Special: भतीजे के अंधमोह में TMC सुप्रीमो की स्थिति हुई धृतराष्ट्र जैसी, पश्चिम बंगाल की सत्ता गंवाने के बाद अब आंतरिक बगावत से बिखर रही है पूरी पार्टी।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक भूचाल आया हुआ है, जिसने TMC (TMC) के शीर्ष

Jun 4, 2026 - 11:51
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Special: भतीजे के अंधमोह में TMC सुप्रीमो की स्थिति हुई धृतराष्ट्र जैसी, पश्चिम बंगाल की सत्ता गंवाने के बाद अब आंतरिक बगावत से बिखर रही है पूरी पार्टी।
भतीजे के अंधमोह में TMC सुप्रीमो की स्थिति हुई धृतराष्ट्र जैसी, पश्चिम बंगाल की सत्ता गंवाने के बाद अब आंतरिक बगावत से बिखर रही है पूरी पार्टी।

 By Vijay Laxmi Singh (Editor- In- Chief)

  • कोलकाता की सड़कों पर पार्टी के बागी विधायक के खिलाफ उतरे तृणमूल समर्थक, पोस्टर और विवादित नारों से गरमाया सूबे का सियासी तापमान।
  • बाहर से बेहद बेदाग और साफ दिखने वाली छवि के भीतर छुपा था अंदरूनी कलह का समंदर, पहले पावर हारी और अब वजूद बचाने की जंग लड़ रही TMC

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक भूचाल आया हुआ है, जिसने TMC (TMC) के शीर्ष नेतृत्व की नींव को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त झेलने और सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टी के भीतर असंतोष का जो लावा सुलग रहा था, वह अब खुलकर सड़कों पर आ गया है। इस पूरे सियासी घमासान के केंद्र में पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी की वह प्रशासनिक और सांगठनिक कार्यशैली है, जिसकी तुलना अब पौराणिक चरित्र धृतराष्ट्र से की जाने लगी है। जिस तरह धृतराष्ट्र अपने पुत्र के मोह में पूरी तरह से अंधे हो गए थे और उन्होंने कुरुवंश के विनाश को निमंत्रण दे दिया था, ठीक उसी तरह ममता बनर्जी पर भी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के प्रति अत्यधिक और एकतरफा अंधमोह रखने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। इसी आंतरिक खींचतान और असंतोष के कारण आज पूरी पार्टी विघटन के कगार पर पहुंच चुकी है।

कोलकाता की व्यस्त सड़कों और रणनीतिक चौराहों पर पिछले कुछ दिनों से जो नजारा देखने को मिल रहा है, उसने सूबे की भावी राजनीति की एक नई और डरावनी तस्वीर पेश की है। पार्टी के एक प्रमुख बागी विधायक, जिन्होंने खुलेआम नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है, उनके विरोध में अचानक सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों के हाथों में बड़े-बड़े पोस्टर, बैनर और तख्तियां थीं, जिन पर बागी नेताओं को गद्दार और धोखेबाज बताते हुए कई तरह के तीखे और आक्रामक नारे लिखे गए थे। हवा में गूंजते इन विवादित और गगनभेदी नारों ने न केवल कोलकाता के सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है, बल्कि यह भी साफ कर दिया है कि पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस और गुस्से का माहौल किस कदर हावी हो चुका है। सड़कों पर हो रहे इन प्रदर्शनों के पीछे संगठन के ही एक धड़े का हाथ माना जा रहा है, जो बगावत की इस आग को दबाने की आखिरी और हताश कोशिश कर रहा है।

