मनोज बाजपेयी का बड़ा बयान, अभिनय को बताया बरसों की कठिन तपस्या, बोले- 'गवर्नर' के किरदार के लिए साढ़े चार साल तक पढ़ता रहा स्क्रिप्ट।
सफलताओं के इस सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के बाद भी मनोज बाजपेयी के पैर जमीन पर टिके हुए हैं और वे अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलते। वे आज भी समय मिलने पर अपने पैतृक गांव बिहार जाते हैं और वहां के आम लोगों के बीच रहकर अपनी ऊर्जा को रीचार्ज करते हैं। उनका मानना है
- बिहार के छोटे से गांव से निकलकर बॉलीवुड के महानायक बनने का सफर, दिग्गज अभिनेता ने बयां की अपने संघर्ष और थियेटर के दिनों की अनकही दास्तान।
- किरदार में उतरने के लिए मर्यादा और अनुशासन बेहद जरूरी, हर नए कलाकार के लिए मार्गदर्शक साबित होगी कला के प्रति मनोज बाजपेयी की यह अटूट निष्ठा।
भारतीय सिनेमा के सबसे बेहतरीन और संजीदा अभिनेताओं में शुमार मनोज बाजपेयी ने एक हालिया साक्षात्कार में अपने फिल्मी सफर, कला के प्रति अपनी निष्ठा और अभिनय की बारीकियों को लेकर खुलकर बात की है। बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर मायानगरी मुंबई में अपनी अमिट पहचान बनाने वाले इस दिग्गज कलाकार का मानना है कि अभिनय कोई सहज या मजाक का काम नहीं है, बल्कि इसके लिए बरसों की तपस्या और अटूट धैर्य की आवश्यकता होती है। अपनी नई फिल्म में एक शक्तिशाली गवर्नर की भूमिका निभाने वाले मनोज बाजपेयी ने साझा किया कि इस किरदार को पर्दे पर जीवंत करने के लिए उन्होंने साढ़े चार साल तक लगातार स्क्रिप्ट का अध्ययन किया और चरित्र की हर एक परत को बारीकी से समझा, ताकि दर्शक पर्दे पर किसी अभिनेता को नहीं बल्कि एक वास्तविक चरित्र को देख सकें। बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के बेलवा नामक एक छोटे और पिछड़े गांव में जन्मे मनोज बाजपेयी का बचपन बेहद सादगी और अभावों के बीच बीता था। एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने के कारण उनके लिए अभिनय की दुनिया के बारे में सोचना भी एक बड़े दुस्साहस जैसा था, लेकिन बचपन से ही उनके भीतर कला और रंगमंच के प्रति एक गहरा आकर्षण था। गांव के माहौल से निकलकर जब वे उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आए, तो उन्होंने खुद को पूरी तरह से थियेटर के प्रति समर्पित कर दिया। दिल्ली के कड़े संघर्ष और रंगमंच के दिनों ने ही उनके भीतर के कलाकार को तराशने का काम किया, जहां उन्होंने भूखे पेट रहकर और कड़ाके की ठंड में भी नाटक के रिहर्सल करना जारी रखा ताकि वे अभिनय के हर पहलू पर अपनी पकड़ मजबूत कर सकें।
मनोज बाजपेयी ने अपने करियर के सबसे कठिन दौर को याद करते हुए बताया कि शुरुआती दिनों में उन्हें लगातार अस्वीकृति का सामना करना पड़ा था, जिसने उन्हें मानसिक रूप से बेहद मजबूत बना दिया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में कई बार आवेदन करने के बावजूद जब उन्हें प्रवेश नहीं मिला, तो वे पूरी तरह से टूट चुके थे और उनके मन में आत्महत्या तक के विचार आने लगे थे। लेकिन थियेटर के प्रति उनके जुनून और उनके सच्चे दोस्तों के सहयोग ने उन्हें बिखरने से बचा लिया। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बैरी जॉन के थियेटर ग्रुप के साथ जुड़कर अपने अभिनय कौशल को और अधिक निखारना शुरू कर दिया। यही वह दौर था जब उन्होंने सीखा कि असफलताएं केवल एक पड़ाव हैं, अंतिम मंजिल नहीं।
संघर्ष के वे शुरुआती दिन
जन्म स्थान: बेलवा गांव, पश्चिम चंपारण (बिहार)
करियर की शुरुआत: दिल्ली का नुक्कड़ और शौकिया थियेटर
सबसे बड़ा झटका: राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) से तीन बार रिजेक्शन
सफलता का मंत्र: लगातार अभ्यास और चरित्र की गहराइयों को समझने की भूख
