Iran Geopolitics: ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर ग़ालिबाफ़ का बड़ा बयान, कहा- 'हमें लड़ना भी होगा और बातचीत भी करनी होगी'
ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर ग़ालिबाफ़ ने रणनीतिक रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि देश को राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए लड़ने और कूटनीतिक बातचीत करने दोनों की जरूरत है।

पश्चिम एशिया में जारी गंभीर सामरिक तनाव और पश्चिमी शक्तियों के साथ जारी गतिरोध के बीच ईरानी संसद (मजलिस) के स्पीकर मोहम्मद बागेर ग़ालिबाफ़ ने देश की भविष्यगामी विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति को लेकर एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है। ग़ालिबाफ़ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में देश को दोहरे दृष्टिकोण पर काम करना होगा, एक तरफ जहां अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर मोर्चे पर दृढ़ता से खड़ा रहना और लड़ना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संवाद और बातचीत की मेज से भी पीछे नहीं हटा जा सकता।
तेहरान में एक उच्चस्तरीय सभा को संबोधित करते हुए ग़ालिबाफ़ ने कहा कि आधुनिक भू-राजनीति में केवल सैन्य या आक्रामक रुख अपनाना समाधान नहीं हो सकता और न ही दबाव में आकर पूरी तरह कूटनीतिक आत्मसमर्पण करना बुद्धिमानी है। उनके अनुसार, वास्तविक शक्ति वही है जिसमें रक्षात्मक प्रतिरोध की क्षमता हो और साथ ही राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित करने के लिए वार्ता करने का विवेक और रणनीतिक कौशल मौजूद रहे।
रणनीतिक संतुलन की जरूरत पर जोर
ईरानी संसद के अध्यक्ष का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, क्षेत्रीय तनाव और परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) तथा पश्चिमी देशों के लगातार बढ़ते दबाव का सामना कर रहा है। ग़ालिबाफ़, जो ईरान की राजनीति में एक प्रमुख रूढ़िवादी लेकिन व्यावहारिक सोच रखने वाले नेता माने जाते हैं, ने इस बात को रेखांकित किया कि देश की विदेश नीति किसी एक चरम छोर पर निर्भर नहीं रह सकती।
उन्होंने अपने संबोधन में इस धारणा को खारिज करने का प्रयास किया कि कूटनीतिक वार्ता किसी भी तरह से राष्ट्रीय कमजोरी का प्रतीक है। ग़ालिबाफ़ के शब्दों में, जब तक देश की रक्षात्मक ताकत और आंतरिक एकता मजबूत है, तब तक बातचीत की मेज पर अपनी शर्तें मनवाना संभव होता है। इसी तरह केवल संघर्ष के रास्ते पर चलकर कूटनीतिक विकल्पों को पूरी तरह बंद कर देना भी राष्ट्र को लंबे समय तक आर्थिक और राजनीतिक रूप से अलग-थलग कर सकता है।
क्षेत्रीय तनाव और अंतरराष्ट्रीय दबाव का संदर्भ
पश्चिम एशिया में पिछले कई महीनों से अनिश्चितता और सैन्य टकराव का माहौल बना हुआ है। इजरायल और विभिन्न क्षेत्रीय समूहों के बीच चल रहे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर रखा है। इस बीच अमेरिका और यूरोपीय शक्तियों द्वारा तेहरान पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने देश की घरेलू अर्थव्यवस्था को भी खासा प्रभावित किया है।