इस राजनीतिक उठापटक का सबसे स्याह पहलू यह है कि जो पार्टी कुछ समय पहले तक राज्य की सत्ता पर एकछत्र राज कर रही थी, उसने बेहद कम समय में अपनी राजनैतिक जमीन पूरी तरह से खो दी है। इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो स्पष्ट होता है कि इस दल ने सबसे पहले अपनी प्रशासनिक पावर हारी, जिसके बाद चुनावी मैदान में उसे करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा और सत्ता हाथ से चली गई। लेकिन त्रासदी यहीं पर खत्म नहीं हुई, बल्कि अब सत्ता गंवाने के ठीक बाद पार्टी के भीतर एक ऐसा आंतरिक विभाजन शुरू हो चुका है जिससे संगठन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। विधायकों और सांसदों का एक बहुत बड़ा धड़ा लगातार नेतृत्व से दूरी बना रहा है, जिससे यह साफ संदेश जा रहा है कि जो दल कभी बंगाल की अस्मिता का प्रतीक हुआ करता था, वह अब अंदरूनी गुटबाजी के कारण ताश के पत्तों की तरह ढह रहा है। TMC के भीतर चल रहे इस अभूतपूर्व संकट के दौरान एक बेहद चौंकाने वाली स्थिति तब सामने आई, जब पार्टी प्रमुख द्वारा बुलाई गई एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक से करीब साठ विधायकों ने पूरी तरह से दूरी बना ली। इसके विपरीत, पार्टी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब खुद ममता बनर्जी को पुलिसिया कार्रवाई और केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग के खिलाफ सड़कों पर बैठकर धरना देना पड़ा, जहां उनके साथ उंगलियों पर गिने जाने योग्य केवल आठ विधायक और छह सांसद ही उपस्थित थे। यह दृश्य संगठन पर उनकी ढीली होती पकड़ की गवाही दे रहा था।

अगर राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा पार्टी के आंतरिक ढांचे का बारीक अध्ययन किया जाए, तो एक बहुत ही विरोधाभासी और चौंकाने वाली सच्चाई सामने आती है। लंबे समय से देश और राज्य की जनता के बीच ममता बनर्जी की बाहरी छवि को एकदम साफ, सादगी पसंद और बेदाग बनाकर पेश किया जाता रहा है, लेकिन संगठन के भीतर का सच इसके बिल्कुल विपरीत और बेहद भयावह रहा है। बाहरी तौर पर जो व्यवस्था अनुशासन और शुचिता का दावा करती थी, उसके अंदर भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप और वरिष्ठ नेताओं की निरंतर अनदेखी का एक बहुत बड़ा समंदर हिलोरे ले रहा था। पार्टी के पुराने और समर्पित नेता, जिन्होंने दशकों तक संघर्ष करके इस संगठन को खड़ा किया था, वे लंबे समय से अंदर ही अंदर घुटन महसूस कर रहे थे क्योंकि सभी महत्वपूर्ण फैसले केवल एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए थे।

इस आंतरिक विद्रोह की मुख्य वजहों की पड़ताल करने पर पता चलता है कि यह पूरी बगावत किसी वैचारिक मतभेद का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर नेतृत्व के थोपे जाने के खिलाफ एक सामूहिक आक्रोश है। जब पार्टी के भीतर वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को दरकिनार करके जबरन अभिषेक बनर्जी को दूसरे नंबर के सबसे शक्तिशाली पद पर बिठाया गया और सभी को उनके सामने नतमस्तक होने के लिए मजबूर किया गया, तो विद्रोह की पटकथा उसी दिन लिख दी गई थी। चुनाव में हार के बाद जब हार की जिम्मेदारी तय करने के बजाय सभी विधायकों से एक युवा नेता को खड़े होकर सम्मान देने के लिए कहा गया, तो कई विधायकों का धैर्य जवाब दे गया। यही कारण है कि आज साठ से अधिक विधायक एकजुट होकर विधानसभा अध्यक्ष के पास पहुंच चुके हैं और उन्होंने वर्तमान सांगठनिक व्यवस्था को स्वीकार करने से पूरी तरह से इनकार कर दिया है।

इस राजनीतिक दलदल में फंसी TMC के लिए आने वाले दिन और भी अधिक चुनौतीपूर्ण और अंधकारमय होने वाले हैं, क्योंकि बगावत की यह चिंगारी अब केवल कोलकाता या राज्य विधानसभा तक ही सीमित नहीं रहने वाली है। राजनीतिक हलकों में इस बात की पुरजोर चर्चाएं चल रही हैं कि विधायिका दल में हुए इस बड़े ऐतिहासिक विभाजन के बाद अब संसदीय दल यानी लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों में भी बहुत जल्द एक बड़ा विस्फोट होने वाला है। कयास लगाए जा रहे हैं कि पार्टी के दो-तिहाई से अधिक सांसद भी बहुत जल्द केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह राष्ट्रीय स्तर पर भी इस क्षेत्रीय दल के लिए सबसे बड़ा और अंतिम झटका साबित होगा, जिससे उबर पाना इसके शीर्ष नेतृत्व के लिए लगभग असंभव हो जाएगा।

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