तमिलनाडु की राजनीति में छह दशकों पुराना एक ऐतिहासिक और मजबूत राजनीतिक अध्याय समाप्त, डीएमके और आईयूएमएल ने अलग कीं अपनी राहें।

साठ सालों के इस लंबे सफर के टूटने की घटना को आईयूएमएल के नेताओं ने एक बेहद भावुक लेकिन समय की मांग के अनुरूप उठाया गया कदम बताया है। पार्टी के इतिहास पर नजर डालें तो सन 1962 से ही यह दल लगातार द्रविड़ राजनीति के इस प्रमुख धड़े के साथ कंधे से कंधा मिला

Jun 21, 2026 - 09:37
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तमिलनाडु की राजनीति में छह दशकों पुराना एक ऐतिहासिक और मजबूत राजनीतिक अध्याय समाप्त, डीएमके और आईयूएमएल ने अलग कीं अपनी राहें।
तमिलनाडु की राजनीति में छह दशकों पुराना एक ऐतिहासिक और मजबूत राजनीतिक अध्याय समाप्त, डीएमके और आईयूएमएल ने अलग कीं अपनी राहें।

  • चेन्नई की आम परिषद बैठक में इंडियन यूनियन मुस्लिम लेबर पार्टी ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेतृत्व वाले धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन से औपचारिक रूप से बाहर निकलने का पारित किया प्रस्ताव।
  • राज्य के बदलते सत्ता समीकरणों और नवगठित सरकार में हिस्सेदारी मिलने के बाद लिया गया बेहद संवेदनशील फैसला, चुनावी और स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर नई रणनीतियों पर काम शुरू।

तमिलनाडु के राजनैतिक परिदृश्य में एक बेहद महत्वपूर्ण और युगांतकारी परिवर्तन देखने को मिला है। राज्य की सियासत में लगभग साठ वर्षों से चला आ रहा द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) का बेहद पुराना और मजबूत राजनीतिक गठबंधन आधिकारिक रूप से टूट गया है। चेन्नई के ऐतिहासिक क्षेत्र में आयोजित आईयूएमएल की राज्य आम परिषद की बैठक के दौरान यह बेहद संवेदनशील और बड़ा निर्णय लिया गया। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और राष्ट्रीय अध्यक्ष केएम खादर मोहिदीन की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में कई प्रमुख प्रस्ताव पारित किए गए, जिनमें से सबसे प्रमुख प्रस्ताव डीएमके के नेतृत्व वाले धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन से तुरंत बाहर निकलने का था। इस बैठक में उपस्थित सैकड़ों प्रतिनिधियों ने राज्य की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर गहन विचार-विमर्श किया और यह माना कि बदले हुए घटनाक्रमों के बीच अब पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के साथ आगे बढ़ना संभव नहीं रह गया है। इस फैसले ने न केवल राज्य की दो पारंपरिक ताकतों के संबंधों को खत्म कर दिया है, बल्कि प्रांतीय राजनीति में एक नए राजनीतिक समीकरण की शुरुआत भी कर दी है।

इस बड़े राजनीतिक अलगाव की पृष्ठभूमि हाल ही में संपन्न हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के परिणामों और उसके बाद उत्पन्न हुई परिस्थितियों से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। हालिया चुनावों में जनता ने एक बिल्कुल नया और अप्रत्याशित जनादेश दिया था, जिसके बाद राज्य में सत्ता का केंद्र पूरी तरह बदल गया और सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व में तमिलगा वेट्टी कड़गम (टीविकेट) की सरकार अस्तित्व में आई। आईयूएमएल ने इस नए जनादेश और जनता के फैसले का सम्मान करते हुए राज्य में एक स्थिर सरकार के गठन के लिए नए शासक दल को अपना बिना शर्त समर्थन देने का फैसला किया था। इस कूटनीतिक कदम के बाद बदले में आईयूएमएल के विधायक ए एम शाहजहाँ को नवनियुक्त कैबिनेट में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री के रूप में शामिल भी कर लिया गया। सरकार के भीतर इस तरह की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी मिलने और कैबिनेट बर्थ प्राप्त होने के बाद आईयूएमएल के लिए एक साथ दो विपरीत राजनीतिक नावों पर सवारी करना नामुमकिन हो गया था, जिसके चलते पार्टी ने औपचारिक रूप से पुराने गठबंधन को अलविदा कहना ही सबसे उचित समझा।