अपनी आगामी भूमिका के बारे में विस्तार से बात करते हुए अभिनेता ने इस बात पर विशेष बल दिया कि जब वे किसी फिल्म की पटकथा को स्वीकार करते हैं, तो वे उसके साथ एक लंबा वक्त बिताते हैं। एक प्रामाणिक गवर्नर के रूप में खुद को ढालने के लिए उन्होंने साढ़े चार साल तक स्क्रिप्ट का बार-बार अध्ययन किया, क्योंकि वे राजनीति, सत्ता और प्रशासनिक तंत्र के तौर-तरीकों को बेहद सजीव ढंग से पर्दे पर उतारना चाहते थे। उनका मानना है कि डायलॉग याद कर लेना अभिनय नहीं है, बल्कि उस चरित्र के सोचने के तरीके, उसकी शारीरिक भाषा, उसके चलने के ढंग और उसकी सांसों की गति को अपने भीतर उतारना ही वास्तविक अभिनय है, जिसके लिए महीनों और सालों की मानसिक तैयारी की जरूरत होती है।
मुंबई आने के बाद भी मनोज बाजपेयी का संघर्ष तुरंत समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उन्हें छोटे-मोटे किरदारों और टेलीविजन धारावाहिकों के जरिए अपनी पहचान बनाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। सिनेमा की दुनिया में उन्हें पहला बड़ा ब्रेक शेखर कपूर की कालजयी फिल्म 'बैंडिट क्वीन' से मिला, जिसमें उनके छोटे से किरदार ने निर्देशकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इसके बाद राम गोपाल वर्मा की कल्ट क्लासिक फिल्म 'सत्या' में 'भीखू म्हात्रे' के किरदार ने उनके पूरे करियर की दिशा और दशा को हमेशा के लिए बदल दिया। इस एक किरदार ने हिंदी सिनेमा में सहयोगी कलाकारों और विलेन की परिभाषा को पूरी तरह से बदल कर रख दिया और मनोज बाजपेयी को रातों-रात एक घरेलू नाम बना दिया।
करियर के मील के पत्थर
बैंडिट क्वीन (1994): बॉलीवुड में पहला बड़ा और प्रभावी नोटिस
सत्या (1998): 'भीखू म्हात्रे' के किरदार से मिला पहला राष्ट्रीय पुरस्कार
शूल (1999): एक ईमानदार पुलिस अधिकारी के दर्द को पर्दे पर उकेरा
गैंग्स ऑफ वासेपुर (2012): 'सरदार खान' के रूप में अभिनय का नया कीर्तिमान
आज के दौर के डिजिटल प्लेटफॉर्म और ओटीटी के आगमन पर अपने विचार साझा करते हुए उन्होंने कहा कि इस माध्यम ने कलाकारों के साथ-साथ दर्शकों की सोच को भी बहुत व्यापक बना दिया है। 'द फैमिली मैन' जैसी सीरीज में 'श्रीकांत तिवारी' के उनके किरदार ने वैश्विक स्तर पर लोकप्रियता के नए रिकॉर्ड स्थापित किए हैं। उन्होंने कहा कि ओटीटी की वजह से अब केवल स्टार सिस्टम पर फिल्में नहीं चलतीं, बल्कि अच्छी कहानी और बेहतरीन अदाकारी ही सबसे बड़ी यूएसपी बन चुकी है। हालांकि, वे नए अभिनेताओं को यह चेतावनी भी देते हैं कि इस चमक-धमक वाली दुनिया में टिके रहने के लिए केवल शॉर्टकट या सोशल मीडिया पर लोकप्रियता काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए आपको अपनी कला के प्रति पूरी तरह से वफादार होना पड़ेगा।
सफलताओं के इस सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के बाद भी मनोज बाजपेयी के पैर जमीन पर टिके हुए हैं और वे अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलते। वे आज भी समय मिलने पर अपने पैतृक गांव बिहार जाते हैं और वहां के आम लोगों के बीच रहकर अपनी ऊर्जा को रीचार्ज करते हैं। उनका मानना है कि एक अच्छे अभिनेता के लिए एक अच्छा और संवेदनशील इंसान होना पहली शर्त है। जब तक आप समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के सुख-दुख को महसूस नहीं कर सकते, तब तक आप स्क्रीन पर वास्तविक जज्बात पैदा नहीं कर सकते। अपनी इसी सादगी, अनुशासन और अद्वितीय अभिनय क्षमता के कारण वे आज देश के लाखों युवाओं और उभरते हुए रंगकर्मियों के लिए एक महान प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।
अभिनय पर मनोज के सिद्धांत
अभिनय कोई त्वरित मनोरंजन नहीं, बल्कि एक बेहद गंभीर और बौद्धिक शिल्प है।
स्टारडम अस्थायी है, केवल आपका किया हुआ काम और आपके किरदार ही इतिहास में जिंदा रहते हैं।
किसी भी भूमिका को निभाने से पहले उसकी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को समझना अनिवार्य है।
What's Your Reaction?







