होर्मुज जलडमरूमध्य पर यूएनएससी का अहम मतदान टला, चीन और रूस के कड़े रुख के बाद बैकफुट पर आए प्रस्तावक देश।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर पेश किए गए एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर मतदान

- वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच होर्मुज प्रस्ताव पर कूटनीतिक गतिरोध, वीटो शक्तियों के विरोध के कारण सुरक्षा परिषद में टली वोटिंग
- 'रक्षात्मक कार्रवाई' के मसौदे पर भी नहीं बनी सहमति, चीन-रूस ने सैन्य हस्तक्षेप की संभावना को बताया क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर पेश किए गए एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर मतदान को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है। बहरीन द्वारा प्रायोजित इस प्रस्ताव का उद्देश्य वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए जीवन रेखा माने जाने वाले इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित करना और वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही को फिर से बहाल करना था। हालांकि, सुरक्षा परिषद के दो स्थायी सदस्यों, चीन और रूस ने इस प्रस्ताव की भाषा और इसमें निहित सैन्य प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताई, जिसके बाद कूटनीतिक गतिरोध की स्थिति पैदा हो गई। शनिवार, 4 अप्रैल 2026 को होने वाले इस मतदान के टलने से मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता और अधिक गहरा गई है।
इस विवाद की जड़ में वह प्रस्ताव है जिसे बहरीन ने खाड़ी देशों और अमेरिका के समर्थन से तैयार किया था। शुरुआत में इस मसौदे में 'सभी आवश्यक साधनों' के उपयोग की बात कही गई थी, जिसका कूटनीतिक अर्थ सीधे तौर पर सैन्य हस्तक्षेप से जोड़ा जाता है। चीन और रूस के कड़े विरोध के बाद, प्रस्ताव को काफी 'नरम' किया गया और इसमें केवल 'रक्षात्मक उपायों' (Defensive Measures) की अनुमति देने की बात जोड़ी गई। इसके बावजूद, बीजिंग और मॉस्को इस बात पर अड़े रहे कि इस तरह का कोई भी प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर सकता है और इससे ईरान के साथ चल रहा संघर्ष और अधिक भड़क सकता है। चीन के राजदूत ने स्पष्ट किया कि बल प्रयोग को किसी भी रूप में वैध बनाना खतरनाक परिणामों को निमंत्रण देना होगा।
होर्मुज का सामरिक महत्व
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण 'ऑयल चोकपॉइंट' है, जिससे होकर वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद से तेहरान ने इस मार्ग पर अपना नियंत्रण कड़ा कर दिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतों में भारी उछाल आया है।
रूस की ओर से दी गई दलीलों में यह तर्क दिया गया कि यह प्रस्ताव केवल सुरक्षा के नजरिए से समस्या को देख रहा है, जबकि इसके राजनीतिक समाधान की आवश्यकता है। रूसी प्रतिनिधियों का मानना है कि जब तक क्षेत्र में शत्रुता पूरी तरह समाप्त नहीं होती, तब तक किसी भी प्रकार का सैन्य या रक्षात्मक गठबंधन स्थिति को और अधिक जटिल बना देगा। रूस ने इसे अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश करार दिया। वहीं, फ्रांस ने भी शुरुआत में कुछ प्रावधानों पर हिचकिचाहट दिखाई थी, हालांकि बाद में उसने 'रक्षात्मक प्रकृति' के आधार पर समर्थन के संकेत दिए थे, लेकिन चीन और रूस के वीटो के डर ने मतदान की प्रक्रिया को पूरी तरह बाधित कर दिया।
ईरान ने भी इस कूटनीतिक रस्साकशी के बीच संयुक्त राष्ट्र को कड़ा संदेश भेजा है। तेहरान ने इस प्रस्ताव को 'उकसावे वाली कार्रवाई' बताते हुए चेतावनी दी कि उसकी संप्रभुता के साथ किसी भी प्रकार का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ईरान का दावा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा उसकी अपनी जिम्मेदारी है और बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप केवल अस्थिरता पैदा करेगा। इस चेतावनी ने सुरक्षा परिषद के उन सदस्यों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया जो अब तक तटस्थ थे। मतदान स्थगित होने का एक अन्य तकनीकी कारण 'गुड फ्राइडे' की छुट्टी को भी बताया गया, लेकिन असल वजह वीटो शक्तियों के बीच गहराता मतभेद ही है।
वर्तमान में सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता कर रहे बहरीन के लिए यह एक बड़ा कूटनीतिक झटका माना जा रहा है। बहरीन ने पिछले महीने भी ईरान के खिलाफ एक निंदा प्रस्ताव पारित करवाने में सफलता हासिल की थी, जिसे 13-0 से अपनाया गया था (चीन और रूस तब तटस्थ रहे थे)। लेकिन इस बार मामला सीधे तौर पर सैन्य शक्ति के उपयोग और समुद्री मार्ग के नियंत्रण से जुड़ा है, जहाँ हितों का टकराव कहीं अधिक बड़ा है। अमेरिका ने इस देरी पर निराशा जताते हुए कहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को वैश्विक व्यापार की रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए, क्योंकि होर्मुज का बंद होना केवल खाड़ी देशों की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की आर्थिक समस्या है।
इस कूटनीतिक गतिरोध के कारण वैश्विक तेल बाजारों में खलबली मची हुई है। एशियाई शेयर बाजारों में गिरावट और तेल की कीमतों में निरंतर वृद्धि ने सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यदि सुरक्षा परिषद किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुँचती है, तो आने वाले हफ्तों में समुद्री परिवहन की लागत और बीमा प्रीमियम में भारी वृद्धि हो सकती है। कई बड़ी शिपिंग कंपनियों ने पहले ही इस मार्ग से अपने जहाजों को भेजने से मना कर दिया है या वे लंबे और महंगे वैकल्पिक रास्तों का उपयोग कर रही हैं। सुरक्षा परिषद अब अगले सप्ताह इस मुद्दे पर फिर से चर्चा कर सकती है, लेकिन जब तक प्रस्ताव की भाषा पर आम सहमति नहीं बनती, तब तक मतदान की संभावना कम ही नजर आती है।
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