन की इस दलील को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा कि निचली अदालत द्वारा महिला को बरी किया जाना किसी सकारात्मक जांच पर आधारित नहीं था, बल्कि वह सरकारी वकील द्वारा दी गई रियायत और एक गलत कानूनी समझ का परिणाम था। अदालत ने माना कि घटना के समय महिला के पास से बरामद हुआ सुसाइड नोट, दवाओं का अत्यधिक सेवन और उसके शरीर पर मौजूद चोटों के निशान स्वतः ही इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि वह अत्यधिक और असहनीय मानसिक दबाव का सामना कर रही थी।

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