अफ्रीकी देश कांगो में इबोला वायरस के 'बुंडिबुग्यो' स्ट्रेन का भयंकर प्रकोप, 321 लोग संक्रमित, अब तक 48 मरीजों की मौत।
अन्तरराष्ट्रीय स्वास्थ्य और सुरक्षा के मोर्चे पर एक बेहद चिंताजनक और गंभीर खबर सामने आई है, जिसने वैश्विक चिकित्सा
- स्वास्थ्य आपातकाल के बीच वैश्विक स्तर पर बड़ी चिकित्सा पहल, नई वैक्सीन तैयार करने के लिए तीन बड़े समूहों को मिला भारी फंड
- भारत की अग्रणी फार्मास्युटिकल कंपनी भी रेस में शामिल, इबोला रोधी टीके के त्वरित क्लिनिकल ट्रायल के लिए 570 करोड़ रुपये जारी
अन्तरराष्ट्रीय स्वास्थ्य और सुरक्षा के मोर्चे पर एक बेहद चिंताजनक और गंभीर खबर सामने आई है, जिसने वैश्विक चिकित्सा बिरादरी को पूरी तरह से चौकन्ना कर दिया है। मध्य अफ्रीकी देश लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो (DRC) के सुदूरवर्ती और घने जंगलों वाले इलाकों में इबोला वायरस के एक बेहद दुर्लभ और घातक स्ट्रेन ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं। आधिकारिक चिकित्सा रिपोर्टों के अनुसार, कांगो के प्रभावित प्रांतों में इबोला के 'बुंडिबुग्यो' (Bundibugyo) स्ट्रेन के अब तक कुल 321 पुष्ट मामले सामने आ चुके हैं, जबकि इस जानलेवा संक्रमण की चपेट में आने से 48 संक्रमित मरीजों की दर्दनाक मौत हो चुकी है। संक्रमण की इस भयावह रफ्तार और तेजी से बढ़ते मृत्यु दर को देखते हुए कांगो सरकार ने देश के प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल प्रभाव से राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल (National Health Emergency) की घोषणा कर दी है, ताकि महामारी को अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार करने से रोका जा सके।
इस विशेष स्ट्रेन की पहचान होने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन और अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा शोधकर्ताओं के बीच हड़कंप मचने की सबसे बड़ी वजह यह है कि वर्तमान समय में दुनिया में उपलब्ध इबोला की अधिकांश स्वीकृत वैक्सीन मुख्य रूप से 'जायरे' (Zaire) स्ट्रेन के खिलाफ ही कारगर साबित होती हैं। बुंडिबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ मौजूदा चिकित्सा विज्ञान के पास कोई पूर्ण रूप से प्रभावी या मान्यता प्राप्त टीका उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण संक्रमित मरीजों का इलाज करना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। इस गंभीर चिकित्सा शून्यता को भरने और मानव जीवन को बचाने के उद्देश्य से वैश्विक स्वास्थ्य साझेदारों और वैक्सीन एलायंस ने एक अभूतपूर्व और बड़ा रणनीतिक फैसला लिया है, जिसके तहत इस विशिष्ट स्ट्रेन के खिलाफ एक नई और अचूक वैक्सीन विकसित करने की प्रक्रिया को अत्यंत तेज कर दिया गया है।
महामारी के इस वैश्विक खतरे से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक वित्तीय पैकेज जारी किया गया है, जो इस बात का संकेत है कि दुनिया किसी भी नई महामारी को रोकने के लिए कितनी गंभीर है। एक अंतरराष्ट्रीय महामारी रोधी गठबंधन ने बुंडिबुग्यो स्ट्रेन की नई वैक्सीन के त्वरित शोध, विकास और मानव परीक्षण (Clinical Trials) के लिए कुल 570 करोड़ रुपये (लगभग 68 मिलियन अमेरिकी डॉलर) का एक विशालकाय फंड जारी किया है। इस विशाल वैश्विक फंडिंग को मुख्य रूप से दुनिया के तीन सबसे बड़े और अग्रणी बायोटेक समूहों के बीच विभाजित किया गया है, जिन्हें इस टीके को रिकॉर्ड समय के भीतर तैयार करने और उसके बड़े पैमाने पर उत्पादन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस प्रतिष्ठित वैश्विक कंसोर्टियम और अंतरराष्ट्रीय फंडिंग को हासिल करने वाले तीन शीर्ष समूहों में भारत की एक अग्रणी और विश्व विख्यात फार्मास्युटिकल कंपनी भी शामिल है, जो वैश्विक वैक्सीन आपूर्ति श्रृंखला में भारत के बढ़ते तकनीकी और वैज्ञानिक प्रभुत्व को दर्शाती है। भारतीय वैज्ञानिकों की टीम अपनी उन्नत प्रयोगशालाओं में इस टीके के निर्माण के लिए जरूरी जेनेटिक मैपिंग और एंटीबॉडीज के विकास पर काम शुरू कर चुकी है।
इस महामारी के फैलने की मुख्य वजह और इसके लक्षणों की बात करें तो इबोला मुख्य रूप से संक्रमित जानवरों, विशेषकर चमगादड़ों और बंदरों के सीधे संपर्क में आने से इंसानों के भीतर प्रवेश करता है। इसके बाद, इंसानों में यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के शारीरिक तरल पदार्थों, जैसे रक्त, पसीना और लार के सीधे संपर्क के माध्यम से बेहद तीव्र गति से फैलता है। बुंडिबुग्यो स्ट्रेन से पीड़ित मरीजों में तेज बुखार, शरीर की मांसपेशियों में असहनीय दर्द, अत्यधिक कमजोरी, उल्टी, दस्त और संक्रमण के गंभीर स्तर पर पहुंचने के बाद आंतरिक और बाहरी रक्तस्राव (Bleeding) जैसे बेहद डरावने लक्षण देखे जाते हैं। कांगो के जिन सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में यह बीमारी फैली है, वहां स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे की घोर कमी और परिवहन की असुविधा होने के कारण चिकित्सा टीमों को प्रत्येक नए मरीज तक पहुंचने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
फंडिंग प्राप्त करने वाले तीनों शोध समूहों ने अपनी आंतरिक तकनीकी रणनीतियों को साझा करते हुए स्पष्ट किया है कि वे इस नई वैक्सीन को बनाने के लिए 'वायरल वेक्टर' (Viral Vector) और मैसेंजर आरएनए (mRNA) जैसी दुनिया की सबसे आधुनिक और सुरक्षित तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। इन उन्नत तकनीकों की मदद से तैयार होने वाला टीका न केवल बुंडिबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ मानव शरीर के भीतर एक बेहद मजबूत और दीर्घकालिक प्रतिरक्षा प्रणाली (Immunity) का निर्माण करेगा, बल्कि भविष्य में इबोला के अन्य संभावित म्यूटेशन और रूपों के खिलाफ भी सुरक्षा कवच प्रदान कर सकेगा। भारतीय कंपनी के वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वे अगले कुछ ही महीनों के भीतर इस टीके के पहले और दूसरे चरण के सुरक्षा परीक्षणों को सफलतापूर्वक पूरा कर लेंगे, ताकि प्रभावित क्षेत्रों में इसके आपातकालीन उपयोग को मंजूरी दी जा सके।
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