साठ सालों के इस लंबे सफर के टूटने की घटना को आईयूएमएल के नेताओं ने एक बेहद भावुक लेकिन समय की मांग के अनुरूप उठाया गया कदम बताया है। पार्टी के इतिहास पर नजर डालें तो सन 1962 से ही यह दल लगातार द्रविड़ राजनीति के इस प्रमुख धड़े के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलता आ रहा था। स्थानीय निकायों से लेकर विधानसभा और संसदीय चुनावों तक, दोनों दलों ने मिलकर कई ऐतिहासिक जीत दर्ज की थीं। इस बार भी यह गठबंधन इसी उम्मीद और पूरी ताकत के साथ चुनावी मैदान में उतरा था कि राज्य में पुरानी सरकार की वापसी होगी और मौजूदा नेतृत्व को दोबारा कमान मिलेगी, परंतु समय और जनता की इच्छा कुछ अलग ही थी। नए दल को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत के जादुई आंकड़े से थोड़ा दूर रहने के कारण राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने की एक गंभीर आशंका निर्मित हो गई थी। आईयूएमएल नेतृत्व का मानना है कि राज्य को केंद्र के परोक्ष नियंत्रण या अन्य विरोधी विचारधाराओं के प्रभाव से बचाने के लिए नए शासक दल को सरकार बनाने में मदद करना बेहद आवश्यक हो गया था और इसी वजह से यह कड़ा फैसला लिया गया।

द्रविड़ राजनीति में आ रहा बड़ा बदलाव

तमिलनाडु की राजनीति में पिछले कुछ महीनों के भीतर यह कोई पहला बड़ा अलगाव नहीं है। आईयूएमएल से ठीक पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) जैसी प्रमुख वामपंथी ताकतों ने भी डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन से अपनी राहें पूरी तरह अलग कर ली हैं, जिससे राज्य का पुराना विपक्ष काफी कमजोर और अलग-थलग पड़ता दिख रहा है।

गठबंधन टूटने के बाद अब राज्य की राजनीति में नए सिरे से चुनावी गोटियां बिछनी शुरू हो गई हैं। आईयूएमएल ने साफ कर दिया है कि वह वर्तमान में सरकार का हिस्सा है और वह चाहती है कि प्रदेश में विकास कार्य बिना किसी बाधा के सुचारू रूप से चलते रहें। इसी रणनीति के तहत पार्टी ने यह भी घोषणा की है कि आने वाले समय में होने वाले विधानसभा उपचुनावों, संसदीय चुनावों और विशेष रूप से स्थानीय निकाय चुनावों में वह पूरी तरह से नए शासक दल के साथ मिलकर और आपसी तालमेल के जरिए चुनावी मैदान में उतरेगी। पूर्व की व्यवस्था में पार्टी को मेयर या नगर पालिका अध्यक्ष जैसे बड़े और नीति-निर्धारक पदों पर चुनाव लड़ने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता था, लेकिन नए सत्ता समीकरणों के भीतर पार्टी को यह पूरी उम्मीद है कि उसे स्थानीय स्वशासन में अधिक प्रतिनिधित्व और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हासिल होंगी, जिससे वह अपने आधार को और मजबूत कर सकेगी।

दूसरी तरफ, इस पुराने और पारंपरिक साथी के जाने से डीएमके खेमे में भी आत्ममंथन और भविष्य की रणनीतियों को लेकर हलचल तेज हो गई है। पार्टी के आंतरिक हलकों में इस बात को लेकर गंभीर चर्चाएं हो रही हैं कि कैसे एक-एक करके उसके पुराने और भरोसेमंद साथी उससे दूर होते जा रहे हैं। हालांकि, वैचारिक मोर्चे पर पार्टी का यह मानना है कि राजनीति में इस तरह के बदलाव अस्थाई होते हैं और कोई भी दल अपने हितों के अनुसार फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। डीएमके के रणनीतिकारों का कहना है कि वे इस अलगाव से विचलित होने वाले नहीं हैं और वे आने वाले स्थानीय चुनावों में अपनी जमीनी ताकत के बल पर जनता के बीच जाएंगे। इसके बावजूद, यह बात पूरी तरह साफ है कि अल्पसंख्यकों और दलित मतदाताओं के बीच मजबूत पकड़ रखने वाले दलों का एक साथ गठबंधन छोड़ना पार्टी के लिए आने वाले समय में एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

चेन्नई की बैठक में पारित किए गए प्रस्तावों में इस बात का भी विशेष जिक्र किया गया है कि भविष्य के चुनावी गठबंधनों के स्वरूप को लेकर अंतिम और औपचारिक निर्णय तभी लिया जाएगा जब राज्य में स्थानीय निकायों या उपचुनावों की तिथियों की आधिकारिक घोषणा हो जाएगी। पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन करते हुए कुल पांच सौ सदस्यों में से लगभग चार सौ तिरासी प्रतिनिधियों ने इस महत्वपूर्ण बैठक में हिस्सा लिया और सर्वसम्मति से इस कड़े फैसले पर अपनी मुहर लगाई। नेताओं का कहना है कि यह निर्णय किसी व्यक्तिगत द्वेष या कड़वाहट के कारण नहीं लिया गया है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से मुस्लिम समुदाय के हितों की रक्षा करने और राज्य में एक स्थिर व धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था को बनाए रखने की व्यावहारिक कूटनीति का हिस्सा है।

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