ईरान में राजनीतिक नेतृत्व के भीतर दो प्रमुख विचार प्रवृत्तियां रही हैं, एक वर्ग पश्चिमी देशों के साथ किसी भी प्रकार की बातचीत का कड़ा विरोधी रहा है और उसका मानना है कि केवल प्रतिरोध ही एकमात्र विकल्प है; वहीं दूसरा वर्ग अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ नए सिरे से कूटनीतिक समझौते की वकालत करता रहा है ताकि प्रतिबंधों से राहत मिल सके। ग़ालिबाफ़ के इस बयान को इन दोनों विचारों के बीच एक मध्यमार्गी संतुलन स्थापित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
| प्रमुख बिंदु | विवरण / संदर्भ |
| वक्ता | मोहम्मद बागेर ग़ालिबाफ़ (ईरानी संसद के स्पीकर) |
| केंद्रीय संदेश | राष्ट्रीय हितों के लिए संघर्ष और कूटनीतिक संवाद दोनों आवश्यक |
| भौगोलिक दायरा | तेहरान, ईरान एवं पश्चिम एशिया |
| प्रभावित क्षेत्र | अंतरराष्ट्रीय संबंध, क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रतिबंध वार्ता |
| रणनीतिक नजरिया | रक्षात्मक तत्परता के साथ कूटनीतिक खिड़की खुली रखना |
क्या हैं इस बयान के कूटनीतिक मायने?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि ग़ालिबाफ़ का यह रुख केवल घरेलू राजनीति के लिए नहीं है, बल्कि यह पश्चिमी देशों और क्षेत्रीय शक्तियों के लिए भी एक सीधा संदेश है:
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ताकत के साथ वार्ता की मेज पर मौजूदगी: ईरान यह दिखाना चाहता है कि वह किसी दबाव या धमकी के आगे झुककर बातचीत नहीं करेगा। जब वह 'लड़ने' की बात करता है, तो उसका तात्पर्य अपनी रक्षात्मक तैयारी और क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ खड़े रहने की प्रतिबद्धता से है।
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प्रतिबंधों से राहत का कूटनीतिक रास्ता: जब वह 'बातचीत' की वकालत करते हैं, तो इसका संकेत यह है कि तेहरान सार्थक और बराबरी के स्तर पर होने वाले कूटनीतिक समाधानों के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं करना चाहता।
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घरेलू आम सहमति का प्रयास: ईरान के आंतरिक राजनीतिक समीकरणों में संसद का रुख बेहद प्रभावी माना जाता है। रूढ़िवादी धड़े के प्रभावशाली चेहरे के रूप में ग़ालिबाफ़ द्वारा दोनों रास्तों को जरूरी बताना सरकार को आगे कूटनीतिक कदम उठाने की खुली छूट दे सकता है।
ईरानी विदेश नीति के इतिहास पर नजर डालें तो वहां अक्सर 'हीरोइक फ्लेक्सिबिलिटी' (रणनीतिक लचीलापन) की नीति का संदर्भ आता रहा है। इसका अर्थ होता है कि सिद्धांतों से समझौता किए बिना समय और जरूरत के हिसाब से कूटनीतिक कदम उठाए जाएं। ग़ालिबाफ़ का यह ताजा बयान उसी सिद्धांत का आधुनिक राजनीतिक अनुवाद प्रतीत होता है।
उन्होंने दोहराया कि देश को अपनी सैन्य और तकनीकी क्षमताओं को उन्नत करते रहना चाहिए ताकि कोई भी बाहरी शक्ति उस पर अपनी इच्छाएं न थोप सके। लेकिन इसके साथ ही दुनिया के साथ संपर्क के चैनल चालू रखने होंगे। आर्थिक मोर्चे पर जनता को राहत दिलाने और व्यापारिक संबंधों को सुगम बनाने के लिए कूटनीतिक चैनलों का प्रभावी उपयोग अपरिहार्य है।
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि तेहरान की यह दोहरी रणनीति अंतरराष्ट्रीय मंचों और आगामी क्षेत्रीय बैठकों में किस रूप में जमीन पर उतरती है। क्या पश्चिमी देश ईरान के इस कूटनीतिक संकेत को वार्ता के अवसर के रूप में लेंगे, या फिर दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई पहले की तरह ही चौड़ी बनी रहेगी।
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