गेहूं-धान छोड़ा, ड्रैगन फ्रूट उगाया: फरीदाबाद के जेल हवलदार ने 6.5 लाख लगाकर कमाए 14 लाख, जानिए सफलता की कहानी 

फरीदाबाद की नीमका जेल में तैनात हवलदार नरेंद्र अत्री ने पारंपरिक खेती छोड़ ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की और अब वे हर साल 14 लाख रुपये कमा रहे हैं।

Aug 17, 2026 - 14:26
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गेहूं-धान छोड़ा, ड्रैगन फ्रूट उगाया: फरीदाबाद के जेल हवलदार ने 6.5 लाख लगाकर कमाए 14 लाख, जानिए सफलता की कहानी 
  • हरियाणा: फरीदाबाद के हवलदार ने ड्रैगन फ्रूट की खेती से बदली किस्मत, सालाना कमाई 14 लाख रुपये 
  • पारंपरिक खेती छोड़ शुरू की ड्रैगन फ्रूट फार्मिंग, नीमका जेल के हवलदार कमा रहे 14 लाख रुपये सालाना 
  • फरीदाबाद के हवलदार नरेंद्र अत्री ने ड्रैगन फ्रूट की खेती से रचा इतिहास, 14 लाख रुपये सालाना कमाई

हरियाणा के फरीदाबाद जिले में तैनात जेल विभाग के एक हवलदार ने पारंपरिक फसलों को छोड़कर आधुनिक बागवानी अपनाकर मिसाल कायम की है। नीमका जेल में पदस्थ हवलदार नरेंद्र अत्री ने फरीदाबाद और पलवल की सीमा पर स्थित अपने पैतृक गांव जल्हाका में ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की। कभी गेहूं, धान, मक्का और ज्वार जैसी फसलों से साल में महज डेढ़ से दो लाख रुपये कमाने वाले इस किसान परिवार ने महज साढ़े छह लाख रुपये के एकमुश्त निवेश से अब सालाना 14 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा हासिल करना शुरू कर दिया है। आधुनिक तकनीक और सही योजना से शुरू की गई यह पहल अब क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।

हरियाणा के फरीदाबाद-पलवल सीमा पर बसे जल्हाका गांव निवासी और नीमका जिला कारागार में हवलदार के पद पर कार्यरत नरेंद्र अत्री ने खेती के पारंपरिक ढर्रे को तोड़कर ड्रैगन फ्रूट की व्यावसायिक बागवानी स्थापित की है। पारंपरिक फसलों में बढ़ती लागत और घटते मुनाफे को देखते हुए उन्होंने विदेशी मूल के फल ड्रैगन फ्रूट को अपनी जमीन पर उगाने का साहसिक कदम उठाया। करीब छह बीघे खेत में लगाए गए इस बगीचे से अब वे हर साल औसतन आठ टन से अधिक फसल का उत्पादन कर रहे हैं। वर्तमान में करीब 200 रुपये प्रति किलोग्राम के थोक भाव पर बिक्री होने से उनकी सालाना आय 14 लाख रुपये तक पहुंच गई है।

लागत और मुनाफे का गणित

कुल प्रारंभिक निवेश: लगभग ₹6.5 लाख

मौजूदा वार्षिक उत्पादन: 8 टन (8,000 किग्रा)

बाजार थोक दर: ₹200 प्रति किग्रा

वार्षिक सकल कमाई: ₹14 लाख

फसल की आयु सीमा: 15 से 20 वर्ष तक निरंतर उत्पादन

इस नवाचार की शुरुआत वर्ष 2023 की शुरुआत में हुई थी। ड्यूटी के बाद खाली समय में नरेंद्र अत्री ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ड्रैगन फ्रूट की वैज्ञानिक खेती से जुड़े वीडियो देखे और इसके व्यावसायिक पहलुओं को समझा। शुरुआत में परिवार के सदस्यों ने अनिश्चितता और जोखिम के डर से इसका विरोध किया, लेकिन नरेंद्र अपने फैसले पर अडिग रहे। सबसे पहले उन्होंने अपने खेत की मिट्टी और नलकूप के पानी का पीएच स्तर जांचा, जो इस फसल के अनुकूल पाया गया। इसके बाद उन्होंने खेत तैयार कर कंक्रीट के खंभे (पोल्स) खड़े किए, ऊपर गोल रिंग लगाई और गुणवत्तापूर्ण कलमें रोपीं।

पौधों के विकास के शुरुआती नौ महीनों के भीतर पहली बार फूल और फल आने लगे। दीर्घकालिक और मजबूत फसल संरचना तैयार करने के लिए बागवानी नियमों के तहत पहले आए फलों को तोड़ दिया गया, जिससे पौधे की वानस्पतिक वृद्धि बेहतर हो सके। करीब डेढ़ साल बाद जब वास्तविक व्यावसायिक फलन शुरू हुआ तो पहले चरण में लगभग ढाई से तीन टन फल प्राप्त हुए। तीसरे साल तक आते-आते पौधों ने पूरी तरह परिपक्व होकर प्रति सीजन आठ टन का बंपर उत्पादन देना शुरू कर दिया। 

नरेंद्र अत्री के अनुसार, ड्रैगन फ्रूट की खेती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्रारंभिक बुनियादी ढांचे के बाद रखरखाव का खर्च बेहद कम होता है। एक बार कंक्रीट पोल और ड्रिप सिंचाई प्रणाली स्थापित हो जाने के बाद पौधा 15 से 20 वर्षों तक लगातार उपज देता रहता है। वहीं स्थानीय कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि ड्रैगन फ्रूट कम पानी की खपत वाली कैक्टस प्रजाति का पौधा है, जिसमें कीट और बीमारियों का प्रकोप न के बराबर होता है, जिससे यह भूजल संकट से जूझ रहे इलाकों के लिए बेहद टिकाऊ विकल्प साबित हो रहा है।

हवलदार नरेंद्र अत्री की इस उपलब्धि ने फरीदाबाद और पलवल क्षेत्र के किसानों का दृष्टिकोण बदल दिया है। तीन साल पहले जब उन्होंने यह कदम उठाया था, तब वे इस इलाके में ड्रैगन फ्रूट उगाने वाले पहले किसान थे। आज उनकी सफलता को देखकर आसपास के गांवों के कई अन्य किसान भी गेहूं और गन्ने की पारंपरिक खेती के विकल्प के तौर पर ड्रैगन फ्रूट की पौध लगा रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर की प्रमुख फल मंडियों से नजदीकी के कारण किसानों को अपनी उपज की सीधी और बेहतर कीमत मिल रही है, जिससे बिचौलियों पर निर्भरता समाप्त हो रही है। 

आने वाले वर्षों में उत्पादन क्षमता में और अधिक वृद्धि की उम्मीद है, क्योंकि पौधे जैसे-जैसे पुराने होंगे, शाखाओं का घेरा और अधिक मजबूत होगा। नरेंद्र अत्री अब अपने फार्म को जैविक प्रमाणीकरण के साथ जोड़ने और अतिरिक्त मूल्य संवर्धन के लिए ड्रैगन फ्रूट की नर्सरी तैयार कर अन्य किसानों को पौधे उपलब्ध कराने की योजना बना रहे हैं। इसके साथ ही क्षेत्र में बागवानी विभाग की विभिन्न योजनाओं के तहत ड्रिप सिंचाई और शेड नेट पर मिलने वाली सरकारी सब्सिडी से जुड़कर अन्य छोटे किसान भी बड़े पैमाने पर इस मॉडल को अपनाने की तैयारी में हैं।

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