'5 बच्चे कौन पैदा करता है, भेड़- बकरियों की तरह पालोगे', औचक निरीक्षण पहुँचीं कलेक्टर विदिशा मुखर्जी ने दी समझावन

विदिशा मुखर्जी के इस वीडियो को लेकर इंटरनेट पर भी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। उनके संवाद करने के तरीके की सराहना की जा रही है क्योंकि उन्होंने महिला को डराने या फटकारने के बजाय एक अभिभावक की तरह समझा

Apr 26, 2026 - 12:13
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'5 बच्चे कौन पैदा करता है, भेड़- बकरियों की तरह पालोगे', औचक निरीक्षण पहुँचीं कलेक्टर विदिशा मुखर्जी ने दी समझावन
'5 बच्चे कौन पैदा करता है, भेड़- बकरियों की तरह पालोगे', औचक निरीक्षण पहुँचीं कलेक्टर विदिशा मुखर्जी ने दी समझावन

  • विचारधाराओं का टकराव: धीरेंद्र शास्त्री के बयान के बीच कलेक्टर विदिशा मुखर्जी ने दिया 'हम दो हमारे दो' का संदेश
  • प्रशासनिक सक्रियता और सामाजिक सरोकार: औचक निरीक्षण के दौरान वार्ड में पहुंचीं कलेक्टर, पांच बच्चों की मां को दी भविष्य की सीख

मध्य प्रदेश के मैहर जिले में शनिवार को प्रशासनिक सक्रियता और सामाजिक जागरूकता का एक अनूठा उदाहरण देखने को मिला। जिले की कलेक्टर विदिशा मुखर्जी जब मैहर के सिविल अस्पताल का औचक निरीक्षण करने पहुंचीं, तो उनका सामना एक ऐसी स्थिति से हुआ जिसने वर्तमान में देश के भीतर चल रही जनसंख्या संबंधी बहस को एक नई दिशा दे दी। अस्पताल के मेटरनिटी वार्ड में निरीक्षण के दौरान जब कलेक्टर को यह पता चला कि वहां भर्ती एक महिला ने अपने पांचवें बच्चे को जन्म दिया है, तो उन्होंने एक अधिकारी के साथ-साथ एक सजग नागरिक की भूमिका निभाई। उन्होंने तुरंत महिला के पास जाकर उससे बातचीत की और बेहद सौम्य लेकिन स्पष्ट शब्दों में उसे परिवार नियोजन की महत्ता समझाई। कलेक्टर का यह व्यवहार न केवल वहां मौजूद स्टाफ के लिए प्रेरणादायक था, बल्कि इसका वीडियो वायरल होने के बाद यह व्यापक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।

कलेक्टर विदिशा मुखर्जी ने महिला को समझाते हुए जिन बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया, वे सीधे तौर पर एक परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता से जुड़े थे। उन्होंने महिला को बताया कि आज के समय में पांच बच्चों का सही ढंग से पालन-पोषण करना, उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखना और सबसे महत्वपूर्ण उन्हें उच्च शिक्षा प्रदान करना एक बहुत बड़ी चुनौती है। कलेक्टर के अनुसार, जब परिवार छोटा होता है, तो माता-पिता अपने बच्चों पर व्यक्तिगत ध्यान दे पाते हैं और उनकी हर बुनियादी जरूरत को गुणवत्ता के साथ पूरा कर पाते हैं। उन्होंने महिला को भविष्य की चिंताओं से अवगत कराते हुए कहा कि बच्चों की संख्या बढ़ने से न केवल संसाधनों का बंटवारा होता है, बल्कि मां के अपने स्वास्थ्य पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। यह बातचीत एक प्रशासनिक अधिकारी द्वारा समाज के निचले स्तर तक जाकर जमीनी हकीकत बदलने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। वर्तमान में भारत के भीतर जनसंख्या नीति और परिवार नियोजन को लेकर दो अलग-अलग धाराएं प्रवाहित हो रही हैं। एक ओर जहां धार्मिक और आध्यात्मिक मंचों से बच्चों की संख्या बढ़ाने के आह्वान किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक अमला और स्वास्थ्य विभाग सीमित परिवार को ही उज्ज्वल भविष्य का आधार मानकर काम कर रहा है। मैहर की यह घटना इसी विरोधाभास के बीच एक संतुलन पैदा करने की प्रशासनिक कोशिश को दर्शाती है।

दिलचस्प बात यह है कि कलेक्टर का यह वीडियो और संदेश उस समय वायरल हो रहा है जब देश के विख्यात कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का 'चार बच्चे पैदा करो' वाला बयान सुर्खियों में बना हुआ है। जहां एक ओर धार्मिक मंचों से आबादी बढ़ाने को लेकर अपनी दलीलें दी जा रही हैं, वहीं विदिशा मुखर्जी का यह व्यावहारिक दृष्टिकोण सरकारी नीतियों और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व को प्रदर्शित करता है। कलेक्टर ने अस्पताल प्रशासन को भी निर्देश दिए कि वे वार्ड में आने वाली महिलाओं और उनके परिवारों को न केवल इलाज उपलब्ध कराएं, बल्कि उन्हें परिवार नियोजन के आधुनिक साधनों और उनके लाभों के बारे में भी विस्तार से शिक्षित करें। इस घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या जनसंख्या वृद्धि व्यक्तिगत आस्था का विषय है या फिर यह एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी है। अस्पताल के औचक निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने केवल जनसंख्या नियंत्रण पर ही बात नहीं की, बल्कि उन्होंने अस्पताल की व्यवस्थाओं, सफाई और दवाओं की उपलब्धता का भी बारीकी से जायजा लिया। मेटरनिटी वार्ड में उन्होंने भर्ती महिलाओं से उनके अनुभव पूछे और यह सुनिश्चित किया कि सरकार द्वारा दी जाने वाली योजनाओं का लाभ उन तक पहुंच रहा है या नहीं। जब उन्हें पता चला कि महिला की यह पांचवीं डिलीवरी है, तो उन्होंने वहां उपस्थित नर्सों और डॉक्टरों को निर्देशित किया कि वे ऐसी महिलाओं की विशेष काउंसलिंग करें। उनका मानना है कि अस्पताल केवल बीमारी के इलाज का केंद्र नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सामाजिक सुधार और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता फैलाने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उनकी इस सक्रियता ने जिला प्रशासन के प्रति जनता के विश्वास को और मजबूत किया है।

विदिशा मुखर्जी के इस वीडियो को लेकर इंटरनेट पर भी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। उनके संवाद करने के तरीके की सराहना की जा रही है क्योंकि उन्होंने महिला को डराने या फटकारने के बजाय एक अभिभावक की तरह समझाया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि छोटा परिवार होने से बच्चों को बेहतर कपड़े, अच्छा भोजन और भविष्य में रोजगार के बेहतर अवसर मिल सकते हैं। कलेक्टर ने महिला से यह भी पूछा कि क्या वह अपने बच्चों को शिक्षित बनाना चाहती है, जिस पर महिला की सहमति मिलने के बाद उन्होंने समझाया कि यह लक्ष्य तभी प्राप्त किया जा सकता है जब परिवार का आकार प्रबंधनीय हो। प्रशासनिक स्तर पर इस तरह के व्यक्तिगत हस्तक्षेप अक्सर बड़े नीतिगत बदलावों से अधिक प्रभावी साबित होते हैं, क्योंकि ये सीधे लोगों के दिल और दिमाग पर असर डालते हैं। मैहर सिविल अस्पताल में हुई यह घटना प्रशासनिक संवेदनशीलता का परिचायक है। अक्सर देखा जाता है कि अधिकारी निरीक्षण के दौरान केवल कागजी आंकड़ों और भौतिक ढांचे पर ध्यान देते हैं, लेकिन विदिशा मुखर्जी ने मानवीय पहलू को प्राथमिकता दी। उन्होंने यह भी देखा कि अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति क्या है और क्या गरीब मरीजों को बिना किसी बाधा के सेवाएं मिल रही हैं। पांच बच्चों वाली महिला के मामले ने उन्हें यह अवसर दिया कि वे स्वास्थ्य विभाग के 'छोटा परिवार, सुखी परिवार' के नारे को धरातल पर चरितार्थ करके दिखाएं। उनके इस कदम से स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और आशा सहयोगिनियों का मनोबल भी बढ़ा है, जो अक्सर ग्रामीण इलाकों में परिवार नियोजन की बात करने पर विरोध का सामना करती हैं।

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