CJP Funding Row: RTI एक्टिविस्ट अमित तिवारी ने CJP के 1 करोड़ रुपये के लीगल डिफेंस फंड और संस्थापक पर उठाए सवाल
RTI एक्टिविस्ट अमित तिवारी ने CJP के 1 करोड़ रुपये के लीगल डिफेंस फंड, पंजीकरण स्थिति और संस्थापक अभिजीत दीपके की वित्तीय स्थिति पर चुनाव आयोग से जांच मांगी।

- CJP Funding Controversy: RTI एक्टिविस्ट अमित तिवारी ने CJP की 1 करोड़ की फंडिंग और पीएम मोदी पर बयानों को लेकर उठाए गंभीर सवाल
- CJP Legal Fund Investigation: 1 करोड़ के लीगल डिफेंस फंड पर बवाल, RTI कार्यकर्ता अमित तिवारी ने EC और CBIC से की शिकायत
- 1 करोड़ की फंडिंग और PM मोदी पर बयान: CJP पर RTI एक्टिविस्ट अमित तिवारी का बड़ा खुलासा, EC से जांच की मांग
सूरत निवासी राइट टू इंफॉर्मेशन (RTI) एक्टिविस्ट अमित तिवारी ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और उसके संस्थापक अभिजीत दीपके के खिलाफ गंभीर वित्तीय और कानूनी आरोप लगाते हुए जांच की मांग की है। अमित तिवारी ने वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल द्वारा CJP के लीगल डिफेंस फंड में घोषित 1 करोड़ रुपये की राशि, संगठन की पंजीकरण स्थिति, 18% जीएसटी देनदारी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर आंदोलनकारियों द्वारा की गई बयानबाजी पर सवाल खड़े किए हैं। इस संबंध में उन्होंने भारत निर्वाचन आयोग (ECI), केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) तथा आयकर विभाग को पत्र लिखकर निष्पक्ष जांच की अपील की है। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में बहस तेज हो गई है।
सूरत के प्रमुख RTI एक्टिविस्ट अमित तिवारी ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की वित्तीय व्यवस्था, कानूनी वैधता और उसके संस्थापक अभिजीत दीपके के पारिवारिक आय के स्रोतों को लेकर कई तीखे सवाल उठाए हैं। मामला तब गरमाया जब वरिष्ठ अधिवक्ता और निर्दलीय राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने NEET परीक्षा धांधली के विरोध प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार हुए छात्रों व प्रदर्शनकारियों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए CJP के लीगल डिफेंस फंड में 1 करोड़ रुपये का योगदान देने की घोषणा की।
अमित तिवारी का आरोप है कि CJP एक गैर-पंजीकृत संगठन है, लेकिन यह एक पूर्ण राजनीतिक दल की भांति गतिविधियों का संचालन कर रहा है। बिना औपचारिक पंजीकरण और कानूनी मान्यता के इतना भारी-भरकम फंड एकत्र करना और उसका उपयोग करना वित्तीय नियमों तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन हो सकता है।
पूरा विवाद NEET पेपर लीक आंदोलन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा की गई कार्यवाइयों के बाद शुरू हुआ। प्रदर्शनकारियों के समर्थन में CJP ने एक लीगल डिफेंस फंड की स्थापना की घोषणा की, जिसके बाद कपिल सिब्बल ने सार्वजनिक रूप से 1 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता देने का ऐलान किया।
इसके तुरंत बाद RTI एक्टिविस्ट अमित तिवारी ने मामले की तहकीकात शुरू की और कई प्रमुख बिंदुओं पर जांच एजेंसियों का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने सबसे पहले यह मुद्दा उठाया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत CJP भारत निर्वाचन आयोग में पंजीकृत राजनीतिक दल है या नहीं। उनका मानना है कि यदि यह संगठन पंजीकृत नहीं है, तो राजनीतिक पार्टी के बैनर तले चंदा या फंड स्वीकार करना पूरी तरह से अवैध हो सकता है। इसके साथ ही अमित तिवारी ने केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) को पत्र लिखकर यह स्पष्ट करने की मांग की है कि क्या किसी गैर-पंजीकृत संस्था को कानूनी सुरक्षा के नाम पर दी जाने वाली 1 करोड़ रुपये की सेवा राशि पर 18 प्रतिशत जीएसटी के नियम लागू होते हैं।
अमित तिवारी ने CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके के पिता भगवानराव दीपके, जो महाराष्ट्र सरकार के सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं, उनकी संपत्ति और आय के साधनों की भी जांच की मांग की है। उन्होंने सवाल खड़ा किया कि एक पूर्व सरकारी कर्मचारी ने अपने बेटे की अमेरिका में महंगी उच्च शिक्षा का खर्च किस प्रकार वहन किया। इसके अलावा उनका तर्क है कि छात्र आंदोलन के आवरण में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार के खिलाफ भ्रामक और असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसकी आड़ में विदेशी व घरेलू फंडिंग के पारदर्शी स्रोतों पर सवाल उठते हैं।
इस पूरे मामले पर विभिन्न पक्षों की ओर से अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। RTI एक्टिविस्ट अमित तिवारी का कहना है कि CJP एक गैर-पंजीकृत संगठन होने के बावजूद देश में राजनीतिक दल की तरह काम कर रहा है। यदि 1 करोड़ रुपये के लीगल डिफेंस फंड का ऐलान हुआ है, तो चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फंड जुटाने का यह तरीका कानूनी दायरे में आता है या नहीं, साथ ही CBIC को टैक्स प्रक्रिया की समीक्षा करनी चाहिए।
वहीं दूसरी ओर CJP के प्रतिनिधियों और समर्थित कानूनी सलाहकारों का कहना है कि यह फंड किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि निर्दोष छात्रों और कार्यकर्ताओं को पुलिस कार्रवाई से बचाने और उन्हें निशुल्क कानूनी सहायता देने के उद्देश्य से बनाया गया है। उनका तर्क है कि नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी सहायता फंड बनाना पूरी तरह से संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार है।
अमित तिवारी की शिकायतों के बाद यह मामला केवल एक छात्र आंदोलन या कानूनी सहायता फंड तक सीमित न रहकर राजनीतिक और वित्तीय जांच के घेरे में आ गया है। इस विवाद से देश में बिना पंजीकरण के काम कर रहे सामाजिक व राजनीतिक समूहों द्वारा क्राउडफंडिंग या बड़े फंड प्राप्त करने की प्रक्रियाओं पर विधिक बहस छिड़ गई है।
यदि CBIC और आयकर विभाग द्वारा इस मामले का संज्ञान लिया जाता है, तो भविष्य में लीगल डिफेंस फंड्स और ट्रस्ट्स के लिए जीएसटी व इनकम टैक्स के नियम अधिक सख्त हो सकते हैं। इसके साथ ही प्रधानमंत्री मोदी और केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलनों में लगने वाले फंड्स को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी और तेज होने की पूरी संभावना है।
अब सभी की नजरें भारत निर्वाचन आयोग और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड पर टिकी हैं कि वे अमित तिवारी की शिकायत याचिका पर क्या प्रशासनिक या कानूनी कदम उठाते हैं।
यदि शिकायत दर्ज होने के बाद वित्तीय अनियमितता या आय से अधिक संपत्ति के संकेत मिलते हैं, तो संबंधित विभागों द्वारा नोटिस जारी किए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त CJP और कपिल सिब्बल द्वारा घोषित 1 करोड़ रुपये के फंड का पारदर्शी विवरण प्रस्तुत करने या इसे न्यायालय में चुनौती देने की संभावना भी खुली हुई है।
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