बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला- केवल बेरोजगार होने का बहाना बनाकर बच्चों को गुजारा-भत्ता देने की जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता पिता

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पारिवारिक विवादों और बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला

Jun 13, 2026 - 11:31
 0  1
बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला- केवल बेरोजगार होने का बहाना बनाकर बच्चों को गुजारा-भत्ता देने की जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता पिता
बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला- केवल बेरोजगार होने का बहाना बनाकर बच्चों को गुजारा-भत्ता देने की जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता पिता
  • कानूनी और सामाजिक दायित्व सर्वोपरि- अदालत ने कहा कि बच्चों के भरण-पोषण और भविष्य को किसी भी स्थिति में अधर में नहीं छोड़ा जा सकता
  • निचली अदालत का आदेश बरकरार- अमरावती संभाग के याचिकाकर्ता की दलीलें खारिज, हर महीने दोनों बच्चों को देने होंगे आठ हजार रुपये

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पारिवारिक विवादों और बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया है। अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि कोई भी सक्षम पिता केवल अपनी बेरोजगारी या वित्तीय लाचारी का हवाला देकर अपने मासूम बच्चों के प्रति अपनी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकता है। उच्च न्यायालय ने यह साफ कर दिया कि संतान का पालन-पोषण करना और उन्हें जीवन यापन के लिए जरूरी वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना एक पिता का व्यक्तिगत और विधिक दायित्व है, जिसे किसी भी बहानेबाजी के आधार पर टाला नहीं जा सकता। न्यायालय का यह कड़ा रुख उन मामलों में एक नजीर बनेगा जहां वैवाहिक विवादों के बाद पुरुष अक्सर अपनी आय को छुपाने या खुद को बेरोजगार घोषित करके बच्चों को आर्थिक सहायता देने से कतराते हैं।

यह पूरा मामला महाराष्ट्र के अमरावती संभाग के अंतर्गत आने वाले बुलढाणा जिले से जुड़ा हुआ है। यहां के रहने वाले एक व्यक्ति ने बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ के समक्ष एक पुनर्विचार याचिका दायर की थी। इस याचिका के माध्यम से उसने अमरावती की एक स्थानीय निचली अदालत द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी नाबालिग संतान के भरण-पोषण के लिए हर महीने एक निश्चित धनराशि का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि निचली अदालत ने उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति का सही तरीके से मूल्यांकन किए बिना ही यह आर्थिक बोझ उस पर लाद दिया है, जिसे वहन कर पाना उसके वर्तमान हालातों में पूरी तरह से नामुमकिन है।

निचली अदालत ने मामले की गंभीरता और बच्चों की बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पिता को हर महीने कुल आठ हजार रुपये की राशि गुजारे-भत्ते (मेंटेनेंस) के रूप में देने का आदेश सुनाया था। इस आदेश के तहत यह तय किया गया था कि कुल राशि में से चार हजार रुपये उसके नाबालिग बेटे को और चार हजार रुपये उसकी नाबालिग बेटी को दिए जाएंगे। इस वित्तीय आदेश के खिलाफ जब पिता ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, तो उसने अदालत के सामने यह मुख्य दलील रखी कि वह वर्तमान समय में पूरी तरह से बेरोजगार है और उसके पास आय का कोई भी सक्रिय स्रोत उपलब्ध नहीं है। उसने अदालत को यह भी बताया कि वह पहले एक ऑटो-रिक्शा चलाकर अपना गुजारा करता था, लेकिन बदहाली के कारण उसने अपनी आजीविका का वह एकमात्र जरिया भी बेच दिया है। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मामले के सभी पहलुओं और दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद याचिकाकर्ता की इन तमाम दलीलों को पूरी तरह से सारहीन और अमान्य करार दिया। अदालत ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ और कमाने में सक्षम व्यक्ति है, इसलिए उसकी कथित बेरोजगारी को बच्चों के अधिकारों का हनन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

न्यायालय ने सुनवाई के दौरान बच्चों की संवेदनशील उम्र का हवाला देते हुए एक बेहद मानवीय और सख्त टिप्पणी की। खंडपीठ ने दर्ज किया कि वर्तमान में याचिकाकर्ता के बच्चों की उम्र क्रमशः दस वर्ष और सात वर्ष है, जो कि उनके शारीरिक, मानसिक विकास और स्कूली शिक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। इतनी कम उम्र के बच्चों की परवरिश, उनकी पढ़ाई-लिखाई, स्वास्थ्य और सुनहरे भविष्य की आवश्यकताओं को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज या स्थगित नहीं किया जा सकता क्योंकि उनके पिता ने खुद को काम धंधे से अलग कर लिया है। अदालत ने कहा कि बच्चों को जीवित रहने और सम्मानजनक जीवन जीने के लिए निरंतर वित्तीय सहायता की आवश्यकता होती है, जिसे पूरा करना पिता का प्राथमिक कर्तव्य है।

न्यायालय ने अपने विस्तृत आदेश में यह स्पष्ट वैधानिक रुख अपनाया कि किसी भी पुरुष के लिए बेरोजगारी या कम कमाई का तर्क बच्चों के प्रति उसके कानूनी दायित्वों से मुक्ति पाने का कोई वैध या जायज आधार कभी नहीं बन सकता है। यदि कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से सक्षम है, तो यह कानूनन माना जाएगा कि उसके पास कमाने की क्षमता है और उसे अपने परिवार तथा बच्चों के भरण-पोषण के लिए हरसंभव प्रयास करके धन अर्जित करना ही होगा। उच्च न्यायालय ने इस तथ्य को भी बहुत गंभीरता से दर्ज किया कि याचिकाकर्ता पूर्व में भी निचली अदालत द्वारा अंतरिम रूप से तय की गई गुजारे-भत्ते की राशि का नियमित भुगतान करने में पूरी तरह नाकाम रहा था, जो कि अदालत के आदेशों की अवहेलना और बच्चों के प्रति घोर लापरवाही को दर्शाता है।

इस मामले की विधिक व्याख्या करते हुए कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च न्यायालय का यह निर्णय देश भर की पारिवारिक अदालतों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में कार्य करेगा। अक्सर देखा जाता है कि दांपत्य विवादों के दौरान पत्नियों और बच्चों को प्रताड़ित करने के उद्देश्य से पति जानबूझकर अपनी नौकरियों से इस्तीफा दे देते हैं या अपने व्यापार को बंद दिखा देते हैं। अदालत ने ऐसे तमाम प्रयासों पर पानी फेरते हुए यह संदेश दे दिया है कि बच्चों का कल्याण किसी भी स्थिति में सर्वोपरि रहेगा और पिता की वास्तविक या कृत्रिम बेरोजगारी उनके इस वैधानिक अधिकार के आड़े नहीं आ सकती।

Also Read- गोवा मेडिकल कॉलेज की युवा महिला डॉक्टर का बीच पर शव मिलने से सनसनी, मामले की गहराई से जांच में जुटी पुलिस

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow