Waris Pathan on Baba Ramdev: बाबा रामदेव के बयान पर भड़के वारिस पठान, कहा- मुसलमान किसी के बाप से नहीं डरता

Waris Pathan on Baba Ramdev: बाबा रामदेव के एक बयान पर एआईएमआईएम नेता वारिस पठान ने तीखा पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि देश में मुसलमान किसी के दबाव में नहीं रहने वाला।

Jul 13, 2026 - 14:00
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Waris Pathan on Baba Ramdev: बाबा रामदेव के बयान पर भड़के वारिस पठान, कहा- मुसलमान किसी के बाप से नहीं डरता
AIMIM Leader Waris Pathan Reply
  • Baba Ramdev vs Waris Pathan: रामदेव की टिप्पणी पर एआईएमआईएम नेता वारिस पठान का तीखा पलटवार, राजनीतिक सरगर्मी तेज
  • राजनीतिक गलियारे में नया घमासान: बाबा रामदेव के विवादित बयान पर एआईएमआईएम नेता वारिस पठान का करारा जवाब, कहा- हमारा संविधान सर्वोच्च
  • बयानबाजी का नया विवाद: बाबा रामदेव की टिप्पणी पर भड़की एआईएमआईएम, नेता वारिस पठान ने सार्वजनिक मंच से दिया तीखा जवाब

देश के समसामयिक राजनीतिक परिदृश्य में बयानों के तीखे तीरों का सिलसिला एक बार फिर तेज हो गया है। योग गुरु और पतंजलि आयुर्वेद के प्रणेता बाबा रामदेव (Baba Ramdev) द्वारा सामाजिक-धार्मिक विषयों पर की गई एक हालिया टिप्पणी के जवाब में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक वारिस पठान (Waris Pathan) ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। सोमवार, 13 जुलाई 2026 को सामने आए राजनीतिक घटनाक्रम के अनुसार, वारिस पठान ने बाबा रामदेव के बयान पर तीखा पलटवार करते हुए स्पष्ट किया कि भारत का अल्पसंख्यक समाज पूरी तरह से निडर है और वह केवल देश के लोकतांत्रिक संविधान के दायरे में विश्वास रखता है। इस सार्वजनिक बयानबाजी के बाद देश की मुख्यधारा की राजनीति और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर धार्मिक व राजनीतिक विमर्श तेज हो गया है, जिससे विभिन्न दलों के नेताओं के बीच वैचारिक टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब बाबा रामदेव ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान देश के सामाजिक ताने-बाने और अल्पसंख्यक समुदायों के ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टिकोण को लेकर कुछ टिप्पणियां की थीं। रामदेव के उस बयान को एआईएमआईएम और अन्य विपक्षी दलों ने समुदाय विशेष को लक्षित करने वाले और भड़काने वाले वक्तव्य के रूप में देखा। इस वैचारिक असहमति के विरोध में एआईएमआईएम के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने एक विशेष मीडिया संबोधन और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए रामदेव की सोच पर कड़े सवाल खड़े किए। पठान ने अपने वक्तव्य में अत्यधिक आक्रामक लेकिन संवैधानिक भाषा का प्रयोग करते हुए यह रेखांकित करने का प्रयास किया कि देश का कोई भी नागरिक किसी भी गैर-संवैधानिक दबाव या धमकी के आगे झुकने वाला नहीं है।

इस विवाद की कड़ियों की समीक्षा करें तो पता चलता है कि योग गुरु बाबा रामदेव अक्सर राष्ट्रीय और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दों पर अपनी राय खुलकर प्रकट करते रहे हैं। उनके पिछले बयान में कुछ ऐसे संदर्भ शामिल थे जिन्हें लेकर अल्पसंख्यक नेताओं में नाराजगी थी।

इस पृष्ठभूमि में वारिस पठान ने मुंबई में एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि कुछ लोग देश में निरंतर विभाजनकारी नैरेटिव गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने रामदेव के बयान को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि भारतीय मुसलमान एक गौरवशाली नागरिक है और वह किसी के बाप से नहीं डरता, बल्कि वह केवल अल्लाह से डरता है और देश के कानून का सम्मान करता है। पठान ने जोर देकर कहा कि इस देश का निर्माण सभी समुदायों के बलिदान से हुआ है, इसलिए किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी की देशभक्ति या धार्मिक निष्ठा पर अनावश्यक टिप्पणी करे। उन्होंने बाबा रामदेव को नसीहत देते हुए कहा कि वे योग और व्यापार तक ही सीमित रहें, राजनीति में विद्वेष फैलाने का काम न करें।

इस राजनीतिक संग्राम पर देश के विभिन्न राजनीतिक खेमों की ओर से बेहद संतुलित लेकिन वैचारिक रूप से बंटी हुई प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के करीबियों का कहना है कि पार्टी हमेशा से नागरिकों के मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आवाज उठाती रही है, और वारिस पठान का यह जवाब उसी सैद्धांतिक लड़ाई का हिस्सा है।

दूसरी तरफ, बाबा रामदेव के समर्थकों और पतंजलि से जुड़े सूत्रों का तर्क है कि योग गुरु के बयानों को हमेशा संदर्भ से बाहर (Out of Context) करके देखा जाता है। उनका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि देश के ऐतिहासिक सत्यों और सांस्कृतिक एकता पर विमर्श शुरू करना था। भारतीय जनता पार्टी के कुछ स्थानीय नेताओं ने भी इस मामले में प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वारिस पठान जैसे नेताओं को बयानों में संयम रखना चाहिए और विकास के मुद्दों को छोड़कर धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति से बचना चाहिए।

इस बड़े जुबानी जंग का प्रभाव राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति के धरातल पर साफ तौर पर महसूस किया जा रहा है। इस तीखे पलटवार के बाद आने वाले चुनावी राज्यों में ध्रुवीकरण की राजनीति को बल मिलने की आशंका जताई जा रही है क्योंकि दोनों ही पक्षों के समर्थक सोशल मीडिया पर इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना रहे हैं।

इसके अतिरिक्त, इस विवाद ने मुख्यधारा के मीडिया चैनलों पर 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम धार्मिक संवेदनशीलता' विषय पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सामाजिक संगठनों ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि इस तरह के तीखे बयानों से जमीनी स्तर पर सांप्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने में प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि, विधिक जानकारों का मानना है कि दोनों ओर से दिए गए ये वक्तव्य मुख्य रूप से राजनीतिक वक्तव्यबाजी के दायरे में आते हैं, जब तक कि इनमें सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने का कोई प्रत्यक्ष आह्वान न किया गया हो।

आगामी दिनों में इस बात की प्रबल संभावना है कि दोनों पक्षों के नेता इस विषय को लेकर सार्वजनिक मंचों और चुनावी रैलियों में अपनी-अपनी दलीलों को और मजबूती से रखेंगे। पुलिस और नागरिक प्रशासन की खुफिया टीमें सोशल मीडिया हैंडल्स पर बारीकी से नजर रख रही हैं ताकि इस विवाद की आड़ में कोई असामाजिक तत्व शांति व्यवस्था को नुकसान न पहुंचा सके। विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस मामले में कोई पक्ष शिकायत दर्ज कराता है, तो कानूनी नियमों के तहत बयानों की सीडी (CD) और वीडियो फुटेज की जांच की जा सकती है। फिलहाल, दोनों ही संगठन अपने-अपने स्टैंड पर पूरी मजबूती से कायम हैं और यह विवाद राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बना हुआ है।

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