कैमूर की पहाड़ियों से हॉन्गकॉन्ग के अंतरराष्ट्रीय ट्रैक तक का ऐतिहासिक सफर, नंगे पैर दौड़ने वाले पीयूष राज ने देश को दिलाया एशियाई पदक।
अक्सर यह माना जाता है कि खेल की दुनिया में वैश्विक मंच पर चमकने के लिए विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे, महंगे उपकरणों
- घोर आर्थिक तंगहाली और साधारण टी-शर्ट से इंडिया की जर्सी तक पहुंचे रोहतास के लाल, जूनियर एशियाई एथलेटिक्स में रचा स्वर्णिम इतिहास
- पिता के निधन के बाद आटा चक्की चलाकर पाला था परिवार, अभावों को जिद से हराकर विश्व चैंपियनशिप का टिकट कटाने वाले धावक की पूरी कहानी
अक्सर यह माना जाता है कि खेल की दुनिया में वैश्विक मंच पर चमकने के लिए विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे, महंगे उपकरणों और उच्च स्तरीय वित्तीय साधनों की आवश्यकता होती है। हालांकि, बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय ट्रैक पर तिरंगा लहराने वाले एक उन्नीस वर्षीय युवा धावक ने इस पूरी धारणा को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। हॉन्गकॉन्ग में आयोजित 22वीं जूनियर एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप (U20 Asian Athletics Championships 2026) में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए बिहार के रोहतास जिले के रहने वाले पीयूष राज ने इतिहास रच दिया है। उन्होंने पुरुषों की $4 \times 400$ मीटर रिले दौड़ प्रतियोगिता में भारतीय टीम को कांस्य पदक दिलाने में एक केंद्रीय भूमिका निभाई है, जिसने पूरे देश सहित विशेष रूप से बिहार के खेल जगत को गौरवान्वित किया है।
इस ऐतिहासिक खेल सफलता की गहराई को समझने के लिए पीयूष के पारिवारिक और जमीनी संघर्षों की पृष्ठभूमि को जानना बेहद आवश्यक है। रोहतास जिले के अमझोर (बंजारी) गांव के एक अत्यंत साधारण परिवार में जन्मे पीयूष का बचपन आम बच्चों की तरह सुख-सुविधाओं से भरा नहीं था। साल 2015 में एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना में उनके पिता का आकस्मिक निधन हो गया था, जिसके बाद पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर की आर्थिक स्थिति इतनी अधिक खराब हो गई थी कि परिवार के भरण-पोषण के लिए पीयूष और उनके बड़े भाई को मिलकर गांव में एक छोटी सी गेहूं पीसने वाली आटा चक्की चलानी पड़ी। इस घोर आर्थिक तंगहाली के बीच भी उनके भीतर दौड़ने की जो एक स्वाभाविक और अटूट ललक थी, वह कभी कम नहीं हुई।
पीयूष की इस अद्भुत खेल यात्रा की शुरुआत लगभग सात साल पहले कैमूर की उबड़-खाबड़ पहाड़ियों और सोन नदी के रेतीले किनारों पर हुई थी, जहां वे स्थानीय युवाओं को भारतीय सेना की भर्ती के लिए दौड़ते हुए देखते थे। सेना के जवानों की तैयारी से प्रेरित होकर उन्होंने खुद भी बिना किसी पेशेवर कोच या जूतों के दौड़ना शुरू कर दिया। किसी ने उन्हें बताया था कि पहाड़ों की चढ़ाई पर दौड़ने से फेफड़ों की क्षमता और पैरों की ताकत बहुत मजबूत होती है, जिसे ध्यान में रखकर वे कोरोना महामारी के अत्यंत कठिन दौर में भी रोजाना सुबह तीन बजे उठ जाते थे। वे बिना किसी आधुनिक ट्रैक के कैमूर की पथरीली पहाड़ियों और सोन नदी की रेत पर नंगे पैर ही घंटों तक पसीना बहाते थे, जिसने उनकी शारीरिक सहनशक्ति और स्टेमिना की एक बेहद मजबूत नींव तैयार कर दी। हॉन्गकॉन्ग के चमचमाते अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स ट्रैक पर भारतीय $4 \times 400$ मीटर पुरुष रिले टीम ने 3 मिनट 05.54 सेकेंड का एक बेहद शानदार समय निकालते हुए नया मीट रिकॉर्ड बनाया और कांस्य पदक अपने नाम किया। इस गौरवशाली टीम में शुरुआती लेग की जिम्मेदारी संभालने वाले पीयूष राज के साथ सैयद सबीर, रंजीत कुमार और मोहम्मद अशफाक शामिल थे, जिन्होंने बेहतरीन तालमेल का प्रदर्शन किया। यह पदक इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप के इतिहास में ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धा के भीतर पदक जीतने वाले पीयूष बिहार के पहले एथलीट बन गए हैं।
पहाड़ियों से निकलकर पेशेवर खेल की दुनिया में कदम रखने का सफर भी पीयूष के लिए चुनौतियों से भरा रहा, जहां उन्हें अपनी मां बबीता श्रीवास्तव का अटूट सहयोग मिला। मां ने तंगहाली के बावजूद सिलाई का काम शुरू किया और पीयूष को आगे की तैयारी के लिए पटना के पाटलिपुत्र स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स भेजा। साल 2022 में पटना पहुंचने के बाद शुरुआती दिनों में उनके पास रहने और खाने के पैसे नहीं थे, जिसके कारण उन्होंने स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स की मेस (रसोई) में ही एक छोटा सा काम पकड़ लिया ताकि वे अपनी ट्रेनिंग को जारी रख सकें। उस समय वे एक बेहद साधारण टी-शर्ट और नंगे पैर ही ट्रैक पर अभ्यास करते थे, लेकिन राष्ट्रीय अंतर-जिला जूनियर एथलेटिक्स मीट (NIDJAM) में उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन ने बिहार राज्य खेल प्राधिकरण के शीर्ष अधिकारियों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया।
प्रतिभा की सही पहचान होने के बाद बिहार सरकार के खेल विभाग ने पीयूष को बेहतर अवसर देते हुए विशेष कार्यक्रम के तहत उच्च स्तरीय प्रशिक्षण के लिए हैदराबाद के गाचीबोवली स्टेडियम भेजा। पिछले तीन वर्षों से वे हैदराबाद में द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता कोच एन रमेश और लक्ष्मण कोर्रा के मार्गदर्शन में अपनी खेल तकनीक और गति को निखार रहे हैं। इस कड़े प्रशिक्षण के दौरान उनकी अनुशासनप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे पिछले तीन सालों में केवल दस दिनों के लिए ही अपने गांव वापस गए हैं। उनकी इस अविश्वसनीय मेहनत का परिणाम तब सामने आया जब उन्होंने कर्नाटक के तुमकुर में आयोजित अंडर-20 फेडरेशन कप में 400 मीटर की व्यक्तिगत दौड़ को मात्र 46.62 सेकेंड में पूरा कर अपना व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड बनाया।
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